सच के सिपाही

वीर शहीद जवान की मां ने कहा, 'आने वाले समय में भी हम अपने पुत्रों को पुलिस विभाग में भेजते रहेंगे'।

शहीद अपने पीछे अपनी पत्नी और 4 बेटों को छोड़ कर गए हैं। पहला बेटा सीताराम पुरतीजो 14 वर्ष के हैं वह सरायकेला में दसवीं कक्षा के छात्र हैं। जबकि दूसरे पुत्र राजेश पुरती 13 वर्ष के हैं जो राजनगर में नौवीं कक्षा में पढ़ाई करते हैं।

पत्नी और दिव्यांग बेटे का एकमात्र सहारा थे शहीद धनेश्वर महतो।

जिस तरह से शहीद के बेटे ने नक्सलियों को चेतावनी दी है इससे उनके माथे पर चिंता की लकीर थोड़ी तो जरूर खिंच गई होगी।

मजदूर से लेकर एएसआई तक का सफर किया शहीद मनोधन ने

जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में आतंकियों के साथ हुई मुठभेड़ के बाद अनिल घायल हो गए थे।

केतन और उनकी टीम ने मकान में घुसे दो आतंकवादियों को मौके पर मार गिराया। लेकिन एक आंतकवादी भागने लगा तो केतन और उनकी टीम ने उस पर फायरिंग की।

रानी पूरी तरह से फंस चुकी थीं। रानी अकेली थीं और सैकड़ों अंग्रेज सैनिक। सबने मिल कर रानी पर वार शुरू कर दिए। रानी घायल हो कर गिर पड़ीं। लेकिन अंग्रेज सैनिकों को जाने नहीं दिया।

सरायकेला में हुए नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों में झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के डिबरू पूर्ति भी शामिल हैं। वे मंझारी थाना के तेंतड़ा पंचायत के जावबेड़ा टोला पांडुसाई के रहने वाले थे।

झारखंड के सरायकेला में 14 जून को नक्सली हमले में बिहार के भोजपुर जिले के वीर सपूत गोवर्धन पासवान भी शहीद हो गए थे। वे धोबहां ओपी के बाघी पाकड़ गांव के रहने वाले थे।

मनोधन अपनी बहनों सकोदी हांसदा और सनोदी हांसदा से काफी लगाव रखते थे

इस युद्ध में देश की खातिर सीने पर हंसते-हंसते गोली खाने वाले कई बहादुर जवानों के किस्से अक्सर दुनिया भर में बैठे भारतियों को खुद पर गौरव करने का एक बेहतरीन लम्हा देते हैं।

ड्यूटी पर जाने से पहले संदीप ने आख़िरी बार अपने एक दोस्त अर्जुन चौधरी से बात की थी।

महेश पांच माह पहले छुट्टी पर आए थे और इसी माह आने का वादा करके ड्यूटी पर गए थे।

जुम्मन अली की गरजती बंदूक का अंजाम यह हुआ कि इस मुठभेड़ में कई आतंकी उनकी गोली से घायल हो गए। जुम्मन अली ने मौके पर ही दो आतंकियों को ढेर भी कर दिया।

आगरा के वीर सपूत अमित चतुर्वेदी के परिवार के लिए यह दिन खुशियों वाला होता है। लेकिन देश की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले अमित का 3 जून को अंतिम संस्कार किया गया।

प्रवीण कुमार जम्मू के लेह में तैनात थे। प्रवीण वर्ष 1993 में रांची के बीआरओ के जरिये सेना की सेवा में आए। सेना में यह उनके बेहतरीन काम का ही परिणाम था कि वो प्रोमोशन पाकर नायाब सूबेदार बन गए थे।

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