Kargil Vijay Diwas

टाइगर हिल के पश्चिम में पॉइंट 4875 को खाली कराने की जिम्मेदारी कैप्टन नैय्यर को दी गई थी। टाइगर हिल को पूरी तरह से पाकिस्तानी घुसपैठियों ने घेर रखा था।

पाकिस्तान ने 1999 में भारत को धोखा दिया था। एक समझौते का उल्लंघन करके ये धोखा दिया गया था। शिमला समझौते के तहत भारत-पाक के बीच 1972 में एग्रीमेंट हुआ था।

38 साल तक अपनी सेवा देने के बाद ये रिटायर हो गए। मिग सीरीज के अन्य वैरिएंट, मिग-23 बीएन और मिग-23 एमएफ और विशुद्ध मिग 27 पहले ही सेना से रिटायर हो चुके हैं।

शहीदों की याद में द्रास सेक्टर में वार मेमोरियल बनाया गया है। यह मेमोरियल 2004 में बनकर तैयार हुआ था। इसमें वीरों की गौरवगाथा लिखी गई है। मेमोरियल में इन शहीदों की यादों को संजोया गया है।

27 मई 1999 को बठिंडा के भिसीयाना एयरफोर्स स्टेशन पर तैनात आहूजा ने मिग 21 विमान से ऑप्रेशन 'सफेद सागर' के तहत खदेड़ते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी थी।

भारतीय सेना ने पाकिस्तान की इस हरकत का मुंह तोड़ जवाब दिया और एक-एक कर ऑपरेशन लॉन्च कर पाक सेना के कब्जे वाले इलाकों में तिरंगा फहराया।

Captain Vikram Batra: एक ऑपरेशन की सफलता के बाद पाकिस्तानियों के खिलाफ दूसरे ऑपरेशन में छाती पर गोली खाकर शहीद होने वाले बत्रा को सरकार ने सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया है।

सेना के जवानों ने सबसे पहला हमला पाकिस्तानी सीमा में घुसकर उरी सेक्टर पर किया था। दुश्मन को घुटनों पर लाने के लिए उन्हें दुश्मनों की पोस्ट और रसद भंडार को खाक करने की जिम्मेदारी दी गई थी जो कि उरी के पास स्थित था।

हर साल फरवरी महीने में ठंड के चलते कारगिल क्षेत्र में दोनों देशों की सेनाएं आपसी सहमति पीछे हट जाती हैं लेकिन तत्कालीन पाक सेना के जनरल परवेज मुशर्रफ ने सैनिकों को कारगिल के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इलाकों में भेजकर कब्जा करवा दिया था।

1999 में जब करगिल युद्ध (भारत-पाकिस्तान) छिड़ गया था और थापर इस जंग में देश के लिए कुर्बानी देने वाले सबसे कमउम्र जांबाज थे। 26 दिसंबर 1976 को जन्मे विजयंत सैनिकों के परिवार से आते थे।

कारगिल युद्ध (Kargil War) को हर साल 26 जुलाई के दिन विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भारतीय सेना ने पाकिस्तानी को कारगिल में हराकर अपना पराक्रम दिखाया था। पूरा देश एकबार फिर कारगिल दिवस के लिए तैयारी शुरू कर रहा है।

युद्ध में दोनों देशों के सैनिक शहीद होते हैं लेकिन हारने वाले के ज्यादा सैनिक और जीतने वाले के कम। ऐसा ही अमूमन देखने को मिलता रहा है। कारगिल के शहीदों का जिक्र हो तो उत्तर प्रदेश के सरसावा के चार जांबाजों के प्राणों की आहुति को कभी नहीं भुलाया जा सकता।

सेना के पास जितने ज्यादा मजबूत और मॉर्डन हथियार होंगे दुश्मन उतना ही कमजोर नजर आएगा। कारगिल में भी भारतीय सेनाओं के हथियारों ने अपनी ऐसी छाप छोड़ी जिसको याद कर आज भी पाकिस्तान थर-थर कांप उठता है।

कारगिल युद्ध, को ऑपरेशन विजय के नाम से भी जाना जाता है। ये युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच मई और जुलाई 1999 के बीच लड़ा गया। भारत-पाक सीमा से सटे कारगिल क्षेत्रों में सर्दियों कड़ाके की ठंड पड़ती है।

कारगिल युद्ध में सेना को लीड करने वाले कई अधिकारियों ने कई मौकों पर कहा है कि भारतीय वायुसेना के हवाई हमले से दुश्मन का मनोबल टूटा था। वायुसेना ने 32 हजार फीट की ऊंचाई से जम्मू कश्मीर के द्रास-कारगिल इलाके में टाइगर हिल पर एयर पावर का इस्तेमाल किया था।

कारगिल युद्ध के दौरान सौरभ कालिया 22 दिनों तक पाकिस्तान सेना की कैद में रहे और 9 जून 1999 को पाकिस्तानी सेना द्वारा उनके शव सौंपा गया। उन्हें सिगरेट से जलाया गया था और उनके कानों में लोहे की सुलगती छड़ें घुसेड़ी गई थीं।

गुंजन सक्सेना: 1999 में गुंजन की पोस्टिंग 132 फॉरवर्ड एरिया कंट्रोल में की गई थी। उनकी उम्र तब मात्र 25 वर्ष थी। 1975 में जन्मीं गुंजन पायलटों के दल में एकमात्र महिला थीं।

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