नक्सलवाद का सच

भरोसा जीतने के लिए आपस में बातचीत जरूरी होती है। गांव को नक्सल-मुक्त कर वहां शांति बहाल करने का जवानों का मकसद बिना गांव वालों के सहयोग के संभव नहीं था। वहां की बोली हल्बी है और जवानों को यह बोली बिल्कुल नहीं आती थी।

वर्दी जैसे उनकी सबसे बड़ी दुश्मन थी। पर उसी वर्दी ने उन्हें नया जीवन दिया है। आज वही वर्दी उनकी जिंदगी संवारने में उनकी मदद कर रही है।

ओडिशा में माओवादियों का गढ़ मने जाने वाले मालकानगिरी ज़िले की रहने वाली सिरिसा करामी ने कुछ वर्ष पूर्व भारतीय महिला वॉलीबॉल टीम में स्थान हासिल किया।

माओवादी दलम के कमांडर दंपति ने अदिलाबाद के निर्मल जिला पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

दूसरी तरफ सरकार की पुनर्वास की योजना भी बहुत काम कर रही है। समर्पण करने वाले नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए कई तरह की योजनाएं चलाई जा रही हैं जिसका फायदा दिख रहा है।

नक्सल आतंकवाद तेजी से पतन की तरफ बढ़ रहा है। पिछले 10 साल के आंकड़े तो यही कहानी बयान कर रहे हैं। नक्सली गतिविधियों में तेजी से कमी आई है।

अफजल का बेटा गालिब गुरु को भारतीय होने पर गर्व है। अपना आधार कार्ड बनने पर वह बहुत खुश है। वह उत्साहित है कि अब उसका भारतीय पासपोर्ट भी बन जाएगा।

Good time to write an obituary of Naxal terror? Looks like that and figures available with us of the last 10 years clearly establish how Left wing extremists have suffered serious reverses.

सारंडा में सक्रिय सब जोनल कमांडर अनमोल दा दस्ते के हार्डकोर नक्सली दंपति ने एक साथ मुख्यधारा में लौटने के लिए आत्मसमर्पण किया। भाकपा माओवादी से जुड़े इस नक्सली दंपती पर सरकार ने एक-एक लाख का इनाम घोषित कर रखा था।

मुर्तजा हामिद राजस्थान के कोटा के निवासी हैं और मुंबई में रहते हैं। 110 करोड़ रुपए देने की कागजी कार्रवाई उनकी तरफ से पूरी कर ली गई है, वे पीएमओ के आदेश पर डीडी या चेक से भुगतान करेंगे।

एक दुर्दांत नक्सली की मासूम बेटी ने निबंध में लिखा कि नक्सली विकास में बाधा पहुंचाते हैं। नेहा ने नक्सलियों के क्रूर रूप का भी ज़िक्र किया एवं बताया कि कैसे ये लोग आम आदमी पर ज़ुल्म करते हैं।

अब स्थानीय कैडरों का नक्सलवाद से मोह भंग हो रहा है। वे मुख्यधारा से जुड़ने लगे हैं और क्षेत्र के विकास की बात भी कर रहे हैं।

नक्सलियों के आतंक पर भारी पड़ रहा छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों का जज्बा।

देवकी शर्मा नाम की महिला चौराहे पर भीख मांगा करती थीं, इन्होंने भीख मांग कर 6 लाख रुपया इकट्ठा कर रखा था। 14 फरवरी को पुलवामा में CRPF के काफिले पर हुए आतंकी हमले के कारण देवकी काफ़ी शोक में थीं। इसलिए अपनी जमा राशि शहीदों के परिजनों को दान कर दिया।

एक अनजान गाड़ी सुरक्षाबलों के काफिले के इतने करीब आखिर पहुंच कैसे गई? सुरक्षाबलों की इतनी बड़ी संख्या की सुरक्षा में आखिर कहां चूक हो गई? पुलवामा हमले के बाद सुरक्षा को लेकर ऐसे तमाम सवाल खड़े हो गए हैं।

एक समय में बीहड़ में आतंक का पर्याय रहे डकैत मलखान सिंह भले ही अपनी बंदूक छोड़ चुके हों लेकिन पुलवामा घटना से वे इतने आहत हुए हैं कि उन्होंने ऐलान किया है कि सरकार यदि अनुमति दे तो हम पाकिस्तान को धूल चटा देंगे।

जो लोग खुद कैद में हों, अपने किसी गुनाह की सजा काट रहे हों, लेकिन अगर देश पर आंच आए तो वे भी उठ खड़े हो जाएं। देश के लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विपदा में ढाल बन जाएं। ऐसा तो हिंदुस्तान में ही हो सकता है।

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