FATF में ब्लैकलिस्ट होने से पाकिस्तान को बचा पाएंगे तुर्की और मलेशिया?

FATF ने पाकिस्तान को 33 शर्तों की एक सूची थमा रखी है जिन्हें पूरा करने पर ही उसे ग्रे-लिस्ट से हटाया जाएगा और यदि वह नियत समय-सीमा के भीतर सारी शर्तें पूरी नहीं कर पाता है तो उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा।

FATF, Imran Khan

पाकिस्तान पर मंडरा रहा FATF की ब्लैकलिस्ट में जाने का खतरा।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) अगले सप्ताह पहली बार भारत आ रहे हैं। क्या इस यात्रा में कुछ बड़े ऐलान हो सकते हैं या मोदी जी की पिछले सितंबर की अमेरिका यात्रा की तरह इस यात्रा में भी प्रतीकात्मक महत्व की ही बातें होंगी? ब्रितानी प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन ने अपने मंत्रिमंडल के तीन बड़े मंत्रालय भारतीय मूल के नेताओं को दिए हैं। क्या यह भारत के साथ बरसों से लटकी आ रही व्यापार संधि करने की तैयारी है और क्या Corona वायरस का फैलाव थम रहा है या फिर असली ख़तरा अभी बाक़ी है?

FATF, Imran Khan
पाकिस्तान पर मंडरा रहा FATF की ब्लैकलिस्ट में जाने का खतरा।

पेरिस में आज से Financial Action Task Force या FATF का वार्षिक अधिवेशन शुरू हुआ है जिसमें पाकिस्तान की अर्ज़ी पर विचार होगा। FATF का काम काले धन के कारोबार और आतंकवादियों को पैसा देने वाली संस्थाओं की रोकथाम करना है। जो देश काले धन और आतंकवाद को पैसा देने वाली संस्थाओं की रोकथाम के लिए कड़े कदम नहीं उठाते उन्हें ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है जिसके बाद उन्हें विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और एशियन विकास बैंक जैसी संस्थाओं से पैसा नहीं मिल सकता। ब्लैकलिस्ट में डालने से पहले ऐसे देशों को चेतावनी के साथ-साथ आवश्यक कदमों की एक लिस्ट दी जाती है जिन्हें एक नियत समय-सीमा के भीतर उठाना ज़रूरी होता है। जब तक FATF उन क़दमों से संतुष्ट नहीं हो जाता तब तक ऐसे देशों को ग्रे-लिस्ट में रखा जाता है। पाकिस्तान पिछले दो सालों से ऐसी ही ग्रे-लिस्ट में है।

FATF ने पाकिस्तान को 33 शर्तों की एक सूची थमा रखी है जिन्हें पूरा करने पर ही उसे ग्रे-लिस्ट से हटाया जाएगा और यदि वह नियत समय-सीमा के भीतर सारी शर्तें पूरी नहीं कर पाता है तो उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा। पाकिस्तान को दी गई 33 शर्तों की सूची में आतंकवादियों को पैसा देने वाली संस्थाओं पर पाबंदी लगाने के साथ-साथ लश्कर और जैश जैसे आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध लगाना और हाफ़िज़ सईद, ज़की उर रहमान लखवी और मसूद अजहर जैसे आतंकियों को सज़ा दिलवाना शामिल है। इसीलिए पाकिस्तान ने पिछले साल मरकज़ और जमात उद दावा जैसे संगठनों पर पाबंदियां लगाई थीं और पिछले सप्ताह हाफ़िज़ सईद को आतंकवादियों को पैसा देने के आरोपों में 11 साल की सज़ा दिलवाई है।

FATF के मौजूदा अधिवेशन में पाकिस्तान की दलील होगी कि उसने 33 में से बहुत सी शर्तें पूरी कर दी हैं। लेकिन भारत मसूद अजहर और ज़की उर रहमान लखवी के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न करने और पुलवामा हमले जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देने जैसी बातें उठा कर दबाव बनाए रखेगा। भारत FATF का सदस्य है लेकिन पाकिस्तान नहीं है। इसीलिए पाकिस्तान तुर्की और मलेशिया के साथ दोस्ती बढ़ाने में लगा है। क्योंकि ये दोनों भी चीन की तरह FATF के सदस्य हैं। चीन के साथ-साथ अब तुर्की और मलेशिया भी पाकिस्तान की हिमायत में खड़े होने लगे हैं। भारत पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट कराना चाहता है। लेकिन उसके लिए सभी 39 सदस्यों की सर्वसम्मति होना ज़रूरी है। चीन, तुर्की और मलेशिया के चलते यह होना कठिन है। लेकिन यह भी लगभग तय है कि पाकिस्तान जब तक 33 में से अधिकतर शर्तें पूरी नहीं कर देता तब तक भारत के दबाव के चलते ग्रे-लिस्ट से बाहर नहीं आ पाएगा।

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शायद इसी बात को भांपते हुए प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने पिछले हफ़्ते तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब अर्दवान को पाकिस्तान की यात्रा पर बुलाया था। डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) की भारत यात्रा से पहले कश्मीर का मुद्दा भी उठवाना था और इसके लिए बड़बोले अर्दवान से बेहतर शायद कोई नहीं हो सकता था। वे यूरोप के नेताओं को खुले आम बुरा-भला कहने के लिए जाने जाते हैं और तुर्की को कमाल अतातुर्क की उदारपंथी नीतियों के रास्ते से मोड़ कर उस्मानिया सल्तनत की इस्लामी नीतियों की तरफ़ धकेलने में लगे हैं।

इसलिए कश्मीर के दमन के लिए भारत को पाकिस्तानी संसद में लताड़ते समय वे यह भूल गए कि उनकी सरकार पिछले 40 बरसों से कुर्दों के साथ क्या करती आ रही है। जम्मू-कश्मीर की स्थिति तुर्की के कुर्दों से तो लाख गुना बेहतर रही है और है। गलीपोली प्रायद्वीप की लड़ाई को लेकर लाहौर की समर्थन रैली का गुणगान करते समय वे यह भी भूल गए कि 1915 से 1919 के बीच कैसे जर्मनी के साथ मिल कर तुर्की की सेना ने किस बेरहमी से आर्मीनिया के बीस लाख ईसाइयों का नरसंहार किया था। हिटलर और उसके नात्सियों ने यहूदियों के बर्बर दमन और नरसंहार की जो-जो तरकीबें अपनाई थीं उन सबको ईजाद करने वाली तुर्की की उस्मानिया सल्तनत थी। जर्मन सैनिकों और शासकों ने Holocaust की कला तुर्की से सीखी थी।

बहरहाल डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) इतने भोले नहीं हैं कि वे अपनी भारत यात्रा से एक सप्ताह पहले अर्दवान को बुला कर कश्मीर पर कराई बयानबाज़ी के पीछे छिपी पाकिस्तान की खीझ को न समझें। संसद में इंपीचमेंट के बाद पड़ रहे नैतिक दबाव का उन्हें एहसास है। वे अपने आप को कैनडी, रेगन, बुश, क्लिंटन और ओबामा से कहीं बड़ा राष्ट्रपति मानते हैं और सीनियर बुश की तरह केवल एक कार्यकाल के बाद ही सिमटना नहीं चाहते। उन्हें मालूम है कि अमेरिका के चुनावों की हार-जीत पचास राज्यों में नहीं बल्कि गिनती के उन राज्यों में तय होती है जिन्हें स्विंग स्टेट कहा जाता है। इस बार के चुनाव में फ़्लोरिडा, पेंसिलवेनिया, मिशिगन, उत्तरी कैरलाइना, एरिज़ोना, विस्कोंसिन और मिनिसोटा वे राज्य हैं जो अगले राष्ट्रपति की जीत तय करेंगे। इन राज्यों में भारत के लोगों की आबादी डेढ़ से दो प्रतिशत के बीच है जिनका वोट निर्णायक हो सकता है।

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वोट से भी ज़्यादा निर्णायक पैसा और सामाजिक प्रभाव है जो अमेरिका में बसे भारतीयों के पास है। अमेरिका का भारतीय समुदाय यहूदी समुदाय के बाद सबसे मालदार और शिक्षित समुदाय है। अमेरिकी चुनावों में चंदा बहुत अहम होता जिसके सहारे चुनाव प्रचार चलता है। लेकिन चंदे से ज़्यादा ट्रंप (Donald Trump) को भारतीय समाज के उस प्रभाव की ज़रूरत है जिसका प्रयोग वे डॉक्टर, वकील, प्रबंधक और निवेश सलाहकार होने के नाते लोगों को ट्रंप की ओर झुकाने में कर सकते हैं। एक लाख लोगों की क्षमता वाले अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम की रैली का आयोजन सत्ता के दुरुपयोग और मनमानी के आरोपों से घिरे ट्रंप के लिए लोकप्रियता की हवा बांधने का काम करेगा। ट्रंप (Donald Trump) ने पहुंचने से पहले ही स्वागत के लिए सड़कों पर उतर आने वाले लाखों लोगों की डींगें मारनी शुरू कर दी हैं जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वे इस यात्रा को लेकर कितने उत्साहित हैं।

लेकिन ट्रंप (Donald Trump) एक मंजे हुए कारोबारी भी हैं जो उत्साह की झोंक में अपनी यात्रा के असली मक़सद को भूल जाएं ऐसा नहीं हो सकता। उनकी शिकायत रही है कि भारत ने उनके कार्यकाल में रक्षा उपकरणों का कोई सौदा नहीं किया। शायद इसीलिए मोदी सरकार ने यात्रा से पहले ही लॉकहीड मार्टिन से ढाई अरब डॉलर के सैनिक हैलीकॉप्टर ख़रीदने की तैयारी कर रखी है। कुल मिलाकर कोई दस अरब डॉलर के सौदे होने का अनुमान है। इनके अलावा ट्रंप की कोशिश यह भी रहेगी कि भारत के उद्योगपति अमेरिका में कुछ और निवेश करने की घोषणाएं करें ताकि वे वापस घर जाकर चुनाव रैलियों में भारत से नौकरियां लाने के दावे कर सकें। भारतीय कंपनियां अमेरिका में 18 अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश कर चुकी हैं और ट्रंप (Donald Trump) के साथ होने वाली बैठक में निवेश की और घोषणाएं भी हो सकती हैं।

सवाल उठता है कि बदले में भारत क्या चाहेगा। भारत चाहेगा कि GSP व्यवस्था के तहत भारतीय निर्यातों को मिलने वाली शुल्क की छूट बहाल हो जाए। हालांकि, 160 अरब के व्यापार में GSP के तहत होने वाले 25 करोड़ डॉलर के शुल्क मुक्त व्यापार की रकम बहुत छोटी है लेकिन उसका प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा है। IT उद्योगों के महासंघ नैस्कॉम के अध्यक्ष ने शिकायत की है कि H1B वीज़ा देने के मामले में भारत की कंपनियों के साथ भेदभाव बरता जा रहा है। अगर अमेरिका सच में चाहता है कि भारतीय कंपनियां अमेरिका में अपना निवेश बढाएं तो भारत से आने वाले लोगों को मिलने वाले H1B वीज़ाओं की संख्या बढ़ानी होगी। ट्रंप (Donald Trump) के साथ उनकी परमाणु ऊर्जा की सहायक मंत्री रीता बरनवाल भी आ रही हैं और भारत भी ऊर्जा क्षेत्र में निवेश कराने के लिए उत्सुक है। इसलिए हो सकता है परमाणु ऊर्जा को लेकर भी किसी सौदे की बात हो।

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भारत की आर्थिक मंदी को देखते हुए इस समय भारत को व्यापार बढ़ाने की ज़रूरत अमेरिका से कहीं ज़्यादा है। फिर भी ऐसा लगता नहीं कि America First का मंत्र जपने वाले ट्रंप अभी भारत के माल और सेवाओं के लिए अपनी मंडियों के दरवाज़े खोलते के लिए तैयार हैं। ऐसे में भारत चाहेगा कि अमेरिका की प्रशांत नीति, ब्लू डॉट नेटवर्क और संयुक्त राष्ट्र को लेकर कुछ ऐसे ऐलान हो सकें जिनसे भारत और अमेरिका के रिश्ते अगले चरण में प्रवेश कर सकें। भारत की नज़र अफ़ग़ानिस्तान पर भी हैं जहां अमेरिका, तालेबान के साथ समझौता करके निकलने को बेताब है। भारत को वहां अपने निवेश और प्रभाव की सुरक्षा की चिंता है।

इधर यूरोपीय संघ से निकलने के बाद ब्रिटेन को उन बड़े व्यापारिक साझीदारों के साथ नई व्यापार संधियां करने की चिंता है जिनके साथ अब तक ब्रिटेन यूरोपीय संघ के ज़रिए व्यापार करता था। इनमें अमेरिका और चीन के साथ-साथ भारत भी शामिल है जिसके साथ अभी तक व्यापार संधि नहीं हो सकी है। पिछले बीस सालों के भीतर ब्रिटेन भारत के साथ व्यापारिक साझेदारी में दूसरे से सत्रहवें स्थान पर चला गया है। प्रधान मंत्री बोरिस जॉन्सन ने पिछले सप्ताह के फेरबदल में अपने मंत्रिमंडल के तीन चोटी के पद भारतीय मूल के मंत्रियों को दे दिए हैं। पाकिस्तानी मूल के चांसलर या वित्तमंत्री साजिद जाविद को हटा कर इन्फ़ोसिस के संस्थापक नारायणमूर्ति के जमाई ऋषि सुनाक को नया वित्तमंत्री बनाया गया है। गुजराती मूल की प्रीति पटेल पहले से ही गृहमंत्री हैं और आगरा में जन्मे और ब्रिटेन में पढ़े आलोक शर्मा को वाणिज्य मंत्री और इसी वर्ष ग्लासगो में होने वाली पर्यावरण शिखर बैठक का अध्यक्ष बनाया गया है।

लेकिन किसी भी व्यापार संधि से पहले भारत चाहता है कि भारत से आने वाले लोगों को ब्रिटेन के वीज़ा लेने में होने वाली अड़चनों को दूर किया जाए ताकि उसके छात्रों, कारोबारियों और कर्मचारियों को ब्रिटेन आने में होने वाली कठिनाइयां दूर हो सकें। लेकिन आप्रवासियों की संख्या कम करने के नारे पर यूरोपीय संघ से बाहर हुई बोरिस जॉन्सन की सरकार के लिए भारतीय आप्रवासियों का आना आसान करना राजनीतिक रूप से कठिन होगा। गृहमंत्री प्रीति पटेल ने प्वाइंट आधारित आप्रवासन नीति लागू करने की घोषणा की है ताकि हाई स्किल वाले पढ़े-लिखे लोगों का आना आसान हो सके। देखना यह है कि ऐसे आप्रवासियों की हर साल क्या सीमा तय की जाती है।

इस बीच चीन में Corona वायरस के फैलाव की रफ़्तार धीमी पड़ रही है लेकिन मरने वालों की संख्या सत्रह हज़ार तक जा पहुंची है जो SARS, MERS और H1N1 जैसे वायरसों से मारे गए लोगों की कुल संख्या के दोगुने से भी ज़्यादा है। वैज्ञानिकों ने वायरस के टीके पर काम शुरू कर दिया है लेकिन इसका जानवरों और इंसानों पर परीक्षण करने, दवा का लाइसेंस लेने और उसे बड़ी मात्रा में सुलभ कराने में साल से कम नहीं लगेगा। तब तक देखना यह होगा कि चीन में यातायात और कामकाज शुरू होने के बाद वायरस के फैलाव की रफ़्तार कितनी रहती है। गर्मियां आने पर ज़ुकाम के दूसरे वायरसों की तरह यह भी शांत पड़ता है या नहीं और इस सारी प्रक्रिया में यह वायरस कितने लोगों में फैलता है और कितना बदलता है। वायरस के फैलाव पर निर्भर करेगा कि चीन और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर कितना असर पड़ता है और वायरस के काबू में आने के बाद अर्थव्यवस्था कितनी तेज़ी से उबरती है। मीर साहब की पंक्तियां हैं जो संदर्भ के अनुकूल तो नहीं हैं लेकिन हाल में गुज़रे वैलेंटाइन सप्ताह की वजह से ध्यान में आ रही हैं।

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p style=”text-align: justify;”>इब्तिदा-ए-इश्क है रोता है क्या,
आगे-आगे देखिए होता है क्या!

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