World View with Shivkant

पिछले हफ़्ते की घटनाओं पर नज़र डालें तो दुनिया में कुछ-कुछ वैसा ही होता नज़र आ रहा है। अमेरिका की ट्रंप सरकार ने ऐसी हवा बांधने की कोशिशें शुरू कर दी हैं कि जैसे कोविड-19 के वायरस को चीन ने अपनी किसी प्रयोगशाला में एक हथियार की तरह तैयार करके दुनिया पर छोड़ दिया हो।

एक से दो करोड़ प्रवासी मज़दूरों की बात भी कर लें तो 10 से 20 हज़ार करोड़ रुपए महीने के ख़र्च पर इन्हें सड़कों पर ठोकरें खाने और अपने साथ वायरस को फैलाने से बचाया जा सकता था। 200 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था में क्या एक-दो महीने एक-दो करोड़ बदहाल लोगों का गुज़र चलाने के लिए अर्थव्यवस्था के एक हज़ारवें हिस्से की गुंजाइश भी नहीं थी?

वायरस वैज्ञानिकों को इस बात की भी चिंता है कि कोविड-19 (Covid19) फैलाने वाले इस वायरस के ख़िलाफ़ शरीरों में पैदा होने वाली इम्यूनिटी कितने समय तक रह सकती है। यह उसी प्रजाति का वायरस है जिनसे फ़्लू फैलता है। फ़्लू के वायरसों के लिए बनने वाली इम्यूनिटी लंबे समय तक नहीं रहती। इसलिए हर साल टीके लगवाने पड़ते हैं। इन वायरसों के रूप भी बदलते रहते हैं जिसकी वजह से टीकों में भी बदलाव करना पड़ता है। ये सारी बातें कोविड-19 (Covid19) के ख़िलाफ़ जारी जंग को और पेचीदा बनाती हैं

अमेरिका और यूरोप के वैज्ञानिकों का कहना है कि वायरसों का संक्रमण के दौरान रूप बदल लेना एक आम बात है। लेकिन इतने सारे रूप बदलने के पीछे वायरस की क्या ख़ास चाल हो सकती है और इनमें से कौन सा रूप सर्वाधिक घातक और संक्रामक साबित होता है इसका पता और गहन अध्ययनों से चलेगा। फ़िलहाल तो यही कहा जा सकता है कि वायरस के अनेक रूप धर लेने के कारण उसकी कोई एक अचूक दवा तैयार करने का काम और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।

स्वीडन को छोड़ कर दुनिया के लगभग सभी देशों ने लॉकडाउन या तालाबंदी का सहारा लिया जो सात सौ साल पहले प्लेग की रोकथाम के लिए अपनाई गई थी। लेकिन लोगों और उनके कारोबारों को अनिश्चित काल तक तालेबंदी में नहीं रखा जा सकता।

अपनी विनाशलीला से पूरी दुनिया को नज़रबंद कर देने वाले कोरोनावायरस Covid-19 के फैलाव की रफ़्तार धीमी पड़ने लगी है। चीन में पिछले दस दिनों से किसी की Covid-19 से मृत्यु नहीं हुई है।

पिछले दो दिनों से अमेरिका के तेल आढ़त बाज़ारों में तेल मुफ़्त से भी सस्ता बिक रहा है। मतलब यह कि यदि आप मई में तेल की सप्लाई लेने को तैयार हों तो बेचने वाले दलाल तेल मुफ़्त में देने के साथ-साथ ग्राहक को दो-तीन डॉलर प्रति बैरल का कमीशन भी देने को तैयार हैं।

डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले शुक्रवार को तीन ट्वीट किए। मिनिसोटा की आज़ादी! मिशिगन की आज़ादी और वर्जीनिया की आज़ादी! आपको क्या लगता है केवल कन्हैया कुमार और शाहीन बाग़ के लोग ही आज़ादी के नारे लगाना जानते हैं? ट्रंप भी किसी से पीछे नहीं हैं।

कोरोनावायरस (Covid-19) की महामारी को शुरू हुए महज़ 125 दिन ही हुए हैं। इतने से अरसे के भीतर ही 19 लाख लोग बीमार हो चुके हैं और एक लाख 15 हज़ार की मौत हो चुकी है।

ऐसी मानसिकता और वायरस अंधा आतंक ही किसी को उन स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिस वालों पर हमले करने के लिए बाध्य कर सकता है जो समाज की यानी आपकी ही रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। क्या बाहर दिए जलाने के साथ-साथ हमें अंदर की सामाजिकता का दिया जलाने की ज़रूरत नहीं है?

भारत अगर अपने यहां फैलते संक्रमण की रोकथाम में कामयाब हो जाए तो बदले हुए हालात में भारतीय कंपनियों को यूरोप और अमेरिका में पांव पसारने के अवसर भी मिल सकते हैं।

भारत सरकार और भारत के उद्योगपति अगर इस मौके का लाभ उठाएं और वही सामान अपने यहां बनाने पर ज़ोर दें तो आगे चल कर यही संकट फ़ायदे का सौदा भी साबित हो सकता है।

ट्रंप साहब चाहे जितने जीत के दावे और आइसिस ख़त्म करने के दावे करते फिरें। असलियत में यह समझौता अगर किसी की जीत के रूप में देखा जा सकता है तो वह तालिबान की जीत है।

अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump भारत दौरे पर हैं। पर सवाल उठता है कि इस यात्रा और मेहमान नवाज़ी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत को क्या हासिल होगा।

FATF ने पाकिस्तान को 33 शर्तों की एक सूची थमा रखी है जिन्हें पूरा करने पर ही उसे ग्रे-लिस्ट से हटाया जाएगा और यदि वह नियत समय-सीमा के भीतर सारी शर्तें पूरी नहीं कर पाता है तो उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा।

क्या डोनाल्ड ट्रंप इंपीचमेंट से बिल क्लिंटन की तरह कोई सीख लेंगे और अपने तौर-तरीक़े बदलेंगे? ब्रिटन को यूरोपीय संघ से बाहर लाने के बाद क्या प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन अब पहले से बेहतर व्यापार संधियां कर पाएंगे?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इजराइली-फिलिस्तीनी शांति योजना Deal of the Century है या Slap of the Century? अमेरिकी सेनेट में दो हफ़्ते से चल रही इम्पीचमेंट की सुनवाई के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता गिर क्यों नहीं रही है और एक छोटे देश के लिए दुनिया की मंडी में अकेले व्यापार करना आसान नहीं होगा यह जानते हुए भी ब्रिटेन के लोग यूरोपीय संघ से बाहर निकलने को आमादा क्यों हुए?

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