Black Lives Matter आंदोलन और डोनाल्ड ट्रंप की बदनीयती

Black Lives Matter आंदोलन से किसी नाटकीय बदलाव की उम्मीद करने से पहले हमें पश्चिमी एशिया के अरब देशों में चले उस अरब स्प्रिंग या वसंत आंदोलन को याद कर लेना चाहिए जिसके बाद लोकतंत्र के नए वसंत आने की बजाय तानाशाही के पतझड़ों की वापसी हुई थी।

Black Lives Matter, Black Lives Matter protest

Black Lives Matter protest थमने की बजाय बढ़ता जा रहा है। फोटो स्रोत- सोशल मीडिया

देश के सुरक्षाबल और सेना किस की रक्षा के लिए होते हैं? देश के संविधान और उसमें समाहित मूल्यों की या फिर नेताओं और शासकों की? यदि संविधान और क़ायदे-कानून को ताक पर रखते हुए देश का शासक सेना को विरोध के अधिकार का प्रयोग करने वाली जनता पर हमला करने का आदेश दे तो क्या उसे अपने ही देशवासियों पर चढ़ जाना चाहिए? लोकतंत्र में सेना और सुरक्षा बलों का कर्तव्य केवल ऊपर से मिलने वाले हुक्म को बजाना है या फिर केवल संविधान सम्मत हुक्म को मानना है? ऊपर से मिलने वाला हुक्म संविधान सम्मत है या नहीं इसका फ़ैसला कौन करेगा?

ये सवाल पिछले सोमवार को दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र अमेरिका की सेना के सामने अचानक उठ खड़े हुए. सवाल उठाने वाला और कोई नहीं बल्कि देश की सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक चौंका देने वाली हरकत थी। मिनियापोलिस में 46 वर्षीय अफ़्रीकावंशी काले नागरिक जॉर्ज फ़्लोएड की निर्मम हत्या के कारण समूचे देश और दुनिया भर में काले और आदिवासी लोगों के साथ होने वाले भेदभाव के विरोध में Black Lives Matter या संक्षेप में BLM प्रदर्शन हो रहे थे। आम तौर पर शांतिपूर्ण तरीके से हो रहे प्रदर्शनों के शुरुआती दिनों में आगज़नी और लूटपात की घटनाएं भी हुई थीं।

आगज़नी की एक घटना राष्ट्रपति सदन वाइट हाउस के पास भी हुई। प्रदर्शनों के दौरान, राष्ट्रपतियों का चर्च कहे जाने वाले ऐतिहासिक सेंट जॉन चर्च में थोड़ी सी आग लग गई थी जिससे चर्च को मामूली सा नुक़सान हुआ था। ट्रंप साहब को इस पर बड़ा ताव आया। वैसे भी वे दिनों-दिन बढ़ते जा रहे विरोध प्रदर्शनों से भन्ना चुके थे। उन्होंने राज्यों के गवर्नरों और शहरों के मेयरों से बार-बार कहा कि वे सख़्ती से पेश आएं और जंग के मैदान को डोमिनेट करने के लिए, यानी प्रदर्शनों को दबाने के लिए नेशनल गार्ड सेना का इस्तेमाल करें वर्ना वे स्वयं सेना भेज कर सब को ठंडा कर देंगे। लेकिन मेयरों और गवर्नरों को पुलिस की बर्बरता को लेकर उठ रहे उबाल का अंदाज़ा था इसलिए वे ट्रंप की बातों में आकर स्थिति को और नहीं बिगाड़ना चाहते थे।

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ताव में आए ट्रंप साहब ने अपने वाइट हाउस की सुरक्षा के लिए नेशनल गार्ड सैनिकों को बुला लिया और प्रदर्शन करने वालों पर ख़ूंखार कुत्ते और भीषण अस्त्र छोड़ने की धमकी दी। प्रदर्शनकारियों को वाइट हाउस के आसपास से खदेड़ दिया गया और सुरक्षा दायरे को बढ़ाते हुए लोहे की दस-दस फ़ुट ऊंची जालियों की बाड़ लगा दी गई। लेकिन ट्रंप को सप्ताहांत का ज़्यादातर वक़्त वाइट हाउस के सुरक्षित तहख़ाने में बिताना पड़ा। सोमवार को सलाहकारों ने राष्ट्रपति का प्रभुत्व जमाने की योजना बनाई। शाम को सात बजे कर्फ़्यू लगा दिया गया और नेशनल गार्ड सैनिक, प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस और फ़्लैश के गोले छोड़ते हुए आगे बढ़े। सेंट जॉन चर्च पहुंचने के लिए लाफ़ेयत चौक और 16th Street को खाली करा लिया गया ताकि ट्रंप साहब सेंट जॉन चर्च के सामने बाइबल थाम कर अपना फ़ोटो खिंचवा सकें। वॉशिंगटन डीसी की मेयर ने इस सड़क का नाम बदल कर अब Black Lives Matter Plaza रख दिया है जिसे पूरी सड़क के आरपार विशालकाय अक्षरों में पीले रंग से लिखा गया है।

अमेरिका में काले-गोरे का भेद और 51 साल का नाकाम सफर!

राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले वाइट हाउस के लॉन में एक भाषण दिया जिसमें उन्होंने उन राज्यों में सेना भेजने की धमकी दी जहां के गवर्नर दंगों पर काबू नहीं कर पा रहे थे। उसके बाद वे वाइट हाउस से सेंट जॉन चर्च तक पैदल गए। हैरत की बात यह है कि इस पैदल मार्च में उनके साथ एटोर्नी जनरल विलियम बार के साथ-साथ रक्षा मंत्री मार्क एस्पर और अमेरिका के सेना प्रमुख जनरल मार्क मिली अपनी लड़ाई की वर्दी पहने हुए थे। अमेरिका में सेनाध्यक्ष आम तौर पर राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहते हैं और नागरिक आयोजनों में लड़ाई की वर्दी पहन कर नहीं जाते। इसलिए राष्ट्रपति ट्रंप और जनरल मार्क मिली दोनों की कड़ी निंदा हुई।

निंदा की वजह से, दंगों को दबाने के लिए सेना बुलाने की ट्रंप की धमकी को उनके रक्षा मंत्री मार्क एस्पर तक नहीं पचा पाए और उन्हें एक बयान देकर स्पष्ट करना पड़ा कि अमेरिकी सेना का प्रयोग नागरिकों को अनुशासन में लाने के लिए नहीं किया जा सकता। ट्रंप के पूर्व रक्षा मंत्री जनरल जेम्स मैटिस ने ट्रंप की निंदा करते हुए लिखा कि हमारे संविधान का मज़ाक बनाने के लिए वे ट्रंप पर ग़ुस्सा हैं और हैरत में हैं। ट्रंप उनके जीवन के ऐसे पहले राष्ट्रपति हैं जो लोगों को एकजुट करना तो दूर उसका नाटक भी नहीं करते।

अमेरिका की अकड़, चीन की चालबाजी और कोरोना से जूझती दुनिया

अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री और सेना प्रमुख जनरल कोलिन पावल ने कहा ट्रंप झूठे हैं और संविधान से भटक रहे हैं, इसलिए वे डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडन को अपना वोट देंगे। अमेरिकी सेनाओं के पूर्व प्रमुख एडमिरल माइक मलेन ने लिखा, नेशनल गार्ड और सुरक्षा बलों के सैनिकों को जबरन और हिंसक तरीके से लाफ़ेयत चौक का रास्ता साफ़ करते देख कर मुझे ग्लानि हुई। पूर्व सेना प्रमुख जनरल रिचर्ड मायर समेत अनेक वरिष्ठ सैनिक अधिकारियों ने सेना को बुलाने और नागरिकों पर उसका प्रयोग करने को लेकर ट्रंप और जनरल मार्क मिली की घोर निंदा की है।

सवाल उठता है कि क्या ट्रंप और उनके सलाहकार आलोचनाओं से कोई सीख लेंगे? चुनाव के सिर पर होने को लेकर ही सही, लेकिन लगता है कि ट्रंप को ख़िलाफ़ होते जनमत से डर लगने लगा है। उन्होंने नेशनल गार्ड सेना को वाइट हाउस से हटाने का ऐलान कर दिया है और अपनी बात काटने के लिए रक्षा मंत्री मार्क एस्पर को अभी तक बाहर का रास्ता नहीं दिखाया है। Black Lives Matter आंदोलन के शुरुआती दिनों में वे आगज़नी और लूटपाट से हो रही सम्पत्ति की हानि को लेकर ज़्यादा परेशान लगते थे। उनके समर्थकों ने Black Lives Matter के जवाब में जनसम्पत्ति के बचाव के लिए Buildings Matter Too और Send in the Troops जैसे नारे चलाने की कोशिशें कीं। लेकिन जन आक्रोश की लहर के सामने ये तर्क टिक नहीं पाए।

कोविड-19 के बदलते रूप और ब्रिटेन की गहराती दुविधा

फ़िलेडेल्फ़िया के प्रमुख अख़बार फ़िलेडेल्फ़िया इन्क्वायरर के कार्यकारी संपादक को Buildings Matter Too की सुर्खी लगा कर आगज़नी और लूटपाट में हो रहे जनसंपत्ति के नुकसान की बात उठाने की ग़लती करने के लिए इस्तीफ़ा देना पड़ा। ख़बर को इस शीर्षक के साथ छापने के उनके फ़ैसले को इमारतों से काले नागरिकों के जीवन और अधिकारों की बराबरी करने की संवेदना हीनता का दोषी माना गया। न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी रिपब्लिकन पार्टी के सेनेटर टॉम कॉटन का एक लेख छापने की भूल की थी जिसका शीर्षक Send in the Troops था। सेनेटर ने अपने लेख में आगज़नी और लूटपाट को रोकने के लिए सेना बुलाने के ट्रंप के इरादों की पैरवी की थी। न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकारों ने सेना बुलाने की पैरवी करने वाले लेख के प्रकाशन के विरोध में प्रकाशकों को पत्र लिखे। प्रकाशकों को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने लेख के साथ भूल सुधार भी छाप दिया। काश, न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकारों ने ऐसा साहस इमरान ख़ान और ख़ालिस्तानियों के भारत विरोधी लेखों के विरोध में भी दिखलाया होता जो आधारहीन आरोपों से भरे थे।

बहरहाल, सेनेटर कॉटन का लेख रिपब्लिकन पार्टी की उस नई रणनीति का हिस्सा लगता है जो Black Lives Matter आंदोलन को अराजकता से जोड़कर ट्रंप को कानून व्यवस्था बहाल करने वाले निर्णायक नेता के रूप में स्थापित करना चाहती है। ठीक उसी तरह जैसे 1968 में चल रहे नागरिक अधिकार आंदोलन के मुकाबले रिचर्ड निक्सन को कानून व्यवस्था के हामी उम्मीदवार के रूप में उतारा और जिताया गया था। अमेरिका को Great या फिर Great Again बनाने के मामले में और कोविड-19 महामारी को काबू में लाने के मामले में दाल न गलने के बाद अब ट्रंप ने अपने आप को Law and Order यानी कानून व्यवस्था बहाल करने वाले राष्ट्रपति के रूप में पेश करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं।

डोनाल्ड ट्रंप को किस चीज से चाहिए आजादी?

इसके उलट Black Lives matter या BLM आंदोलन के नेता अब अमेरिका की पुलिस व्यवस्था में आमूल परिवर्तन कराना चाहते हैं। बहुत से लोगों की मांग है कि पुलिस पर ख़र्च किया जाने वाला पैसा बंद किया जाए और उसे लोगों सामाजिक बेहतरी और विकास पर ख़र्च किया जाए जिससे पुलिस की ज़रूरत ही न पड़े। कुछ लोग पुलिस के प्रशिक्षण में बदलाव लाने और उन्हें सैनिक के रूप में तैयार करने की बजाय रक्षक और सहायक के रूप में प्रशिक्षित किया जाए। पुलिस हीन समाज और निहत्थी पुलिस वाले समाज की बातें सुनने में ज़रूर दिलचस्प लगती हैं। लेकिन जिस देश और समाज में बंदूकें रखना मौलिक अधिकार माना जाता हो वहां बिना सशस्त्र पुलिस और बिना पुलिस के आतंकवाद, तस्करी और नस्लवाद जैसी समस्याओं पर कैसे काबू किया जा सकेगा यह सोचने की बात है।

वैसे Black Lives Matter आंदोलन में अब बात कालों के ख़िलाफ़ पुलिस की बर्बरता तक ही सीमित नहीं रही है। अब बात जीवन के हर पहलू में और पूरे नज़रिए में समाए भेदभाव को मिटाने की हो रही है। यही कारण है कि अमेरिका के लगभग सभी छोटे-बड़े शहरों में दुनिया के हर महाद्वीप के बड़े-बड़े शहरों में इस कालों और आदिवासियों के साथ होने वाले भेदभाव के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो रहे हैं। अमेरिका के इतिहास में पिछले 50 वर्षों में इतने बड़े पैमाने पर इतने प्रदर्शन नहीं हुए। अमेरिका के बाहर जिन देशों में काले-गोरे का या आदिवासी-ग़ैर आदिवासी का भेदभाव ज़्यादा है वहां प्रदर्शन और उग्र हो रहे हैं। जैसे फ़्रांस में पुलिस की सख़्ती से कई काले लोग मारे जाते हैं और पुलिस के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही होती नज़र नहीं आती। इसी तरह ब्राज़ील में लोग कालों और आदिवासियों के साथ होने वाले भेदभाव के साथ-साथ राष्ट्रपति बोल्सोनारो की नस्लवादी नीतियों को लेकर भी नाराज़ हैं। वे प्रदर्शनों को कुचलने के लिए सेना का प्रयोग करने, सर्वोच्च न्यायालय को बंद कर देने और कोविड-19 महामारी के आंकड़े बंद करने की धमकियां देते रहते हैं।

चीन की इस हरकत के चलते दुनिया भर में फैला Corona Virus

भारत में प्रवासी मज़दूरों के साथ कर्फ़्यू और लॉकडाउन में अपने गांवों को लौटते समय कुछ जगहों पर पुलिस ने जो बर्ताव किया है वह भी कोई कम निंदनीय नहीं है। दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ पुलिस के बर्ताव में जो भेदभाव नज़र आता है वह अमेरिका और फ़्रांस के काले-गोरे के भेदभाव से कुछ कम नहीं है। फिर भी भारत में BLM आंदोलन का अभी तक ख़ास असर नहीं है। इसकी वजह एक तो यह हो सकती है कि कोरोना वायरस का आतंक फैला हुआ है। दूसरे BLM आंदोलन भेदभाव को मिटाने के लिए हो रहे हैं। उन्हें बनाए रखने या फिर किसी पार्टी या सरकार से दुश्मनी निकालने के लिए नहीं। कालों और आप्रवासी अल्पसंख्यकों के साथ हर कदम पर होने वाले भेदभाव के बावजूद अमेरिका और यूरोप में कभी देश के टुकड़े करने या किसी से आज़ादी हासिल करने के नारे नहीं लगते।

फिर भी, BLM आंदोलन से किसी नाटकीय बदलाव की उम्मीद करने से पहले हमें पश्चिमी एशिया के अरब देशों में चले उस अरब स्प्रिंग या वसंत आंदोलन को याद कर लेना चाहिए जिसके बाद लोकतंत्र के नए वसंत आने की बजाय तानाशाही के पतझड़ों की वापसी हुई थी। यह सही है कि दुनिया का हर बेहतर बदलाव किसी न किसी आंदोलन की बदौलत ही आया है। फिर भी कामयाब होने वाले आंदोलनों की संख्या कम ही रही है। क्योंकि व्यवस्था आंदोलनों से कहीं ज़्यादा बलवान होती है। ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी की रणनीति कानून व्यवस्था बहाल करने के बहाने इसी पुरानी व्यवस्था को बनाए रखने की लगती है।

एक दीप खुद के लिए भी जला ही लीजिए!

वही व्यवस्था जिसे BLM आंदोलन उखाड़ फेंकने की मांग कर रहा है। जिसमें काले नागरिकों का दम घुटने लगा है। हारवर्ड विश्वविद्यालय के जनस्वास्थ्य प्रोफ़ेसर डेविड विलियम्स का कहना है कि गोरों को मिलने वाले हर एक डॉलर की तुलना में कालों को केवल 52 सेंट मिलते हैं। गोरे-काले का सदियों से चला आ रहा भेदभाव ही आमदनी की इस विषमता की जड़ है। इस विषमता का असर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और विकास जैसे जीवन के हर पहलू पर पडता है। यही कारण है कि कोविड-19 की महामारी में गोरों की तुलना में कालों की मृत्यु दर दोगुनी है। यही कारण है कि गोरों की तुलना में कालों के गिरफ़्तार किए जाने और पुलिस की वारदात में मारे जाने की संभावना दो से तीन गुना होती है.।

कोविड-19 की महामारी ने विषमता की इस खाई को और गहरा कर दिया है। पिछले दो महीनों के भीतर ही हर चार में से एक अमेरिकी रोज़गार खो चुका है। विश्व बैंक ने चेतावनी दी है कि दुनिया के चार से छह करोड़ लोग ग़रीबी की निम्नतम रेखा से नीचे चले गए हैं। यूरोप, लातीनी अमेरिका, अफ़्रीका और भारत में बेरोज़गारी और आर्थिक बदहाली के आंकड़े भयावह होते जा रहे हैं। लेकिन अमेरिका, चीन और जापान के शेयर बाज़ारों में उछाल आ रहे हैं। जिनकी वजह से दुनिया के धनकुबेर और अमीर से और अमीर होते जा रहे हैं। मगर क्यों? शायद इसलिए कि केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरें घटा कर कर्ज़े लगभग मुफ़्त कर दिए हैं और सरकारों ने आर्थिक बदहाली से उबरने के लिए ख़जाने खोल दिए हैं। बाज़ारों को लगता है कि यह पैसा जिन को उबारने के लिए बहाया जा रहा है उनके पास न रहकर धनकुबेरों की कंपनियों के पास ही जाएगा। यानी विषमता की खाई और गहरी होती जाएगी। शायद यही वजह है कि जॉर्ज फ़्लोएड की निर्मम हत्या के बहाने आंदोलनों की लहर दुनिया भर में फैल गई है। नारे नस्ली और जातीय भेदभाव मिटाने के लग रहे हैं लेकिन बढ़ती आर्थिक विषमता का रोष भी नारे लगाने वालों के ज़हन में है। देखना यह है कि विरोध की यह लहर कोई बदलाव भी ला पाती है या किसी मौसमी बयार की तरह गुज़र जाती है। शाहिद मीर का शेर है:

और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन,
मेरी चादर मिरे पैरों के बराबर कर दे।