अमेरिका में काले-गोरे का भेद और 51 साल का नाकाम सफर!

अमेरिका का राष्ट्रपति अपने नागरिकों का रोष ठंडा करने के लिए शांति और सहानुभूति की बातें करने की बजाय गोलियों से उड़ाने की ऐसी धमकियां दे जिनमें नस्लवादी ज़माने के भड़काऊ नारों की गूंज सुनाई देती हो, तो वह संयोग की बात नहीं हो सकती।

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अमेरिका में जारी है जॉर्ड फ्लॉयड की हत्या के खिलाफ प्रदर्शन। सोर्स- ट्विटर

संयोग की बात है। 51 साल पहले जुलाई के जिन दिनों में नील आर्मस्ट्रोंग और बज़ ऑल्डरिन चांद पर इंसान का पहला क़दम रख रहे थे उन्हीं दिनों धरती पर अमेरिकी राज्य पैन्सिलवेनिया के शहर यॉर्क में अफ़्रीका वंशी काले अमेरिकियों के नागरिक अधिकारों के सवाल पर दंगे चल रहे थे। 51 बरसों के बाद एक अमेरिकी निजी कंपनी का पहला अंतरिक्ष यान दो अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर अंतरिक्ष स्टेशन से जा जुड़ा है लेकिन धरती पर अमेरिका के कम से कम तीन दर्जन बड़े शहरों में अफ़्रीका वंशी काले नागरिकों की दशा को लेकर रोष भरे विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। नील आर्मस्ट्रोंग और बज़ ऑल्डरिन अगर चांद पर ही रह गए होते और अब लौट कर आते तो जॉन कैनेडी की जगह डोनाल्ड ट्रंप के क़ाबिज़ दिखाई देने के अलावा काले अमेरिकियों की दशा में कुछ ख़ास बदलाव नहीं मिलता।

हो सकता है अमेरिका के अंतरिक्ष विमानों का अंतरिक्ष उड़ानों पर जाना और अमेरिका के शहरों में अफ़्रीका वंशी काले नागरिकों की दशा को लेकर दंगे और प्रदर्शन होना एक संयोग की बात हो। लेकिन अमेरिका का राष्ट्रपति अपने नागरिकों का रोष ठंडा करने के लिए शांति और सहानुभूति की बातें करने की बजाय गोलियों से उड़ाने की ऐसी धमकियां दे जिनमें नस्लवादी ज़माने के भड़काऊ नारों की गूंज सुनाई देती हो, तो वह संयोग की बात नहीं हो सकती। महामारी को भुला कर अमेरिका में इतने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन और दंगे हो रहे हैं जितने नागरिक अधिकार नेता मार्टिन लूथर किंग की हत्या के बाद से नहीं हुए। ज़्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से हो रहे हैं। लेकिन मिनियापोलिस, मेम्फ़िस, फ़ीनिक्स, कोलम्बस, एटलांटा, बॉस्टन, लॉस एंजिलिस, फ़िलेडेल्फ़िया और डैलेस में लूटपाट और आगज़नी की घटनाएं भी हुई हैं। भीड़ को भगाने के लिए पुलिस ने आंसू गैस और रबर की गोलियों का प्रयोग किया है और दर्जनों लोगों को चोट आई है। व्यवस्था को बहाल करने के लिए कई शहरों के मेयरों को नेशनल गार्ड सेना को बुलाना पड़ा है। प्रदर्शनों का यह सिलसिला अमेरिका के बाहर भी फैल चुका है। अमेरिका में हो रहे प्रदर्शनों के समर्थन में लंदन समेत ब्रिटेन, यूरोप और कैनडा के शहरों में प्रदर्शन हुए हैं। प्रदर्शनों का नारा है – we can’t breathe – यानी हमारा दम घुटता है।

दंगे और प्रदर्शनों की यह लहर अमेरिका के उत्तरी राज्य मिनिसोटा के सबसे बड़े शहर मिनियापोलिस से हुई। पिछले सोमवार को पुलिस को शिकायत मिली कि जॉर्ज फ़्लोएड (George Floyd) नाम के अफ़्रीकी मूल के व्यक्ति ने सिगरेट ख़रीदने के लिए दुकान में बीस डॉलर का जाली नोट चलाने की कोशिश की। शिकायत दुकान के एक विक्रेता कर्मचारी ने की थी जिसमें उसने यह भी बताया कि जॉर्ज फ़्लोएड (George Floyd) ने जाली बीस का नोट थमा कर सिगरेट का पैकेट ले लिया और उसे लौटाने से इंकार कर दिया। कुछ मिनटों बाद चार पुलिसकर्मी दुकान पर पहुंचे जहां जॉर्ड फ़्लोएड (George Floyd) अपने साथियों के साथ सड़क के किनारे पार्क की हुई अपनी कार में बैठा था। एक पुलिस वाले ने पिस्तौल दिखा कर उसे बाहर आने को कहा और थोड़ी ज़ोर-ज़बरदस्ती के बाद हथकड़ी पहना दी। घटना के उपलब्ध वीडियो से पता चलता है कि जॉर्ज फ़्लोएड (George Floyd) ने हथकड़ी पहनाते वक़्त छूटने की कोशिश ज़रूर की थी लेकिन पहनने के बाद कोई विरोध नहीं किया। जब उसे पुलिस की गाड़ी में थाने ले जाने की कोशिश की गई तब उसने यह कहते हुए मना किया था कि उसे घुटन की बीमारी है। इसलिए वह तंग जगह में नहीं बैठ सकता।

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पुलिस वालों ने जॉर्ज फ़्लोएड (George Floyd) को जबरन अपनी गाड़ी में चढ़ाने की कोशिश की जिसका उसने विरोध किया और वह ज़मीन पर गिर गया। उसके बाद उसे काबू में करने के लिए डेरेक शोवन नाम के गोरे पुलिस अफ़सर ने पुलिस की गाड़ी के साथ सड़क पर लेटे जॉर्ज फ़्लोएड की गरदन पर अपना एक घुटना रखा और लगभग नौ मिनट तक उसे उसी तरह दबोचे रहा। गरदन दबने पर जॉर्ज फ़्लोएड(George Floyd)  ने बार-बार गुहार लगाई कि उसका दम घुट रहा है। उसे सांस लेने में तकलीफ़ हो रही है। उसने मदद की गुहार लगाई। अपनी मां को भी पुकारा। लेकिन डेरेक शोवन ने गरदन से अपना घुटना नहीं हटाया। डेरेक शोवन के साथ खड़े उसके तीन साथी पुलिसकर्मियों ने भी डेरेक शोवन को हटने को नहीं कहा। उल्टा उन्होंने भी बारी-बारी से जॉर्ज फ़्लोएड (George Floyd) के शरीर को अपने घुटनों से दबोचने की कोशिशें कीं। वीडियो में नज़र आता है कि लगभग छह मिनट के बाद जॉर्ज फ़्लोएड (George Floyd) निढाल पड़ गया था और अस्पताल में जाते ही उसे मृत घोषित कर दिया गया।

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इस घटना के बाद पुलिस अफ़सर डेरेक शोवन को नौकरी से तो निकाल दिया गया था लेकिन तीन दिनों तक उस पर कोई जुर्म नहीं लगाया गया। मिनियापोलिस के लोग इस बात से नाराज़ हैं कि तीन दिनों बाद जाकर डेरेक शोवन पर थर्ड डिग्री हत्या का जुर्म लगाया गया लेकिन हत्या के समय उसके साथ खड़े उसके तीन साथी पुलिसकर्मियों पर अभी तक कोई जुर्म भी नहीं लगाया गया है। पिछले तीन महीनों के दौरान अमेरिका के दूसरे राज्यों में अफ़्रीकी मूल के ही दो और लोगों की इसी तरह सरे आम हत्या हो चुकी है लेकिन अभी तक किसी पर कोई जुर्म नहीं लगाया गया है। पिछले मार्च में केंटकी राज्य के लुईसविल शहर की चिकित्सा टैक्नीशियन ब्रेओना टेलर को पुलिस ने उसके घर में घुसकर गोलियों से मार डाला। पुलिस का कहना है कि उन्हें शक था कि कोई नशीली दवाओं का तस्कर वहां रहता है। बाद में पता चला कि वह शख़्स तो पुलिस की हिरासत में ही था। इसी तरह पिछली फ़रवरी में जॉर्जिया राज्य के ब्रंसविक शहर में एक पूर्व पुलिस अफ़सर ने सड़क पर दौड़ लगा रहे निहत्थे काले युवक, अहमद आर्बरी को गोली मार दी थी।

इन तीनों घटनाओं में जॉर्ज फ़्लोएड (George Floyd) की हत्या शायद सबसे निर्मम थी और सरे आम की गई थी इसलिए वह जनाक्रोश की लहर का कारण बनी। हत्या के वीडियो को ध्यान से देखें तो जॉर्ज फ़्लोएड (George Floyd) की गरदन में अपना घुटना गड़ाने वाले डेरेक शोवन का अंदाज़ कुछ ऐसा वीभत्स नज़र आता है मानो गोरे अधिनायकवाद ने काले अस्तित्व की गरदन में अपना घुटना गाड़ रखा हो। नरहत्या जैसे अपराध में बड़प्पन समझने की इस भावना की जड़ें उस अंधी न्याय प्रणाली और पुलिस वालों को दिए जाने वाले प्रशिक्षण में है जो नस्लवादी ज़माने से बिना किसी ख़ास बदलाव के चला आ रहा है। अमेरिका में पुलिस को सेना की तरह जूझने का प्रशिक्षण तो दिया जाता है लेकिन समाज का भरोसा जीतने का नहीं। समस्या के कारण को जांचने-परखने से पहले गोली चला देने की परंपरा है और न्याय व्यवस्था ऐसी है कि पुलिस वालों पर जुर्म लगाना और उसे साबित करना किसी सरकार को गिराने से कम नहीं है। सज़ा दिला पाना तो बहुत बड़ी बात है। पुलिस वाले भी उन्हीं पूर्वाग्रहों के दायरे में रहकर काम करते हैं जो गोरे समाज में मौजूद हैं। समाज के पूर्वाग्रह कम दिखाई पड़ते हैं पुलिस के ज़्यादा, क्योंकि वे प्रदर्शनों, मुठभेड़ों और जॉर्ज फ़्लोएड जैसे लोगों की हत्याओं के ज़रिए सामने आ जाते हैं।

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नेताओं का काम लोगों को ऐसे पूर्वाग्रहों से ऊपर उठने के लिए प्रेरित करना होता है। ख़ासकर विश्वव्यापी विपदाओं की घड़ी में। कोविड-19 की महामारी की सबसे बुरी मार अमेरिका के काले अफ़्रीकावंशी लोगों पर पड़ी है। जनसंख्या के अनुपात के हिसाब से, महामारी से मरने वाले काले समुदाय के लोगों की संख्या, गोरे समुदाय के लोगों की तुलना में दो से तीन गुना बताई जाती है। महामारी की वजह से रोज़गार खोने वाले चार से पांच करोड़ लोगों में भी कालों की संख्या गोरों की तुलना में दो से तीन गुना है। ऊपर से नस्लवादी भेदभाव और पुलिस और न्याय व्यवस्था की मार, बरसों से दबे आ रहे रोष को बाहर लाने के लिए काफ़ी है।

ऐसे में राष्ट्रपति ट्रंप के कुछ ग़ैर ज़िम्मेदाराना ट्वीटों ने आग में घी का काम किया है। मिनियापोलिस में दंगे भड़कते ही ट्रंप ने ट्वीट किया था – when the looting starts, the shooting starts – यानी लूटपाट शुरू होते ही गोलियां चलाई जाती हैं। ट्विटर ने इस ट्वीट को हिंसा भड़काने वाला उकसाऊ ट्वीट घोषित कर इसके साथ एक चेतावनी लगा दी थी। क्योंकि यह नारा मार्टिन लूथर किंग के नागरिक अधिकार आंदोलन के दिनों का है। यह काले प्रदर्शनकारियों को गोली मार देने का शौक़ रखने वाले मायामी के नस्लवादी पुलिस प्रमुख वॉल्टर हैडली और सामाजिक अलगाव वाद के पक्षधर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जॉर्ज वैलस का नारा हुआ करता था। ट्विटर के अधिकारियों ने महसूस किया कि ट्रंप साहब पुलिस को और गोरे अधिनायकतावादी समर्थकों को प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाने के लिए उकसा रहे थे। हालांकि, ट्रंप ने इस आरोप का खंडन करने की कोशिश की और ट्विटर को डराने धमकाने की भी। लेकिन ट्विटर अपनी राय पर कायम रहा। जी हां, वही ट्विटर जिसके ज़रिए ट्रंप साहब अपनी सारी कूटनीति और राजनीति की चालें चलते आए हैं।

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उसके बाद जब विरोध प्रदर्शन ट्रंप के अपने घर और राष्ट्रपति आवास तक आ पहुंचे और लोगों ने ट्रंप टावर और वाइट हाऊस का घेराव किया तो ताव में आए ट्रंप ने एक ट्वीट और कर दिया। इस बार उन्होंने कहा अगर प्रदर्शन करने वालों ने ख़ुफ़िया सेवा के घेरे को लांघने की कोशिशें कीं तो – they will be greeted with the most vicious dogs and most vicious weapons – यानी उन पर बेहद ख़ूंखार कुत्ते और घातक हथियार छोड़ दिए जाएंगे। इस फ़िकरे का इतिहास भी नस्लवादी ज़माने के नागरिक अधिकार आंदोलन से जुड़ा है। साठ के दशक में एलाबामा राज्य के शहर बर्मिंघेम का एक नस्लवादी जनसुरक्षा आयुक्त होता था, युजीन बुल कॉनर। वह काले प्रदर्शनकारियों पर पुलिस के कुत्ते और दमकल गाड़ियों की पनतोपें छोड़ने का शौक़ीन था। ट्रंप ने एक बार फिर अपने ट्वीट पर कुछ सफ़ाई देने की कोशिश की लेकिन अफ़्रीकी देशों को शिट होल का नाम देने और काले और लातीनी लोगों के लिए तरह-तरह के लिए घटिया विशेषणों का प्रयोग करने के उनके इतिहास को देखते हुए उनके स्पष्टीकरण को कौन मानने को तैयार होगा?

अमेरिका इस समय बेहद बुरे दौर से गुज़र रहा है। कोविड-19 की महामारी ने एक लाख छह हज़ार लोगों की जान ले ली है और साढ़े अठारह लाख लोगों को वायरस लगने की जानकारी मिल चुकी है। चार करोड़ लोग बेरोज़गारी भत्ते की लाइन में लग चुके हैं और न जाने कितने लाख लोग ऐसे आप्रवासी हैं जिनकी रोज़ी चली गई है फिर भी उन लाइनों में नहीं लग सकते। ऐसे समय में लोगों के दिलों में सदियों के भेदभाव और शोषण से बैठे डर को दूर करने के लिए सहानुभूति और सद्भावना के दो शब्द कहने की बजाय अगर आपका नेता ख़ूंखार कुत्ते और घातक अस्त्र छोड़ने की धमकियां देने लगे तो लोगों के घाव कैसे भरेंगे? कहां तो आप मीडिया को आज़ादी दिलाने और लोगों को अभिव्यक्ति और विरोध की आज़ादी दिलाने के लिए दूसरे देशों पर आर्थिक और सांस्कृतिक प्रतिबंध थोपते फिरते थे! कहां आप ख़ुद ही सामाजिक मीडिया और जनसंचार माध्यमों को डराने धमकाने पर उतर आए हैं! कहां आप हांग-कांग के प्रदर्शनकारियों की आज़ादी के लिए चीन के साथ दुश्मनी मोल लेने के ऐलान करते हैं और कहां अपने घर में अपने ही आवास पर विरोध प्रदर्शन करने आए अपने ही लोगों पर ख़ूंख़ार कुत्ते और हथियार छोड़ने की धमकियां देते हैं!

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इसी चिंता में डूबे लेखकों और विश्लेषकों ने इस सप्ताहांत महामारी के आतंक भुला कर नेतृत्व हीनता के आतंक पर लिखा है। ऐसी घड़ी में जब दुनिया को ऊंचे क़द के विश्वनेताओं की सख़्त ज़रूरत थी उसी समय बौने नेताओं की जमात हावी हो गई है। कोई विश्व स्वास्थ्य संगठन को भंग कर देना चाहता है। कोई यूरोपीय संघ को भंग कर देना चाहता है। ऐसी घड़ी में जबकि हर हाथ को रोज़गार, हर पेट को रोटी की चिंता सता रही है, हर देश कर्ज़ के बोझ से दबा जा रहा है और हर तरफ़ महामारी का साया फैलता जा रहा है। उस घड़ी में जिसे देखिए भाईचारे का हाथ बढ़ाने की बजाए दीवारें खड़ी करने की फ़िराक में है। जब कोई किसी की मदद को ही नहीं आएगा तो विश्वव्यापी समस्याओं का समाधान कैसे हो पाएगा? लेखिका रोक्सान गे ने दो साल पहले अफ़्रीकी देशों के लिए डोनाल्ड ट्रंप के शिटहोल विशेषण से चिंतित होकर न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखा था – no one was coming to save us from the president – ट्रंप से बचाने कौन आएगा? अपनी उसी चिंता की याद दिलाते हुए उन्होंने पिछले सप्ताह फिर लिखा – याद रखें कोई, नहीं आएगा। उनकी बात से अभिनेता और गीतकार पीयूष मिश्रा की कविता इक बगल में चांद होगा की ये पंक्तियां याद आती हैं:

अब न तेरी सिसकियों पे कोई रोने आएगा,
ग़म न कर जो आएगा वो फिर कभी ना जाएगा…

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