ट्रंप का Israel Palestine Conflict पर नया शिगूफा, जारी है Corona Virus का कहर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इजराइली-फिलिस्तीनी शांति योजना Deal of the Century है या Slap of the Century? अमेरिकी सेनेट में दो हफ़्ते से चल रही इम्पीचमेंट की सुनवाई के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता गिर क्यों नहीं रही है और एक छोटे देश के लिए दुनिया की मंडी में अकेले व्यापार करना आसान नहीं होगा यह जानते हुए भी ब्रिटेन के लोग यूरोपीय संघ से बाहर निकलने को आमादा क्यों हुए?

आज इन विषयों पर चर्चा करेंगे लेकिन शुरुआत कोरोना वायरस (Corona Virus) को लेकर मचे हड़कंप से करनी होगी जो अब एक संक्रामक महामारी का रूप ले चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे स्वास्थ्य इमर्जेंसी घोषित कर दिया है। चीन में कोरोना वायरस (Corona Virus) से मरने वालों की संख्या 2002-2003 के SARS वायरस से मरने वालों की संख्या को पार कर गई है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस वायरस के केंद्रबिंदु वूहान शहर के लोगों के हवाले से लिखा है कि इस वायरस से प्रभावित हुए लोगों की संख्या 25 हज़ार तक पहुंच चुकी है। चीन के पड़ोसी देशों के अलावा हांग-कांग और मकाओ ने भी अपनी सीमाएं बंद कर ली हैं। दुनिया की लगभग सारी विमान सेवाओं ने वूहान और मध्य चीन के दूसरे शहरों की उड़ानें बंद कर दी हैं ताकि कोरोना वायरस (Corona Virus) के फैलाव को रोका जा सके।

लेकिन चीन और बाकी दुनिया के सारे प्रयासों के बावजूद कोरोना वायरस (Corona Virus) चीन के अलावा 26 देशों में पहुंच चुका है। फ़िलिपीन्स में तो इस वायरस से एक व्यक्ति की मौत भी हो चुकी है। इस दशक की शुरुआत इस बहस के साथ हुई थी कि जलवायु परिवर्तन दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए कितनी बड़ी और किस तरह की चुनौतियां खड़ी कर सकता है और उनका सामना करने के लिए सरकारों और उद्योगों को अपने-अपने स्तर पर क्या कदम उठाने चाहिए। क्या आर्टिफ़िशल इन्टेलिजेंस या कृत्रिम बुद्धि जैसी नई तकनीकें जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को अवसरों में बदल सकती हैं?

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लेकिन चीन से फैली कोरोना वायरस (Corona Virus) की महामारी ने उस बहस को स्वास्थ्य सुरक्षा की बहस की तरफ़ मोड़ दिया है। क्या नई अज्ञात संक्रामक महामारियों की रोकथाम का बन्दोबस्त किए बिना अर्थव्यवस्था और देश की सुरक्षा की जा सकती है। सूचना क्रांति के बाद देशों ने साइबर रक्षा को अपनी रक्षानीतियों में शामिल किया था। अब SARS, स्वाइनफ़्लू और कोरोनावायरस जैसी तेज़ी से फैलने वाली नई संक्रामक बीमारियां नीति निर्माताओं को सोचने पर विवश कर रही हैं कि स्वास्थ्य रक्षा को देश की रक्षानीतियों में शामिल किए बिना देश और उसकी अर्थव्यवस्था को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है। दुनिया के स्वास्थ्य सुरक्षा सूचकांक की बात करें तो अमेरिका और कनाडा जैसे देश चोटी पर हैं और संक्रामक महामारियों का सामना भारत जैसे देशों की तुलना में ज़्यादा आसानी से कर सकते हैं। भारत इस सूचकांक में 57वें स्थान पर है।

SARS के प्रकोप से 2002-2003 में दुनिया की अर्थव्यवस्था को लगभग 30 अरब डॉलर का नुक़सान हुआ था। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कोरोना वायरस से होने वाला नुकसान उससे कई गुना हो सकता है। इसकी पहली वजह तो यही है कि चीन की अर्थव्यवस्था 2002-2003 की तुलना में लगभग तिगुनी हो चुकी है। इसलिए बीमारी से रुकने वाली आर्थिक गतिविधियों से होने वाला नुक़सान भी उसी अनुपात में बढ़ेगा। दूसरे, दुनिया की अर्थव्यवस्था भी 2002-2003 की तुलना में चीन पर ज़्यादा निर्भर हो चुकी है। मिसाल के तौर पर अमेरिकी कंपनियों को चीनी शहरों में मौजूद अपनी गतिविधियां बंद करनी पड़ रही हैं। अमरीका, यूरोप और भारत के निर्माताओं को डर लगने लगा है कि चीन से आने वाले सामान की किल्लत उनके अपने कारोबार को ठप कर सकती है।

दुनिया के शेयर-बाज़ारों में मचा हड़कंप इसी भय का सूचक है। कोरोना वायरस (Corona Virus) के प्रकोप और नए साल की छुट्टियों की वजह से लगभग दो हफ़्तों से बंद पड़े चीन के शेयर बाज़ार आज पहली बार खुले और उनमें सात से आठ प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई। चीन के केंद्रीय बैंक को इसकी आशंका थी इसलिए रविवार की रात को बैंक ने बाज़ारों की गिरावट रोकने के लिए लगभग 22 अरब डॉलर की ख़रीदारी करने का ऐलान कर रखा था। इसके बावजूद शेयर बाज़ारों की गिरावट को नहीं रोका जा सका। बैंक ने चीनी बाज़ारों में नकदी की मात्रा बढ़ाने के लिए लगभग 150 अरब डॉलर झोंकने का भी ऐलान कर रखा है।

कहने का मतलब यह है कि कोरोना वायरस (Corona Virus) के फैलाव का असर स्वास्थ्य विभागों से ज़्यादा दुनिया के बाज़ारों और कारोबारों में देखने को मिल रहा है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कोरोना वायरस की वजह से दुनिया की अर्थव्यस्था पर दशमलव दो प्रतिशत तक का असर पड़ सकता है जो कि अच्छी ख़बर नहीं है। पिछले साल भर डोनाल्ड ट्रंप की व्यापारिक टकराव और संरक्षणवाद की नीतियां दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाए हुए थीं। अब जब उन्होंने कनाडा, मैक्सिको और चीन के साथ व्यापारिक सुलह की है तो कोरोना वायरस (Corona Virus) ने आ दबोचा है। भारत के उद्योगपति कह रहे हैं कि कोरोना वायरस (Corona Virus) का भारत की अर्थव्यवस्था पर ख़ास असर नहीं होगा। हो सकता है उनकी बात सही साबित हो। लेकिन इतना तया है कि भारत के उद्योग चीन पर आए इस संकट से कोई लाभ तो नहीं ही उठा पाएँगे। जब वे अमरीका-चीन व्यापार विवाद के दौर का कोई लाभ नहीं उठा पाए तो इस संकट से किसी लाभ की उम्मीद करना बेमानी है।

बहरहाल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले सप्ताह अपनी इजराइली-फ़िलस्तीनी शांति योजना पेश की और उसे Deal of the Century बताते हुए फ़िलिस्तीनियों से कहा कि वे इस अभूतपूर्व पेशकश का लाभ उठाएं। दिलचस्प बात यह है कि इस शांति योजना के लिए फ़िलिस्तीनी नेता महमूद अब्बास की न तो सहमति ली गई और न ही वे ऐलान के समय मंच पर मौजूद थे। डोनाल्ड ट्रंप ने 2016 का चुनाव जीतते ही ऐलान कर दिया था कि वे सत्तर साल पुराने इजराइल-फ़िलिस्तीन विवाद को सुलझाने के लिए एक अभूतपूर्व शांति पहल पेश करेंगे। उन्होंने इसे पेश तो किया लेकिन महमूद अब्बास की ग़ैर मौजूदगी में, केवल नेतनयाहू के साथ।

ट्रंप शांति योजना के दो पहलू हैं। ज़मीनी और आर्थिक। ज़मीनी पहलू की ख़ास बात यह है कि पूरा येरुशलम इजराइल को दिया गया है। बदले में येरुशलम के समीपवर्ती कस्बे अबू दिस को फ़िलिस्तीन की नई राजधानी बनाने का प्रस्ताव है। जोर्डन और फ़िलिस्तीनी पश्चिमी किनारे के बीच पड़ने वाली जोर्डन नदी की घाटी पूरी तरह इजराइल को दी गई है और बदले में इजराइल के कुछ फ़िलिस्तीनी इलाके फ़िलिस्तीनियों को देने का प्रस्ताव है। ग़ज़ा पट्टी और पश्चिमी किनारे को जोड़ने वाला एक सड़क मार्ग और उत्तरी और दक्षिणी पश्चिमी किनारे को जोड़ने वाले कुछ भूमिगत रास्ते फ़िलिस्तीनियों को दिए गए हैं और पश्चिमी किनारे की ज़मीन पर अभी कर बनी अवैध इजराइली बस्तियों को इजराइल में शामिल करने का प्रस्ताव है।

डोनाल्ड ट्रंप और इस योजना की रूपरेखा तैयार करने वाले उनके जमाई जेरेल्‍ड कुश्नर का दावा है कि उनकी शांति योजना फ़िलिस्तीनियों को वर्तमान में उनके कब्ज़े की ज़मीन के मुकाबले लगभग दोगुनी ज़मीन देती है। लेकिन फ़िलिस्तीनीयों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि यह योजना पूरा येरुशलम इजराइल को देती है। जोर्डन नदी घाटी भी इजराइल को दी जा रही है जिसकी वजह से प्रस्तावित फ़िलिस्तीनी राज्य पूरी तरह इजराइल से घिर जाएगा और पानी के किसी स्रोत पर फ़िलिस्तीनियों का अधिकार नहीं होगा। सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह योजना इजराइल की उन सारी अवैध इजराइली बस्तियों को वैध बना कर इजराइल को देती है जिन्हें 1967 की लड़ाई और क़ब्ज़े के बाद से इस्राइलियों ने पश्चिमी किनारे पर बनाया है।

योजना के साथ जो नक्शा लगाया गया है उस पर गौर करने से साफ़ हो जाता है कि ट्रंप, उनके जमाई कुश्नर और नेतनयाहू के बड़े-बड़े दावों के बावजूद जितना इलाका फ़िलिस्तीनियों को दिया जा रहा है वह इजराइल बनने से पहले की कुल फ़िलिस्तीनी ज़मीन का मात्र 15 प्रतिशत ही है। अगर इतने में ही सब्र करना था तो फिर फ़िलिस्तीनियों ने 1947 में ही समझौता क्यों नहीं कर लिया जब उन्हें 44 प्रतिशत ज़मीन दी जा रही थी। या फिर 1967 की लड़ाई के बाद समझौता क्यों नहीं कर लिया जब फ़िलिस्तीनियों के पास 22 प्रतिशत ज़मीन थी जिस पर इजराइल ने कब्ज़ा कर लिया था।

चलिए फ़िलिस्तीनी 15 प्रतिशत ज़मीन लेकर मान भी जाएं, तो भी योजना में एक ऐसी शर्त है जिसे पूरा करना असंभव जान पड़ता है और फ़िलिस्तीनियों को वह कतई गवारा नहीं हो सकती। शर्त यह है कि फ़िलिस्तीनियों को अपने इलाके में चार साल तक ऐसी व्यवस्था कायम करके दिखानी होगी जो लोकतांत्रिक हो। जहां न्याय और कानून व्यवस्था हो और आतंकवाद न हो। वैचारिक स्वतंत्रता हो और पारदर्शिता हो। फ़िलिस्तीनी शासन इन शर्तों पर खरा उतरता है या नहीं इसका फ़ैसला इजराइल और अमरीका करेंगे। आलोचकों का कहना है कि इन सारी शर्तों पर तो मिस्र, जोर्डन और सऊदी अरब समेत पश्चिमी एशिया की कोई सरकार खरी नहीं उतर सकती। इसलिए फ़िलिस्तीनी यदि सारी शर्तें मान भी लें तो भी इस शर्त पर फेल कर दिए जाएँगे।

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इसीलिए फ़िलिस्तीनी नेता महमूद अब्बास ने ट्रंप की Deal of the century को Slap of the Century यानी सदी का सबसे कड़ा तमाचा बताते हुए ठुकरा दिया है और इजराइल और अमेरिका के साथ रिश्ते तोड़ लिए हैं। अरब लीग ने भी योजना को ठुकरा दिया है और फ़िलिस्तीन समेत कई अरब देशों में इसके विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। योजना का दूसरा पहलू है पचास अरब डॉलर के निवेश का वादा ताकि नया फ़िलिस्तीनी देश अपनी अर्थव्यवस्था की नींव रख सके। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जिन पचास अरब डॉलर की बात की जा रही है उनका निवेश धनी अरब देशों की सरकारें करेंगी। सवाल उठता है कि यदि अरब देशों को ही पचास अरब डॉलर लगाने थे तो फिर उन्होंने पहले ही अपने फ़िलिस्तीनी भाइयों के लिए क्यों नहीं लगा दिए। ट्रंप और नेतयाहू की चौधराहट की ज़रूरत क्या थी।

दरअसल इजराइली-फिलिस्तीनी् शांति योजना का सारा का सारा किस्सा ही बड़ा दिलचस्प है। एक राष्ट्रपति जिसके ख़िलाफ़ इम्पीचमेंट की कार्यवाही चल रही है और जिसे चुनाव जीतने की पड़ी है, वह एक प्रधानमंत्री से मिलता है जिस पर भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके हैं और जिसे गद्दी बचाने के लिए दूसरी बार चुनाव लड़ना पड़ रहा है। दोनों मिल कर अरब और खाड़ी क्षेत्र के तेल से अमीर तानाशाह और दमनकारी शासकों को जेबें हल्की करने के लिए राज़ी करते हैं और उन फ़िलिस्तीनियों की ज़मीन का सौदा कराने निकल पड़ते हैं जो पिछले सात दशकों से अपनी ज़मीन के लिए लड़ते और हारते आ रहे हैं। यानी कुछ के लिए यह सदी का सबसे बड़ा सौदा है तो कुछ के लिए सबसे कड़ा तमाचा।

जहां तक डोनाल्ड ट्रंप की बात है, तो उनके लिए यह फ़िलिस्तीनियों को तमाचा जड़ने से ज़्यादा इम्पीचमेंट के तमाचे से बचने का एक हथकंडा है। जिस दिन उन्होंने अपनी इस शांति योजना का ऐलान किया उसी दिन सेनेट में इस बात पर मतदान होना था कि इंपीचमेंट की सुनवाई में गवाहों को गवाही देने बुलाया जाए या नहीं। ट्रंप और उनके समर्थकों को डर था कि यदि उनकी पार्टी के कुछ सेनेटरों ने गवाहों को बुलाने के पक्ष में वोट डाल दिया तो ट्रंप के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन की वह गवाही सुननी पड़ेगी जिसकी वजह से उनकी क़िताब – The room where it happened – चर्चा में है और उसके प्रकाशन को रुकवाने की कोशिशें की जा रही हैं। जॉन बोल्टन का दावा है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने युक्रेन को दी जाने वाली 40 करोड़ डॉलर की रक्षा सहायता रोक कर युक्रेन के राष्ट्रपति पर यह दबाव डालने की कोशिश की वे पूर्व उपराष्ट्रपति जो बाइडन के बेटे हंटर बाइडन के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार की जाँच बैठाएं।

Corona Virus की मार, अर्थव्यवस्था पर हाहाकार!

अमेरिका में उनकी बरकार लोकप्रियता को देखते हुए इसकी नौबत ही नहीं आई और सेनेटरों ने गवाह बुलाने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। अमेरिकी राज्य आयोवा में डेमोक्रेट उम्मीदवारों के चयन को लेकर होने वाले एक अहम मुकाबले की हवा को देखकर लग ऐसा रहा है कि शायद जो बायडन ट्रंप के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिए ज़रूरी डेमोक्रेट पार्टी का समर्थन ही न जुटा पाएं। पता नहीं दुनिया को अटपटी लगने वाली डोनाल्ड ट्रंप की अदायगी में ऐसा क्या आकर्षण है कि उनका तिलस्म टूटता नज़र नहीं आता। अमेरिका और दुनिया भर के समाज और राजनीतिशास्त्री इस का कारण खोजने के लिए माथापच्ची कर रहे हैं।

आम तौर पर माना जाता है कि राजनीति बातों का नहीं उनकी अदायगी का खेल है। सेनेट में चल रही सुनवाई से ट्रंप का दोष भले ही साबित न होता हो लेकिन उनके झूठ का खेल ज़रूर रेखांकित हो रहा है। फिर भी लोग हैं कि उनके समर्थन में डटे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इसके पीछे ध्रुवीकरण की राजनीति है। लेकिन अमेरिका में और यूरोप में पिछले कुछ वर्षों में ऐसा क्या हो गया जिसकी वजह से ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है।

इसका जवाब तलाशती एक पुस्तक बाज़ार में आई है – Why we’re Polarised – डिजिटल पोर्टल Vox के सह संस्थापक और स्वतंत्र संपादक Ezra Klein ने अपनी इस पुस्तक में समाजशास्त्रियों द्वारा किए गए प्रयोगों का हवाला देते हुए लिखा है कि इंसान समूह मानसिकता में जीना पसंद करता है और समूह मानसिकता का सबसे बड़ा आधार होता है पहचान का संकट। अमरीका में लातीनी अमेरिकी, काले और एशियाई लोगों की आबादी के बढ़ते अनुपात के कारण यूरोपीय मूल के गोरे समुदाय को अपनी पहचान संकट में पड़ती दिखाई दे रही है।

महाभियोग के बाद भी नहीं गिरी डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता, ये है पूरा खेल

इसी तरह ब्रिटेन में पूर्वी यूरोप, एशिया और अफ़्रीकी समुदाय के लोगों के बढ़ते अनुपात को देख कर मूलनिवासी गोरे समुदाय को अपनी पहचान संकट में पड़ती नज़र आने लगी थी। यूरोप विरोधी नाइजल फ़राज ने इस मानसिकता को यूरोपीय संघ के विरोध में खड़ा कर दिया और ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर आ गया। पहचान के संकट की इस हवा में लोगों को झूठ भी सच नज़र आने लगते हैं। Brexit जनमत संग्रह में हारने और अमरीका में हिलरी क्लिंटन की हार के बाद बहुत से लोग प्रचार की आँधी में फैलाए गए झूठ को लेकर पछताते नज़र आए लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और बहुत से लोग झूठ को सच मानने लगे थे। वसीम बरेलवी साहब का एक शेर हैः

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p style=”text-align: justify;”>वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीक़े से,
मैं एतिबार न करता तो और क्या करता!

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