मजबूरियों का फायदा उठाकर संगठन में किया भर्ती, फिर नक्सली ही करने लगे शोषण; पढ़ें दो नक्सलियों की आपबीती

कई निर्दोषों को मौत के घाट उतारा, दहशत फैलाई, अपने ही लोगों के साथ खून-खराबा किया। लेकिन, जब नक्सली संगठन (Naxal Organization) की हकीकत सामने आई तो मन पछतावा से भर गया।

Naxal Organization

कई निर्दोषों को मौत के घाट उतारा, दहशत फैलाई, अपने ही लोगों के साथ खून-खराबा किया। लेकिन, जब नक्सली संगठन (Naxal Organization) की हकीकत सामने आई तो मन पछतावा से भर गया। आत्मसमर्पण करने का फैसला कर लिया, पर वह भी आसान नहीं था। क्योंकि वह ऐसा दलदल है जहां जाने के बाद निकलना बड़ा ही मुश्किल है। बड़े प्रयासों के बाद उन्हें आत्मसमर्पण करने में सफलता मिली। आज हम आत्मसमर्पण कर चुके झारखंड (Jharkhand) के दुमका के दो नक्सलियों की कहानी आपको बताएंगे।

Naxal Organization
रिमिल दा और छोटा श्यामलाल देहरी। (फाइल फोटो)

पांच लाख का इनामी नक्सली था रिमिल दा: झारखंड के शिकारीपाड़ा का रहनेवाला रिमिल दा, जो अपनों से ही तंग आकर नक्सली (Naxali) बन बैठा। रिमिल दा बताता है कि साल 2012 में अपने माता-पिता के देहांत हो जाने के बाद हम अपने-चाची पर निर्भर हो गए। इनलोगों ने मेरे साथ मारपीट की। हमेशा प्रताड़ित करने लगे। चाचा से तो बहुत प्यार था, लेकिन चाचा ने मेरी सारी जमीन हड़प कर मुझे घर से निकाल दिया।

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किसी तरह गांव के किसानों का गाय-बकरी चराकर जीवन यापन करना शुरू किया था। मवेशी चराने के दौरान नक्सलियों (Naxalites) से जंगल मे भेंट हुई। नक्सलियों ने मेरा पूरा परिचय पूछा। मैं रोकर उन्हें अपनी दुखभरी कहानी सुनाने लगा। मुझे रोता हुआ देख नक्सली कमांडर ने अपने संगठन (Naxal Organization) में आने को कहा। उसने कहा कि अच्छा पैसा और हड़पा हुआ जमीन भी मिल जाएगा।

कुछ दिनों के बाद हम नक्सली बन गए। संगठन (Naxal Organization) में रहकर मैंने कई बड़ी नक्सली घटनाओं के अंजाम दिया। संगठन में भी कद बड़ा होता गया। सरकार ने मुझपर 5 लाख का इनाम घोषित कर दिया। संगठन मे भले ही कद बडा था, लेकिन व्यवहार नौकरों की तरह होता था। दस्ते के बड़े नेता शोषण करते थे। मैं उनके इस रवैये से तंग आ चुका था। संगठन मे बढ़ते आमानवीय व्यावहार ने मुझे आत्मसमर्पण करने को मजबूर कर दिया। अब हमें मुख्यधारा मे आ कर देश का अच्छा नागरिक बनना है।

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एक लाख का इनामी छोटा श्यामलाल देहरी: झारखंड के काठीकुंड गांव का कुख्यात इनामी नक्सली, जो कभी बंदूक की आवाज से डरता था। लेकिन समय ने ऐसा करवट लिया कि वही बंदूक उठा कर वह खूनी-खेल खेलने लगा। श्यामलाल देहरी के अनुसार, साल 2013 मे अपनी शादी के बाद रूपये की दिक्कत से नक्सली संगठन मे भर्ती हुआ। उसके जानने वाले कई लोग नक्सली संगठन मे काम करते थे। उन्हीं लोगों ने अच्छी कमाई का लालच दिया और संगठन (Naxal Organization) में शामिल होने के लिए कहा।

वह नक्सली बन गया। समय बीतता गया और संगठन की हकीकत सामने आने लगी। श्यामलाल ने बताया कि निर्दोष ग्रामीणों की पिटाई और संगठन (Naxal Organization) के लोगों के हिंसक बर्ताव को देख कर उसका मोहभंग हुआ। वह बताता है, हमारे सामने आत्मसर्मपण ही एक रास्ता बचा था। इसलिए हमने दुमका पुलिस कप्तान के सम्पर्क में आकर आत्मसर्मपण कर दिया। अब हम मुख्यधारा में आकर सामाजिक जीवन जीना चाहते हैं।

इन दोनों नक्सलियों (Naxals) की आपबीती से यही पता चलता है कि नक्सली सिर्फ लोगों के मन में दहशत पैदा करते हैं। उनकी मजबूरियों का फायदा उठाते हैं और उन्हें बरगलाकर संगठन (Naxal Organization) में शामिल करते हैं। इतना ही नहीं, संगठन में शामिल करने के बाद वे उन्हें तरह-तरह प्रताड़ित करते हैं। उनका शोषण करते हैं और अपने फायदे के लिए उनका उपयोग करते हैं।

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