कारगिल युद्ध: पाकिस्तान बारूदी सुरंग बिछाता था, 20 साल बाद भी मिल रहे सबूत

कई मौकों पर हमने अपने जवानों को खोया है जब पुरानी बारूदी सुरंग के संपर्क में आने से जवान शहीद हुए हैं। इनसे निपटने के लिए कोई कारगर तकनीक नहीं मिल पाई है।

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सांकेतिक तस्वीर।

Kargil War: कई मौकों पर हमने अपने जवानों को खोया है, जब पुरानी बारूदी सुरंग के संपर्क में आने से जवान शहीद हुए हैं। बारूदी सुरंगों से निपटने के लिए अभी तक कोई कारगर तकनीक नहीं मिल पाई है।

कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान (Pakistan) भारतीय सैनिकों को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने के लिए बारूदी सुरंग बिछाता था। 20 साल बाद भी इसके सबूत मिल रहे हैं। राजस्थान के श्रीगंगानगर के भारत-पाक सीमा पर 20 साल पुरानी बारूदी सुरंग मिली है। इस सुरंग के जरिए पाकिस्तान (Pakistan) भारतीय सैनिकों को भारी क्षति पहुंचाने की फिराक में था। इतने सालों बाद मिली इस सुरंग को सेना ने निष्क्रिय कर दिया था। 20 साल बाद भी यह माइन्स काफी खतरनाक साबित हो सकती हैं।

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दरअसल बारूदी सुरंग में लगने वाला यह विस्फोटक कुछ इसी तरह से डिजाइन किया जाता है जिससे काफी समय बाद भी नुकसान हो सके। इसे एन्टीपर्सन माइन्स भी कहा जाता है। जैसा ही सेना का कोई जवान इसपर कदम रखता है यह फट जाता है। मौके पर ही भारी नुकसान होता है।

ऐसे कई मौकों पर हमने अपने जवानों को खोया है जब पुरानी बारूदी सुरंग के संपर्क में आने से जवान शहीद हुए हैं। बारूदी सुरंगों से निपटने के लिए अभी तक कोई कारगर तकनीक नहीं मिल पाई है और ज़मीन के नीचे बिछी हुई मौत को ढूंढ निकालने का काम विशेषज्ञ कर रहे हैं।

इतनी तरह की होता है बारूदी सुरंग

बारूदी सुरंग सिर्फ जमीन पर ही नहीं बल्कि अलग-अलग जगहों पर बिछाई जाती है। जमीन पर बिछाई गयी बारूदी सुरंग के अलावा दुश्मन टैंकरोधी बारूदी सुरंग, समुद्री बारूदी सुरंग और क्लस्टर बम बारूदी सुरंग भी बिछाते हैं।

हालांकि यह इसपर निर्भर करता है कि युद्ध किस क्षेत्र में लड़ा जा रहा है। कारगिल का युद्ध पहाड़ियों पर लड़ा गया था लिहाजा पाकिस्तानी सेना ने खेतों और मुख्यों रास्तों पर एन्टीपर्सन माइन्स बिछाई थी।

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