देश सेवा सिर्फ सरहद पर जाकर ही नहीं होती, यकीन नहीं तो रायपुर के दूबे जी से मिल लीजिए

रायपुर (छत्तीसगढ़) के मनीष दूबे सेना में जाना चाहते थे। वह सेना में तो नहीं जा सके पर सैनिकों और सेना के प्रति प्रेम और सम्मान प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने एक अनोखा रास्ता खोज निकाला। उन्होंने रायपुर में एक रेस्टोरेंट खोला, जिसमें जवानों और उनके परिवार के सदस्यों को किफायती दर पर भोजन मिलता है।

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जवानों के साथ रेस्टोरेंट के मालिक मनीष दूबे

अगर किसी रेस्टोरेंट के सामने तिरंगे में सजे एक बैनर पर लिखा हो ‘राष्ट्रहित सर्वप्रथम’ तो इसे पढ़कर जिज्ञासा तो जरूर होगी। अमूमन खाने वाली जगहों पर खाने वाली चीजों के बारे में लिखा होता है, वहां की स्पेशल डिश के बारे में या खाने में उनकी स्पेशियलिटी के बारे में लिखा होता है। फिर इस रेस्तरॉ के बाहर ऐसा क्यों लिखा गया है। तो आइए जानते हैं इसके पीछे की कहानी। दरअसल, रायपुर (छत्तीसगढ़) के मनीष दूबे सेना में जाना चाहते थे। वह सेना में तो नहीं जा सके पर सैनिकों और सेना के प्रति प्रेम और सम्मान प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने एक अनोखा रास्ता खोज निकाला। उन्होंने रायपुर में एक रेस्टोरेंट खोला, जिसमें जवानों और उनके परिवार के सदस्यों को किफायती दर पर भोजन मिलता है।

नीलकंठ नाम से उनका रेस्टोरेंट रायपुर स्टेशन रोड पर है। वैसे तो यह रेस्टोरेंट किसी आम रेस्टोरेंट की तरह ही है। जहां सैनिकों के अलावा सामान्य लोग भी खाना खाने आते हैं। लेकिन सैनिकों के लिए यहां खास सुविधाएं होने की वजह से इसकी रौनक अलग है। यहां अगर सैनिक अपनी वर्दी में खाना खाने आते हैं तो उन्हें 50 प्रतिशत की छूट मिलती है। अगर सिविल ड्रेस में होते हैं तो आईकार्ड दिखाने पर 25 फीसदी की छूट मिलती है। इसके अलावा शहीदों के माता-पिता के लिए 100 फीसदी की छूट है। छूट देने का एकमात्र उद्देश्य सैनिकों और उनके परिजनों को सम्मान देना है। इसकी सूचना बाकायदा रेस्टोरेंट के मेन-गेट पर लगी हुई है।

देश सेवा के सपने को इस अनोखे ढंग से पूरा करने का ख्याल उन्हें कैसे आया, इस पर मनीष ने बताया, ‘हमारा पारिवारिक व्यवसाय बोरवेल ड्रिलिंग का है, लेकिन हमारे पिता सेना में जाना चाहते थे और वह एनसीसी से जुड़े थे। बड़े होकर हम दोनों भाई भी एनसीसी से जुड़े और हमने भी सेना में जाकर देश सेवा करने का सपना देखा। इसलिए हमारे मन में शुरू से ही सेना के प्रति खास लगाव था। इसी लगाव के चलते मन में जवानों के लिए कुछ करने की इच्छा हुई।’

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मनीष बताते हैं कि वह शुरू-शुरू में सैनिकों से भोजन के पैसे नहीं लेते थे। लेकिन इससे सैनिकों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती थी और वे यहां आने से कतराने लगे। इसी बीच यहां भोजन करने वाले कुछ सैनिकों ने उन्हें सलाह दी कि वे सैनिकों का सम्मान ही करना चाहते हैं तो कुछ प्रतिशत की छूट दे दें। इससे सैनिकों का आत्मसम्मान भी सुरक्षित रहेगा और उन्हें भी संतुष्टि मिलेगी। इसके बाद ही उन्होंने रियायती दरों पर खाना खिलाना शुरू किया।

मनीष कहते हैं कि मीडिया में अक्सर सैनिकों के शहीद होने की खबरें पढ़ने, सुनने को मिलती हैं। जिससे मन में शहीदों और उनके परिजनों के प्रति सम्मान की भावना पैदा होती है। हम जैसे आम लोग सीमा पर जाकर देश की सेवा तो नहीं कर सकते लेकिन सैनिकों के प्रति मन में प्यार और सम्मान तो जरूर होता है।

वह बताते हैं, ‘मैं और मेरा छोटा भाई सेना में जाकर देश की सेवा करना चाहते थे, लेकिन हमारा सपना पूरा नहीं हो पाया। आज हम अपने रेस्तरॉ के जरिए जवानों और उनके परिजनों के लिए भोजन की व्यवस्था कर अपनी इच्छा पूरी करने की कोशिश कर रहे हैं।’ रेस्टोरेंट में ग्राहकों की नजर जब बोर्ड पर पड़ती है तो वे भी तारीफ करते हैं और उन्हें भी सैनिकों के लिए कुछ करने की प्रेरणा मिलती है। उनके यहां हर दिन कोई न कोई सैनिक जरूर आता है, इसलिए नहीं कि उसे छूट मिलेगी, बल्कि इसलिए कि उन्हें लगता है कि यह सचमुच उनके सम्मान के लिए है।

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