आज है बॉलीवुड के सबसे सनकी निर्देशक का जन्मदिन, इस दर्जी ने हिंदी सिनेमा इतिहास की सबसे बड़ी और कामयाब फिल्म बनाई

महान फिल्मों की श्रेणी में ‘मुगल-ए-आजम’ वाकई महान है। भव्यसैट, नामी सितारे और मधुर गीत-संगीत की त्रिवेणी इस फिल्म की सफलता का राज है। इतिहास भले ही सलीम और अनारकली की मोहब्बत और अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाता हो, परन्तु फिल्म जगत ने हर बार अनारकली को साकार कर उसे पर्दे पर जीवन्त बनाया है।

K Asif के आसिफ

K Asif Birth Anniversary

हिंदी सिनेमा जगत में बहुत कम फिल्में बनाने और बहुत अधिक प्रसिद्धि प्राप्त करने वाले फिल्मकारों में के. आसिफ (K Asif) का नाम, शायद अकेला है। के. आसिफ (K Asif) का पूरा नाम करीमुद्दीन आसिफ था। उत्तर प्रदेश के इटावा शहर में सन् 1924 में उनका जन्म हुआ। फिल्म जगत् में उन्हें अनपढ़ कहने वालों की कमी नहीं थी। वैसे स्वयं के. आसिफ (K Asif) ने भी कभी खुद को पढ़ा हुआ आदमी होने का दावा नहीं किया। उनकी जीवन कथा वैसी ही रोचक है, जैसी कई सफल व्यक्तियों की हुआ करती है। मामूली कपड़े सिलने वाले दर्जी के रूप में उन्होंने मुम्बई में अपना कैरियर शुरू किया था और बाद में लगन और मेहनत के बल पर फिल्म निर्माता-निर्देशक बन गए। अपने तीस वर्ष के लम्बे फिल्मी जीवन में आसिफ ने सिर्फ तीन मुकम्मल फिल्में बनाई-‘फूल’ (1945), ‘हलचल’ (1951) और ‘मुगल ए आजम’ (1960)। ये तीनों बड़े बजट की फिल्में थीं और तीनों फिल्मों में कलाकार भी ख्याति प्राप्त थे। ‘फूल’ जहां अपने समय की सबसे बड़ी फिल्म थी, वहीं ‘हलचल’ ने भी अपने समय में काफी धूम मचाई थी। और ‘मुगल ए आजम’ तो हिन्दी फिल्मी इतिहास का शिलालेख है।

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मोहब्बत को आसिफ कायनात की सबसे बड़ी दौलत मानते थे। इसी विचार को कैनवस पर लेते। अगर वह चित्रकार होते और इसी को पर्दे पर लाने के लिए उन्होंने ‘मुगल-ए-आजम’ का निर्माण किया। इस फिल्म को बनाते समय हर कदम पर बाधाओं के जैसे पहाड़ खड़े हो गए थे। मगर आसिफ हार मानना जानते हीन थे। वे यह जानते हुए भी कि इसी विषय पर ‘अनारकली’ जैसी सफल फिल्म बन चुकी है,रत्ती भर भी विचलित नहीं हुए। उनका आत्मविश्वास इस फिल्म के बारे में कितना जबर्दस्त था। यह बाद में फिल्म ने साबित करके दिखा दिया। इस फिल्म के एक-एक दृश्य में आसिफ ने कितना परिश्रम किया। इसका प्रमाण यह छोटी-सी घटना है-रेगिस्तान की गर्मी में जब रेत तवे-सी तप जाती है, उन्होंने यह दृश्य लिया, जिसमें बादशाह अकबर अपने पुत्र के लिए मनौती मांगने के लिए सूफी सन्त की दरगाह पर नंगे पांव जाते हैं। इस दृश्य को शूट करने में कई दिन लग गए थे और आसिफ भी सारे दिन उन दिनों नंगे पांव जलती रेत पर ही शूटिंग कराते रहे। उन्होंने जूते पहने ही नहीं। ऐसी श्रद्धा थी उनकी फिल्म के प्रति।

महान फिल्मों की श्रेणी में ‘मुगल-ए-आजम’ वाकई महान है। भव्यसैट, नामी सितारे और मधुर गीत-संगीत की त्रिवेणी इस फिल्म की सफलता का राज है। इतिहास भले ही सलीम और अनारकली की मोहब्बत और अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाता हो, परन्तु फिल्म जगत ने हर बार अनारकली को साकार कर उसे पर्दे पर जीवन्त बनाया है। ‘मुगल-ए-आजम’ के बाद आसिफ ने ‘लव एड गॉड’ नामक भव्य फिल्म की शुरूआत की। वैसे तो आसिफ कोई धार्मिक व्यक्ति नहीं थे, पर ‘मोहब्बत और खुदा’ में वे लैला-मजनू की पुरानी भावना-प्रधान कहानी के द्वारा दुनिया को कुछ ऐसा ही आनंद प्राप्त करनेवाला दर्शन देना चाहते थे।

इस फिल्म को अपने जीवन का महान स्वप्न बनाने के लिए उन्होंने बहुत पापड़ भी बेले, मगर फिल्म के नायक गुरुदत्त की असमय मौत के कारण फिल्म रुक गई। फिर उन्होंने बड़े सितारों को लेकर एक और फिल्म ‘सस्ता खूना, महंगा पानी’ शुरू की। किन्हीं कारणवश बाद में यह फिल्म भी रोक देनी पड़ी। तत्पश्चात ‘लव एंड गॉड’ उन्होंने फिर से शुरू की जिसमें संजीव कुमार को गुरुदत्त की जगह नायक के रूप में लिया गया। लेकिन इससे पहले कि आसिफ यह फिल्म पूरा कर पाते, 9 मार्च 1971 को दिल के दौरे से उनका निधन हो गया। ‘लव एंड गॉड’ को आसिफ जितना बना गए थे। उसे उसी रूप में उनकी पत्नी श्रीमती अख्तर आसिफ ने के. सी. बोकाड़िया के सहयोग से 1986 में प्रदर्शित किया। अधूरे ‘लव एंड गॉड’ को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि आसिफ इस फिल्म को कैसा रूप देना चाहते थे यह फिल्म यदि उनके हाथों पूरी हो जाती तो निश्चित ही वह भी एक यादगार फिल्म बन जाती।

फिल्म कला से सामान्य रूप में और अपनी फिल्मों से विशेष रूप में आसिफ को ऐसा लगाव था, जैसे किसी भक्त को भगवान से होता है। उनकी धुन और उनकी लगन में पूजा जैसे पवित्रता व जुनून की सीमाओं तक बढ़ती हुई एकाग्रता थी। वे एक फिल्म के निर्माण में बरसों लगा देते थे। कई बरस बाद आधी से अधिक फिल्म बनाकर उसे र्द कर देना और फिर से शूटिंग करना उनकी आदत में शुमार था, इसलिए उन्हें ‘मूवी-मुगल’ कहा जाता था। जिस शान-शौकत से वे फिल्में बनाते थे, जिस शाही अंदाज से वे खर्च करते थे, उसे देखकर कई लोग उन्हें ‘मुगल-ए-आजम’ के नाम से भी याद करते हैं।

के. आसिफ (K Asif) प्रत्येक मायने में जितने बड़े फिल्मकार थे, उतने ही बड़े इंसान भी थे। लम्बा-चौड़ा शरीर, शेर जैसा सीना, और उस सीने में शेर जैसा दिल। यह दिल बड़ा था और इसकी सीमाओं में दोस्त और दुश्मन दोनों ही आ जाते थे। लेकिन यह दिल सिर्फ बड़ा ही नहीं था, बल्कि नरम और उदार भी था। जब देखो तब उनके इर्द-गिर्द जरूरतमंदों की भीड़ लगी रहती थी। जितनी, गरीब लड़कियों की शादियां उन्होंने करवाई, जितने मंदिर उन्होंने बनाएं, उतने किसी हिन्दू ने भी नहीं बनवाएं होंगे। वाकई आसिफ जैसे महामानव फिल्म जगत् में बहुत कम ही हुए हैं।