Jharkhand: प्रेम और सद्भाव की मिसाल; अपनों ने छोड़ दिया साथ, मुस्लिम युवकों ने शव को पहुंचाया मुक्तिधाम

प्रेम और सद्भाव की इससे बड़ी मिसाल क्या हो सकती है कि कोरोना के खौफ से 72 साल की लाखिया को अपनों ने दगा दिया, पर इंसानियत में यकीन रखने वाले लोगों ने आखिरी वक्त में उसका साथ दिया। कुछ मुस्लिम युवकों ने वृद्धा की अर्थी को कंधा दिया और उसकी अंतिम यात्रा पूरी की।

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मुस्लिम युवकों ने कायम की प्रेम और सद्भाव की मिसाल।

प्रेम और सद्भाव की इससे बड़ी मिसाल क्या हो सकती है कि कोरोना के खौफ से 72 साल की लाखिया को अपनों ने दगा दिया, पर इंसानियत में यकीन रखने वाले लोगों ने आखिरी वक्त में उसका साथ दिया। कुछ मुस्लिम युवकों ने वृद्धा की अर्थी को कंधा दिया और उसकी अंतिम यात्रा पूरी की। यह घटना झारखंड (Jharkhand) के गिरिडीह जिले के बरवाडीह की है।

72 साल की लखिया देवी को मधुमेह की बीमारी थी। इस वजह से उनकी तबीयत खराब रहती थी। कुछ दिन पहले वो लकवा का शिकार भी हो गईं। परिवार वालों ने इलाज के लिए उन्हें रांची के एक नर्सिंग होम में भर्ती कराया था। पर, वहां भी उनकी स्थिति नहीं सुधरी तो घर वाले गिरिडीह वापस ले आए। इसी बीच, 6 जून की रात उनकी मौत हो गई।

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इसकी सूचना के बाद शव के अंतिम दर्शन को कोई अपना नहीं आया। सब ने दूरी बना ली सिवाय उनके एक बेटे और एक पोते के। 7 जून को वृद्धा के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया जाना था, लेकिन कोई रिश्तेदार घर नहीं पहुंचा। उनका बेटा जगेश्वर तुरी और पोता तो था, पर उन दो लोगों के सहारे 8 किलोमीटर कंधा देकर शव को मुक्तिधाम तक पहुंचाना संभव नहीं था।

इसकी जानकारी जब गिरिडीह के पहाड़ीडीह के मुस्लिम युवकों को मिली तो वे तुरंत वहां पहुंचे। बरवाडीह के शमशेर आलम, मोहम्मद बिलाल उर्फ गुड्डन मोहम्मद, ताहिर और सलामत सहित कई युवक जगेश्वर तुरी के घर पहुंचे। ये लोग न केवल लाखिया की अंतिम यात्रा में शामिल हुए, बल्कि उनके पार्थिव शरीर को बारी-बारी से कंधा देकर मुक्तिधाम तक पहुंचाया। वहां जागेश्वर ने हिंदू रीति-रिवाज के साथ अपनी मां को मुखाग्नि दी। इस घटना ने  न केवल भाई-चारे का संदेश दिया ही है बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ को भी चरितार्थ किया है।