नक्सली कहर के चलते बेघर हुए 29 परिवार, 15 साल बाद हुई घर वापसी

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छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित रहे बस्तर ने अपनी धरती पर सबसे अधिक खून-खराबा देखा है। दशकों नक्सल आतंक का दंश झेलते हुए यह मिट्टी न जाने कितनी बार अपने ही लोगों के खून से सनी। एक वक्त था जब बस्तर में सिर्फ नक्सलियों का बोल-बाला था। इससे सबसे अधिक प्रभावित हुए वहां के गरीब अदिवासी। नक्सलियों ने हजारों मासूम अदिवासी ग्रामीणों का खून बहाया। फिर शुरू हुआ नक्‍सली हिंसा के खिलाफ सलवा जुड़ूम का दौर। इस दौर में नक्सलियों का आतंक इतना बढ़ गया कि त्रस्त होकर वहां के आदिवासी ग्रामीण विस्थापित होने पर मजबूर हो गए।

पर, धीरे-धीरे नक्सल हिंसा अब ढ़लान की ओर है। प्रशासन के प्रयासों और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों की बदौलत नक्सली इलाके अब सिमट कर रह गए हैं। लोगों का नक्सल संगठनों और विचारधारा से मोह भंग हो रहा है। जिन लोगों ने क्रांति के नाम पर हथियार उठाए थे वो भी अब इन संगठनों की दोहरी नीति से तंग आकर हथियार डाल रहे हैं। ऊपर से सुरक्षाबलों की मुस्तैदी। इन्हीं सब वजहों से पिछले कुछ सालों में नक्सली हिंसा में खासी कमी आई है। प्रशासन की मुस्तैदी की वजह से इन क्षेत्रों में स्थिति अब धीरे-धीरे सामान्य होती नजर आ रही है। इसका ताजा उदाहरण है, नक्सली हिंसा से परेशान होकर बस्तर छोड़ आंध्र प्रदेश में जा बसे 29 आदिवासी परिवारों की वापसी।

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25 अप्रैल को धुर नक्सल प्रभावित सुकमा जिले के 29 आदिवासी परिवारों की घर वापसी हुई। करीब 15 साल पहले नक्सलियों ने इनके घर जला दिए थे। नक्सलियों की दहशत से वे सबकुछ छोड़ आंध्र प्रदेश में विस्थापितों की तरह गुजर-बसर कर रहे थे। सुकमा जिले के एर्राबोर से 7 किमी दूर बसे गांव मरईगुड़ा के ये परिवार 15 साल बाद अपने गांव लौटे हैं। ये आदिवासी परिवार नक्सलियों के उपद्रव से परेशान होकर अपने गांव से करीब 75 किलोमीटर दूर आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के कन्नापुरम गांव में विस्थापित होकर चले गए थे। वहां वे खेतों में मजदूरी कर जीवन बसर करते थे।

जिन लोगों ने गांव छोड़ा उनके नाम पर कभी सैकड़ों एकड़ जमीन थी। सैकड़ों एकड़ जमीन के मालिक, जिनके खेतों में पहले मजदूर काम करते थे, वो मजबूरी में दूसरों के खेतों में दिहाड़ी पर काम करने को मजबूर थे। अब ये 29 परिवार वापस लौटे हैं, उनमें से 24 परिवार के नाम पर यहां जमीन मिल चुकी है। यह एक सकारात्मक संकेत है कि जल्द ही नक्सलियों का पूरी तरह सफया तय है। इससे नक्सली क्षेत्रों में जन-जीवन पूरी तरह सामान्य होने की आस जगी है।

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