नफरत, जिल्लत और रुसवाई, बदहाल ललिता की कुल यही है कमाई

Naxalite

हिंसा और नफरत इंसान को किस कदर अंधा कर देती है इसकी मिसाल है, झारखंड का खूंखार नक्सली (Naxalite) रवींद्र गंजू। और इस अंधेपन का हासिल क्या होता है, उसकी जीती जागती मिसाल है उसकी पत्नी ललिता और उसके चार बच्चे।

शादी अमूमन हर लड़की का ख्वाब होता है। हर लड़की शादी के बाद ढेर सारे ख्वाबों को खुद में समेटे अपने ससुराल आती है। कम से कम इतना अरमान तो हर लड़की का होता ही है कि उसका पति उसे खूब प्यार दे और शांति से जिंदगी बसर होती रहे। पर, हर लड़की की किस्मत में ये मयस्सर नहीं होता। और अगर ये सब किस्मत की देन होती है, तो झारखंड के लातेहार की ललिता आला दर्जे की बदकिस्मत है।

झारखंड का लातेहार जिला, नक्सल (Naxalite) गतिविधियों के लिए कुख्यात रहा है। इसी लातेहार के टंडवा प्रखंड के हसला मांझी टोला गांव के एक तरफ एक खपरैल का मकान है। शाम के वक्त वहां शराब पीने वालों का जमघट लगा होता है। यहां कोई शराबखाना नहीं है। यह 10 लाख रुपए के इनामी नक्सली (Naxalite) रवींद्र गंजू का घर है और यहां शराब बेचती है ललिता, गंजू की दुखियारी पत्नी।

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ललिता की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। कहानी शुरू हुई साल 2007 में जब ललिता के लिए रवींद्र गंजू शादी का रिश्ता लेकर उसके घर आया। औपचारिक बातचीत के बाद जब ललिता ने कामकाज के बारे में पूछा तो गंजू ने बताया कि वो पार्टी के लिए काम करता है। अनपढ़ ललिता को कुछ खास समझ नहीं आया कि पार्टी क्या बला है। पर उसे लगा कि कुछ अच्छा ही होता होगा। बस फिर क्या बात पक्की हुई और शादी हो गई। यहीं से शुरू होता है बदकिस्मती का किस्सा।

कुख्यात नक्सली रवींद्र गंजू, फाइल फोटो।

ललिता जब ब्याह कर अपने ससुराल आई तो सब कुछ ठीक था। रवींद्र घर पर ही रहता था। दिन हंसी-खुशी गुजर रहे थे। बमुश्किल महीना भर ही गुजरा होगा कि एक दिन गंजू लापता हो गया। फिर करीब डेढ़ महीने बाद घर लौटा तो बताया कि पार्टी के काम के सिलसिले में गया था। फिर तो सिलसिला सा चल पड़ा। अचानक वो दो तीन महीने के लिए गायब हो जाता और फिर 2-4 दिन के लिए घर लौट आता। ललिता बार-बार पूछती कि सब ठीक तो है और कम से कम बताकर तो जाया करो। पर उसका जवाब एकदम रटा-रटाया होता। बेचारी ललिता उसकी बातों को सच मान कर शांत हो जाती।

एक दिन शाम को जब ललिता खाना बनाने की तैयारी कर रही थी कि तभी कुछ पुलिसवाले उसे घर पहुंच गए। पुलिसवालों को अपने घर पर देख कर ललिता सकपका गई। पुलिसवालों ने उससे रवींद्र के बारे में पूछताछ की, पर वो भला क्या बताती कि वो रहता कहां है और करता क्या है। वो तो खुद इन्हीं सवालों के जवाब तलाश रही थी।

बहरहाल, पूछताछ करके पुलिसवाले तो चले गए, लेकिन ललिता का मन वहीं लगा रहा। उस दिन पहली बार उसे लगा कि सबकुछ उतना ठीक नहीं है, जितना उसका पति उसे बताता है। इसी उहा-पोह के बीच उसने एक बेटे को जन्म दिया। बदकिस्मती ऐसी कि इस मौके पर भी उसका पति पास नहीं था। हां, पुलिसवालों का आना-जाना लगा रहा। ललिता के बार-बार पूछने पर कि आखिर उसके पति ने ऐसा क्या किया है कि आए दिन उसकी खोजबीन होती रहती है, तो पुलिसवालों ने बताया कि उसका पति एक खूंखार नक्सली (Naxalite) है। ललिता के तो मानो पैरों तले जमीन ही खिसक गई।

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ललिता को उस दिन ये एहसास हुआ कि जिंदगी बर्बाद होना किसे कहते हैं। अब सवाल ये था कि वो करे तो क्या करे और जाए तो कहां जाए। खुद उसकी माली हालत ठीक नहीं थी। गंजू जब आता तो बमुश्किल थोड़े पैसे दे जाता उसी से गुजारा होना था। अब उसकी भी आस कम होने लगी थी। इधर, मायके वाले भी बेहद गरीब थे, ऐसे में वहां जाकर रहना भी मुनासिब नहीं था। वो खामखा पहले से परेशान अपने घरवालों पर और बोझ नहीं डालना चाहती थी। अब तक तो इस आस में दिन गुजर जाते थे कि पति काम पर गया है, लौटेगा तो सुख-चैन से जिएंगे। अब वो आसा तो जाती रही। उलटा, आए दिन पूछताछ के लिए पुलिसवालों का घर आना। जिंदगी दोजख बन गई थी।

ललिता बताती हैं कि बहुत समझाने-बुझाने पर 2012 में रवींद्र ने नक्सल (Naxalite) संगठन को छोड़ दिया। घर वापस लौट आया और साथ रहने लगा। रांची में उसने खैनी की एक दुकान शुरू कर दी। वहीं पर किराए के मकान में वह ललिता और बच्चों के साथ रहने लगा। पर, 2013 में अचानक एक दिन फिर वह ललिता को रांची में अकेला छोड़ कर गायब हो गया। कुछ दिनों बाद वह लौटकर आया। इस बार वह करीब 2-3 महीने परिवार के साथ रहा। ललिता को लगा धीरे-धीरे अब सबकुछ ठीक हो रहा है शायद। इस बीच उसके तीन और बच्चे भी हो गए। पर होना कुछ और ही था। हुआ ये कि एक रोज गंजू ने ललिता से कहा कि वह गांव जा रहा है, जल्दी ही वापस आ जाएगा। दिन, हफ्तों में बदले, हफ्ते महीने में लेकिन वह नहीं लौटा। ललिता जब उसे ढूंढ़ते हुए गांव पहुंची तो पता चला कि एक नक्सली कमांडर उसे बहला-फुसलाकर फिर से अपने साथ ले गया है। ललिता ने रवींद्र को बहुत ढूंढ़ा, पर वह नहीं मिला। अंत में थक-हारकर ललिता ने रांची छोड़ दिया और गांव आकर रहने लगी।

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अब मुश्किल ये थी यहां उसका गुजारा कैसे हो? जिंदगी ने उसे बेहद कठिन मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था। जीने के लिए कोई सहारा नहीं था। उलटे चार बच्चों की जिम्मेदारी आ गई थी। ऐसी हालत में गुजारा करने के लिए उसने महुआ का शराब बनाना शुरू किया। महुआ वाला शराब झारखंड के ग्रामीण इलाकों में खूब बिकता है। शुरू में ललिता को काफी परेशानी हुई। पहली बात तो ये कि वह महिला होकर शराब बनाती और लोगों को पिलाती है, गांव में लोगों को यही रास नहीं आया। फिर, शराब पीने के बाद लोगों की बदतमीजियां भी उसे झेलनी पड़तीं। पर धीरे-धीरे वो इन सब चीजों की आदी हो गई। उसे समझ आ गया कि यह उसकी नियति है और अपने तथा अपने बच्चों का गुजारा करने का एकमात्र रास्ता भी।

पर ललिता की कहानी में एक और मोड़ आना बाकी था। शराब के काम से घर चलाने लायक आमदनी होने लगी, तो ललिता भी अपनी जिंदगी में हासिल जख्मों को भूल कर बच्चों की अच्छी परवरिश में लग गई। जिंदगी में हिचकोले कम तो नहीं हुए थे, लेकिन अब उसे गाड़ी पटरी पर जाती दिखने लगी थी। इसी बीच, करीब तीन साल से लापता उसका पति रवींद्र गंजू एक रोज घर आ धमका। इस बार वो अकेला नहीं आया था बल्कि उसके साथ कुख्यात नक्सली (Naxalite) कमांडर नकुल यादव और उसके दस्ते के कई लोग भी साथ थे।

भारी मन से ही सही लेकिन ललिता के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उम्मीद की एक हल्की सी ही सही किरण उसे नजर आने लगी। उसने रवींद्र को बहुत समझाया-मनाया कि अब आ ही गए हो तो रुक जाओ कुछ रोज लेकिन उसने ललिता की बातों पर ध्यान नहीं दिया। उधर, नक्सली (Naxalite) कमांडर नकुल उस पर जल्द से जल्द निकलने के लिए दबाव डाल रहा था क्योंकि उन्हें पुलिस का भी डर था। लिहाजा, चंद मिनटों में ही रवींद्र अपने साथियों के साथ वापस निकल गया। ललिता याद करते हुए रो पड़ती हैं, “मैंने उसे बहुत रोका, बहुत लड़ी, विरोध भी किया, लेकिन उसने मेरी नहीं सुनी। बच्चों का वास्ता भी दिया, पर नहीं सुना। सुनता भी कैसे उसके दिमाग में तो जहर भरा पड़ा था। हिंसा का नशा चढ़ गया था उसे। वह उस घटिया नकुल की बातों में गया था। नक्सली नकुल ने मुझे भी बहुत डराया-धमकाया।”

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घर से निकलते वक्त रवींद्र ने ललिता को कुछ रुपए देने चाहे, पर ललिता ने हिंसा की कमाई के पैसे लेने से मना कर दिया। एक आखिरी बार शायद ललिता के दिल में आस जगी थी उस रोज लेकिन वो भी रौंद दी गई तो वह अपनी रोजमर्रा की जिम्मेदारियों में व्यस्त होने लगी। अपना दुख भूलने का यही एक तरीका भी तो था उसके पास।

लगभग 6 महीने के बाद वह फिर घर आया। जिस वक्त रवींद्र घर पहुंचा, उस वक्त ललिता दुकान पर थी। ललिता शराब बेच रही थी और कुछ लोग वहां बैठे पी रहे थे। ललिता को यूं शराब का बेचते देख गंजू का पारा चढ़ गया। उसने सबके सामने ही ललिता को खूब पीटा और उसे शराब बेचने के लिए मना करने लगा। तो ललिता ने भी सबके सामने अपनी भड़ास निकाल दी, “अगर तुम ठीक होते, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी उठाते तो मुझे यह सब नहीं करना पड़ता। पर आज मुझे यह जलालत तुम्हारी वजह से उठानी पड़ रही है।”

उस दिन के बाद से रवींद्र ना तो ललिता से मिला और ना ही घर आया। नक्सली रवींद्र गंजू और ललिता के 4 बच्चे हैं। बड़ा बेटा प्रभात 12 साल का है, बड़ी बेटी सुषमा 9 साल और छोटी बेटी रेशमा 6 साल की है। उसका सबसे छोटा बेटा लगभग 3 साल का है जिसका नाम तूफान है। अपनी दयनीय हालत को देखते हुए ललिता ने अपने तीन बच्चों को अपने मायके छोड़ रखा है। जहां नाना-नानी उनकी देख-रेख कर रहे हैं। छोटा बेटा ललिता के साथ ही रहता है। ललिता बताती है कि बारिश के दिनों और बसंत ऋतु में जब महुआ गिरता है तब सभी बच्चे घर आ जाते हैं और दुकान के काम में उसकी मदद करते हैं।

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ललिता कहती है कि मैंने रवींद्र से लाख सरेंडर करने को कहा, लेकिन नकुल यादव के झांसे में आकर उसने हर बार मना कर दिया। पर, कुछ दिनों के बाद मैंने सुना कि नकुल यादव ने सरेंडर कर दिया है। ललिता बिलख-बिलख कर अपनी आप-बीती सुनाती है। ललिता कही है, “हमारे परिवार को नक्सली (Naxalite) नकुल यादव ने बर्बाद कर दिया। अपनी जान बचाने के लिए उसने खुद तो सरेंडर कर दिया और अपने साथियों को पुलिस की गोली से मरने के लिए जंगल में छोड़ दिया।”

गौरतलब है कि ललिता का पति रवींद्र गंजू नक्सली (Naxalite) संगठन भाकपा माओवादी की बिहार स्पेशल एरिया कमेटी का सदस्य है। उस पर झारखंड सरकार ने 10 लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा है।

अब आलम ये है कि रवींद्र गंजू की पैतृक संपत्ति की कुर्की हो चुकी है। उसके नाम पर करीब 73 डिसमिल पुस्तैनी जमीन है। पर उस जमीन पर पुलिस का कब्जा है। ऐसे में ललिता अपनी जमीन पर खेती भी नहीं कर सकती है। ललिता कहती है, “अगर रवींद्र सरेंडर कर देता तो शायद उसे आज यह दिन नहीं देखना पड़ता। पर उसने मेरी बात नहीं मानी। पता नहीं वह जिंदा भी है या किसी पुलिस मुठभेड़ में मार दिया गया।”

ये दर्द, ये कहानी सिर्फ ललिता का नहीं है। ऐसी सैकड़ों हजारों ललिता इसी दर्द और अंधियारे से गुजर रही हैं, जिनके पति या दूसरे घरवाले नक्सल (Naxalite) संगठनों का हिस्सा हैं।

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