अच्छी खबर! पिछले 5 साल में टूटी नक्सलवाद की कमर, जरूरी है मगर चौकसी

बीते 5 साल के आंकड़ों ने नक्सलवाद का दंश झेल रहे लोगों को आशा की किरण दिखाई है। ये किरण धुंधली नहीं पड़नी चाहिए। किसी भी कीमत पर कोताही नहीं बरती जानी चाहिए क्योंकि अगर कोई भी कसर बाकी रह गई तो नक्सली फिर से मजबूत होने लगेंगे और ये कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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मई 2014 से अप्रैल 2019 के दरम्यान नक्सल वारदातों में उल्लेखनीय कमी आई है। फाइल फोटो। फोटो सोर्स- सोशल मीडिया।

नीयत ठीक हो और इरादा पक्का हो तो बड़ी से बड़ी चुनौती भी छोटी पड़ने लगती है। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए ऐसी ही एक बड़ी चुनौती था नक्सलवाद। खबर खुश करने वाली है। जी नहीं, देश से नक्सलवाद खत्म नहीं हुआ है। मगर ऐसे संकेत दिखने लगे हैं कि सुरक्षाबलों की मुस्तैदी यूं बनी रही तो जल्द ही ये शुभ सूचना भी आ जाएगी। दरअसल, देश के अलग-अलग इलाकों में नक्सल गतिविधियों का जायजा लेने के लिए केंद्रीय गृह सचिव राजीव गौबा ने चंद रोज पहले एक हाई लेवल मीटिंग की। इस मीटिंग में देश के मुख्य सचिव, नक्सल प्रभावित राज्यों के डीजीपी, आईबी डायरेक्टर और CAPF (सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज़) के सभी डीजी शामिल हुए। इस हाई प्रोफ़ाइल बैठक में जो बातें सामने आईं वो किसी भी देशवासी का दिल खुश करने के लिए काफी हैं।

तो कहानी ये है कि देश के लिए नासूर बन चुका नक्सलवाद अब पतन की ओर तेजी से पढ़ रहा है। सिर्फ सच को उच्च सूत्रों से मिले आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 5 सालों में नक्सली संगठनों का ढांचा बुरी तरह चरमरा गया है। अगर तुलनात्मक अध्ययन करें तो विगत 5 सालों में नक्सली हिंसा में सतत और उल्लेखनीय गिरावट आई है। 2018 के आंकड़े बताते हैं कि SRE (सिक्योरिटी रिलेटेड एक्सपेंडिचर) वाले जिलों की संख्या 126 से घटकर 82 रह गई है। एहतियात के तौर पर इस सूची में 8 जिले और जोड़ दिए गए हैं। अब जरा इसे आंकड़ों के जरिए विस्तार से समझते हैं।

मई 2009 से अप्रैल 2014 के बीच कुल 8438 नक्सली वारदातें पेश आईं। अगले पांच सालों की बात करें तो मई 2014 से अप्रैल 2019 के दरम्यान देशभर में कुल 4778 नक्सली वारदातें हुईं। मतलब, पिछले 5 सालों में नक्सली वारदातों में कुल 43.4 फीसदी की कमी आई है। वहीं, नक्सली हमलों और लैंडमाइन्स विस्फोट में मरने वाले सुरक्षाबल के जवानों और आम नागरिकों की संख्या में 61 फीसदी से अधिक की कमी दर्ज की गई है। मई 2009 से अप्रैल 2014 के बीच ये संख्या 3209 थी, जो अगले 5 साल में घट कर 1247 हो गई। अगर इसमें आम नागरिकों, पुलिस के मुखबिरों और सुरक्षाबल के जवानों की संख्या को अलग-अलग करके देखें, तो मरने वाले आम नागरिकों की संख्या में 59.5 फीसदी, मरने वाले मुखबिरों की संख्या में 46.3 फीसदी, तो वहीं शहीद होने वाले जवानों की संख्या में 65.2 फीसदी की उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। अलबत्ता इन वारदातों में घायल होने वाले जवानों की संख्या में 15.7 फीसदी का इजाफा हुआ है।

इश्क से मात खा रहा नक्सलवाद, हिंसा के सौदागरों में मची खलबली

आगे बढ़ते हैं, मई 2009 से अप्रैल 2014 के बीच पुलिस और नक्सलियों के बीच कुल 1203 मुठभेड़ हुई। वहीं मई 2014 से अप्रैल 2019 के बीच ये संख्या बढ़ कर 1256 हो गई। बेशक, ये इजाफा 4.4 फीसदी का है लेकिन उल्लेखनीय है। अब बात करते हैं सुरक्षाबलों पर होने वाले हमलों की। मई 2009 से अप्रैल 2014 के बीच सुरक्षाबलों पर कुल 873 हमले हुए, जबकि मई 2014 से अप्रैल 2019 के दरम्यान कुल 515 हमले हुए। यानी इन 5 सालों में सुरक्षाबलों पर होने वाले हमलों में 41 फीसदी की कमी आई है। ये साफ संकेत है कि सुरक्षाबलों और सरकार का इकबाल बुलंद हुआ है। जबकि नक्सलियों के हौसले पस्त हुए हैं।

मई 2009 से अप्रैल 2014 के दौरान सुरक्षाबलों ने कुल 624 नक्सलियों को मौत की नींद सुलाया। वहीं, मई 2014 से अप्रैल 2019 के बीच कुल 757 नक्सली मारे गए। प्रतिशत के लिहाज ये बढ़ोतरी 21.3 फीसदी बैठती है। इन पांचों सालों में नक्सलियों की गिरफ्तारी में अलबत्ता कमी आई है। मसलन, मई 2009 से अप्रैल 2014 के बीच कुल 10194 नक्सली गिरफ्तार किए गए थे। वहीं, मई 2014 से अप्रैल 2019 के बीच नक्सलियों की गिरफ्तारी 12.4 फीसदी घटकर 8935 हो गई। इसके उलट सरेंडर करने वाले नक्सलियों की संख्या में 156.7 फीसदी का रिकॉर्डतोड़ इजाफा दर्ज किया गया है। मई 2009 से अप्रैल 2014 के बीच कुल 1579 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था। वहीं, मई 2014 से अप्रैल 2019 के बीच 4054 नक्सलियों ने पुलिस के सामने हथियार डाले हैं।

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नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सली अक्सर पुलिसवालों के हथियार छीनकर भाग जाते हैं। पुलिस थानों पर हमला करके हथियार लूट ले जाते हैं। बीते 5 सालों में इन वारदातों में भी व्यापक कमी आई है। मई 2009 से अप्रैल 2014 के बीच नक्सलियों ने कुल 620 हथियारों की छिनौती की थी। ये संख्या मई 2014 से अप्रैल 2019 के बीच घटकर मात्र 107 रह गई। यानी हथियार छिनौती के मामलों मे 82.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। मतलब साफ है कि अब नक्सलियों में खौफ बढ़ गया है। वहीं, नक्सलियों से बरामद होने वाले हथियारों की संख्या में 6.4 फीसदी की वृद्धि हुई है। आंकड़ों की बात करें, तो मई 2009 से अप्रैल 2014 के बीच नक्सलियों के पास से 3081 हथियार बरामद किए गए, वहीं अगले 5 सालों में ये संख्या बढ़ कर 3279 हो गई।

नक्सली जिन इलाकों में प्रभावी हैं, वहां जंगल राज चलता है। इसका जरिया बनती हैं नक्सलियों द्वारा लगाई जाने वाली जन अदालतें। और इन्हीं जंगलों में चलते हैं नक्सलियों के ट्रेनिंग कैंप। ट्रेनिंग कैंप में नए लड़के-लड़कियों को प्रशिक्षण देकर उन्हें नक्सली बनाया जाता है। पिछले साल में इस जंगल राज में काफी कमी आई है। मई 2009 से अप्रैल 2014 के बीच जहां नक्सलियों ने हथियारों की ट्रेनिंग देने के लिए कुल 305 कैंप लगाए थे। वहीं, अगले 5 सालों में इन कैंप्स की संख्या घटकर 100 पर आ गई। संख्या छोटी है पर प्रतिशत में ये कमी 67.2 फीसदी बैठती है। वहीं, जन अदालतों की बात करें तो मई 2009 से अप्रैल 2014 तक नक्सलियों ने कुल 355 जन अदालतें लगाईं। जबकि मई 2014 से अप्रैल 2019 के बीच सिर्फ 146 जन अदालतें ही लगीं। 5 सालों में कुल 58.9 फीसदी की कमी।

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ये आंकड़े निसंदेह हौसला बढ़ाने वाले हैं। यही वजह है कि केंद्रीय गृह सचिव राजीव गौबा ने केंद्रीय व राज्य सुरक्षाबलों के प्रयासों व मुस्तैदी की खुलकर तारीफ की। साथ ही ऑपरेशन जारी रखने और चौकसी में किसी भी तरह की कोताही नहीं बरतने की ताकीद भी की। केंद्रीय गृह सचिव ने इस बात पर भी जोर दिया कि जिन नक्सल प्रभावित इलाकों में जवानों की तैनाती नहीं है, वहां तैनाती की जाए और जिन क्षेत्रों में जरुरत के लिहाज से कम जवान तैनात हैं, वहां उनकी संख्या बढ़ाई जाए। उन्होंने आश्वासन भी दिया कि इसके लिए केंद्र और राज्य सुरक्षाबलों को यथासंभव संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।

मीटिंग की एक और खास बात ये रही है कि इसमें राज्यों की तरफ से भी सुरक्षा संबंधी चिंताएं व्यक्त की गईं और कई तरह के सुझाव दिए गए। उन सबका संज्ञान लिया गया। साथ ही, नक्सल प्रभावित इलाकों में मोबाइल नेटवर्क कम्यूनिकेशन को और प्रभावी बनाने तथा इन क्षेत्रों में तैनात सुरक्षाबलों के हालात सुधारने पर भी चर्चा की गई। और तय पाया गया कि नक्सलवाद से निपटने के लिए 2015 की केंद्रीय नीति एवं एक्शन प्लान पर आगे बढ़ा जाएगा। अब दो टूक बात ये है कि इन आंकड़ों ने नक्सलवाद का दंश झेल रहे लोगों को आशा की किरण दिखाई है। ये किरण धुंधली नहीं पड़नी चाहिए। किसी भी कीमत पर कोताही नहीं बरती जानी चाहिए क्योंकि अगर कोई भी कसर बाकी रह गई तो नक्सली फिर से मजबूत होने लगेंगे और ये कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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