मृणाल सेन जन्मदिन विशेष: फिल्मों के माध्यम से समाज की रूढ़िवादी सोच पर गंभीर सवाल उठाने में महारथी

इसके उपरांत उन्होंने (Mrinal Sen) जो भी फिल्में बनाईं, वह राजनीति से प्रेरित थी, जिसके कारण वह मार्क्सवादी कलाकार के रूप में जाने गए। वह समय पूरे भारत में राजनीतिक उतार-चढाव का समय था। विशेषकर कलकत्ता और उसके आस-पास के क्षेत्र इससे ज्यादा प्रभावित थे, जिसने नक्सलवादी विचारधारा को जन्म दिया|

Mrinal Sen

Indian Filmmaker Mrinal Sen

भारतीय फिल्मों के प्रसिद्ध निर्माता और निर्देशक मृणाल सेन (Mrinal Sen) ने पाँच दशकों के अपने फिल्मी कॅरियर में 30 से अधिक फिल्मों का निर्माण किया। उन्होंने 19 से ज्यादा फिल्मों के लिए पटकथा लिखी और चार फिल्मों के निर्माता भी रहे । पद्मभूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके सेन की फिल्म ‘भुवन शोम’ ने उन्हें बिल्कुल अलग पहचान दिलाई थी। अपनी मातृभाषा बांग्ला के अलावा सेन ने हिंदी, तेलुगू और उड़िया भाषाओं में भी फिल्में बनाई। लेकिन इनकी अधिकतर फिल्में बांग्ला भाषा में हैं।

मृणाल सेन (Mrinal Sen) का जन्म फरीदपुर शहर (जो अब बांग्ला देश में है) में 14 मई, 1923 में हुआ था। हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने शहर छोड़ दिया और कोलकाता में पढ़ने के लिए आ गए। वह भौतिक शास्त्र के विद्यार्थी थे और उन्होंने अपनी शिक्षा स्कॉटिश चर्च कॉलेज एवं कलकत्ता यूनिवर्सिटी से पूरी की अपने विद्यार्थी जीवन में ही वह कम्युनिस्ट पार्टी के सांस्कृतिक विभाग से जुड़ गए। यद्यपि वह कभी इस पार्टी के सदस्य नहीं रहे पर ‘इप्टा’ से जुड़े होने के कारण वह अनेक समान विचारों वाले सांस्कृतिक रुचि के लोगों के परिचय में आ गए।

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संयोग से एक दिन फिल्म के सौंदर्यशास्त्र पर आधारित एक पुस्तक उनके हाथ लग गई जिसके कारण उनकी रुचि फिल्मों की ओर बढ़ी। इसके बावजूद उनका रुझान बुद्धिजीवी रहा और मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव की नौकरी के कारण कलकत्ता से दूर होना पड़ा। यह बहुत ज्यादा समय तक नहीं चला। वह वापस आए और कलकत्ता फिल्म स्टूडियो में ध्वनि टेक्नीशियन के पद पर कार्य करने लगे, जो आगे चलकर फिल्म जगत् में उनके प्रवेश का कारण बना।

1955 में मृणाल सेन (Mrinal Sen) ने अपनी पहली फीचर फिल्म ‘रातभोर’ बनाई। उनकी अगली फिल्म ‘नील आकाशेर नीचे’ ने उनको स्थानीय पहचान दी और उनकी तीसरी फिल्म ‘बाइशे श्रावण’ ने उनको अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि दिलाई। पाँच और फिल्में बनाने के बाद मृणाल सेन ने भारत सरकार की छोटी सी सहायता राशि से ‘भुवन शोम’ बनाई, जिसने उनको बड़े फिल्मकारों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया और उनको राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्रदान की। ‘भुवन शोम’ ने भारतीय फिल्म जगत में क्रांति ला दी और कम बजट की यथार्थपरक फिल्मों का नया सिनेमा या समानांतर सिनेमा नाम से एक नया युग शुरू हुआ।

इसके उपरांत उन्होंने (Mrinal Sen) जो भी फिल्में बनाईं, वह राजनीति से प्रेरित थी, जिसके कारण वह मार्क्सवादी कलाकार के रूप में जाने गए। वह समय पूरे भारत में राजनीतिक उतार-चढाव का समय था। विशेषकर कलकत्ता और उसके आस-पास के क्षेत्र इससे ज्यादा प्रभावित थे, जिसने नक्सलवादी विचारधारा को जन्म दिया| उस समय लगातार कई ऐसी फिल्में आईं, जिनमें उन्होंने मध्यमवर्गीय समाज में पनपते असंतोष को आवाज दी। यह निर्विवाद रूप से उनका सबसे रचनात्मक समय था।

मृणाल सेन (Mrinal Sen) को भारत सरकार द्वारा 1981 में कला के क्षेत्र में ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया था भारत सरकार ने उनको ‘पद्मविभूषण पुरस्कार’ एवं 2005 में ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ प्रदान किया। उनको 1998 से 2000 तक मानक संसद सदस्यता भी मिली। फ्रांस सरकार ने उन्हें ‘कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स ऐंड लेटर्स पुरस्कार’ से सम्मानित किया एवं रशियन सरकार ने ‘ ऑर्डर ऑफ फ्रेंडशिप सम्मान’ से नवाजा। बांग्ला फिल्मों के प्रसिद्ध निर्माता और निर्देशक मृणाल सेन (Mrinal Sen) का 95 साल की आयु में 30 दिसम्बर 2018 को निधन हो गया। सेन ने कोलकाता के भवानीपुर स्थित अपने आवास पर ही आखिरी सांस ली। 

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