नक्सल-आंदोलनों में दोतरफा पिसती हैं महिलाएं

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नक्सली कमांडर सुचित्रा महतो, जिनकी उंगलियां बंदूक की ट्रिगर दबाती रही हैं। नक्सली हिंसा और आतंक में एक समय जिसका स्थान सबसे ऊपर रहा करता था। वही सुचित्रा मार्च 2014 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने राज्य-सचिवालय रायटर्स बिल्डिंग में पेश हुई थी। जहां उन्होंने औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण कर दिया था।

सुचित्रा महतो का नाम दर्जनों नक्सल हिंसाओं से जुड़ा हुआ है। सुचित्रा ने 2010 में पश्चिमी मिदनापुर के सिल्दा में ईस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स (ईएफआर) पर हुए हमले में अहम भूमिका निभाई थी। जिसमें 24 जवानों की मौत हो गई थी। सुचित्रा पर हत्या, आगजनी सहित 17 से अधिक मामले दर्ज हैं।

सुचित्रा ने शीर्ष नक्सली नेता शशिधर महतो से शादी की थी और उन्हें पश्चिम मिदनापुर के लालगढ़-बिनपुर दस्ते का प्रभार सौंपा गया था। यह पश्चिम मिदनापुर के जंगलमहल, बांकुड़ा और पुरुलिया जिले में संचालित घातक दस्ते में से एक है। उसने कम समय में वो कर दिखाया जो हार्डकोर माओवादी भी नहीं कर पा रहे थे। सुचित्रा ने 2009 में संकराइल थाने पर हमला बोलकर थाना प्रभारी का अपहरण कर लिया। सुचित्रा के शशिधर की मौत एक एनकाउंटर में हो गई थी।

सुचित्रा का नाम कुख्यात नक्सली कमांडर किशनजी के साथ भी जुड़ा है। बताया जाता है कि किशनजी सुचित्रा से मिलने आया था, उसी दौरान मुठभेड़ के दौरान मार गिराया गया। किशनजी का एनकाउंटर आज से सात साल पहले हुआ था। किशनजी के एनकाउंटर में सुचित्रा की भूमिका भी संदेहास्पद है।

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सुचित्रा महतो का परिवार बेहद ग़रीब था, जो जंगल से लड़कियां लाकर उसे बेचकर घर परिवार की जीविका चलते थे। इन्हीं सब पारिवारिक समस्याओं के चलते सुचित्रा माओवादी आंदोलन से जुड़ गईं। जहां उन्होंने अपनी हिम्मत और क़ाबिलियत के दम पर जल्दी ही शीर्ष नेतृत्व तक का मुक़ाम हासिल कर लिया। नक्सल आंदोलन से जुड़े दर्जनों केसों में इनकी अहम भूमिका रही है।

सुचित्रा माओवादी आंदोलन में महिलाओं को संगठित करने की ज़िम्मेदारी भी देखती थीं। औरतों को इस आंदोलन से जोड़ना इनकी ज़िम्मेदारी थी। सुचित्रा के अनुसार महिलाओं को कभी उनकी ख़ुद की पहचान से नहीं देखा जाता है। महिलाएं युद्ध में दोनों तरफ से पिसती हैं। एक सैनिक के तौर पर भी और एक साधारण औरत के तौर पर भी।

माओवादी संगठन महिलाओं की नियुक्ति सबसे अधिक करते हैं। गांव क्षेत्रों में महिलाएं ही घरों पर रहती हैं। पुरुष वर्ग कमाने के लिए कहीं बाहर रहता है। दूसरी तरफ महिलाएं प्रशासन की संदेह में कम आती हैं। किसी भी काम को महिलाएं आसानी से अंजाम दे देती हैं और इनपर शक भी कम होता है।

पिछले कुछ वर्षों से नक्सलियों का जो आत्मसमर्पण का सिलसिला चला है उसमें भी महिलाओं का बहुत बड़ा रोल है। दरअसल, महिलाओं के साथ नक्सल संगठनों में शोषण का भी एक लम्बा इतिहास रहा है। बहुत सी महिलाओं के साथ वहां पर खूब शोषण होता है। यह शोषण भी कही न कही उनके आत्मसमर्पण की वजह बनता है। साथ ही, प्रेम-प्रसंग और वैवाहिक जीवन के कारण लोग इस हिंसा से दूर हुए हैं। महिलाओं के चलते पुरुष नक्सली हथियार छोड़ने पर भी मज़बूर हुए हैं।

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