Gandhi 150th Birth Anniversary: चंपारण से हुई पहले सत्याग्रह की शुरुआत

Mahatma Gandhi 150th Birth Anniversary: बात साल 1917 की है। चंपारण के किसानों का शोषण दिन-ब-दिन बढ़ रहा है। ब्रिटिश शासकों ने उन पर तीनकठिया नाम की व्यवस्था थोप दी है, जिसके तहत उनसे उनकी जमीन के 15 फीसदी हिस्से पर जबरन नील की खेती करवाई जाती है और साथ में कर भी देना होता है; जिसका पालन नहीं करने पर पिटाई, खेतों और घर की नीलामी जैसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं। 

Mahatma Gandhi

चंपारण की मुख्य फसल नील अंग्रेजों की फैक्टरियों में जाया करती थी और सभी अंग्रेजी साहब लोग आम के बागीचों, गन्ने के खेतों से घिरी आलीशान हवेलियों में रहते हैं। लेकिन, एक समस्या है। जूट या अफीम के निर्यात में अब मुनाफा नहीं रहा। नील की डाई में फायदा तो है, लेकिन जर्मनी की कृत्रिम डाई के कारण ब्रिटिश एकाधिकार को चुनौती मिल रही है। जो नील 1892-97 में उत्तरी और पूर्वी भारत में 91000 एकड़ जमीन पर उगाया जाता था, वह 1914 में 8100 एकड़ तक सीमित हो गया है, अधिकतर चंपारण के आसपास। पर, जबसे पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ है, अंग्रेजी राजशाही को ज्यादा संसाधन चाहिए। उत्तरी मैदानी इलाके में पट्टेदारों को अन्य फसलें उगाने के लिए अंग्रेज विवश कर रहे हैं और पानी, विवाह और मृत्यु पर कर वसूल रहे हैं। पट्टेदार नेता राजकुमार शुक्ला, और पत्रकार पीर मोहम्मद मुनिस दक्षिण अफ्रीका में अपने राजनैतिक आंदोलनों के लिए विख्यात गांधी को यहां लाना चाहते हैं। वे सफल होते हैं। अप्रैल 11 को चंपारण के रास्ते में गांधी मुजफ्फरपुर में रुक कर गिरमिटिया मजदूरों पर हुई क्रूरता के बारे में सुनते हैं।

भारत में हुई पहल

15 अप्रैल 1917, जिस शाम गांधी (Mahatma Gandhi) चंपारण के मोतिहारी पहुंचे, उन्हें जसौलपट्टी गांव में एक पट्टेदार के साथ हुई बदसुलूकी के बारे में पता चला। अगली सुबह वह उससे मिलने चल दिए, लेकिन आधे रास्ते में ही उन्हें जिला मजिस्ट्रेट का सम्मन दिया गया, मैं आपको जिले से दूर रहने का आदेश देता हूं। अगली ट्रेन से आप यहां से चले जाएं।

गांधी (Mahatma Gandhi) ने मना कर दिया। आगे गांधी ने बेतिया और मोतिहारी में डेरा लगाकर गांवों में जाने की योजना बनाई। 18 अप्रैल को गांधी को कोर्ट से बुलावा आया। गांधी ने सारे आरोप मान लिए और अपने वक्तव्य में कहा, ‘.मुझे लगता है कि उनके बीच रहकर ही मैं उनकी सेवा कर पाऊंगा। इसीलिए मैं यहां से जा नहीं पाया।’ मजिस्ट्रेट ने उनके जिला छोड़ने पर उन पर लगे आरोपों को हटा लिए जाने का प्रस्ताव रखा। गांधी का उत्तर था, जेल से वापस आने के बाद भी मैं चंपारण को अपना घर बनाऊंगा।कुछ दिनों बाद आरोप हटा लिए गए। देश ने पहली बार सत्याग्रह की शक्ति का अहसास किया।

Mahatma Gandhi

बयानों को इकट्ठा किया

22 अप्रैल से शुरू करके आगे के कई महीनों तक गांधी (Mahatma Gandhi) आसपास के गांवों के पट्टेदारों के बयान इकट्ठे करने में लग गए। 4 जून तक 850 गांवों के 7000 से ज्यादा किसानों ने बयान दिए। इन्हें संकलित करके लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एडवर्ड गैट को दे दिया गया। इन बयानों के आधार पर चंपारण एग्रेरियन इन्क्वायरी कमेटी बनी, जिसके चार भारतीय सिविल सेवा अधिकारियों व केंद्रीय सूबों के कमिश्नर के साथ गांधी भी सदस्य थे। काफी विचार-विमर्श के बाद कमेटी ने अक्तूबर में रिपोर्ट जमा की। इस रिपोर्ट के कारण चंपारण एग्रेरियन एक्ट 1918 बना, जिसने जबरन कराईजाने वाली नील की खेती को खत्म कर दिया।

आज का चंपारण

गांधी (Mahatma Gandhi) का वैश्विक नजरिया व्यक्ति के साथ-साथ समाज के नैतिक मूल्यों से जुड़ा था। धूम्रपान और शराब की कड़े तौर पर मनाही थी। बड़हरवा लखनसेन में गांधी ने पहला स्कूल खोला था। गांधी ने हुक्के के इस्तेमाल से रोकने के लिए विद्यालय के सामने एक पेड़ पर हुक्का लटका दिया था। उसके सौ साल बाद आज राज्य में शराब प्रतिबंधित है, पर चंपारण के युवाओं में बेरोजगारी व नशाखोरी तेजी से बढ़ी है। गन्ना इलाके के किसानों की पसंदीदा खेती है।  इलाके में कुछ चीनी मिलें हैं लेकिन बकाया भुगतान में देरी और कारखानों के कारण वायु व जल प्रदूषण के मुद्दे भी जगह बना चुके हैं।

गांधी (Mahatma Gandhi) का स्वराज पूरी तरह कृषि पर निर्भर गांवों को स्वावलंबी बनाना था। आज सूचना युग ने नई राहें और महत्वाकांक्षाओं को जन्म दिया है। लेकिन, चंपारण और उसके आसपास के क्षेत्रों के लोग मजदूर ही रहे। एक समय वे दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के लिए मजदूरी कर रहे थे और आज काम के लिए दिल्ली, मुंबई, पंजाब और अरब देशों का रुख कर रहे हैं। मानव विकास संस्थान के 2016 की बिहार के सात जिलों के अध्ययन के आधार पर बनी एक रिपोर्ट के अनुसार, यहां के 58 प्रतिशत घरों में कम से कम एक प्रवासी श्रमिक है। हालांकि, ये गांव कभी गांधी के स्वराज के विचार के लिए अहम थे। गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा था, मेरे आदर्श गांव में मनुष्य बुद्धिमान होंगे। स्त्री और पुरुष दोनों ही आजाद दुनिया में अपने बलबूते खडे़ होने के योग्य होंगे। एक बार फिर गांधी का इंतजार है।

Gandhi 150th Birth Anniversary: गांधी एक लेकिन व्यक्तित्व अनेक

एक लंबी लड़ाई की हुई शुरुआत

गांधी (Mahatma Gandhi) अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, बिहार के बारे में जैसे-जैसे जानकारी बढ़ी, मेरा यकीन पक्का हो गया कि गांवों में स्थायी बदलाव लाने के लिए शिक्षा को बढ़ावा देना जरूरी है। काश्तकारों की हालत दयनीय थी। वे अपने बच्चों को कुछ आने पैसों के लिए सुबह से रात तक नील की खेती में लगा देते थे।उन्हें महिलाओं की दुर्दशा देखकर भी दुख होता था। राजेंद्र प्रसाद ने ‘चंपारण में सत्याग्रह’ में लिखा है कि चंपारण में गांधी ने अपने एक साथी को कहा, ‘मैं यह नहीं चाहता कि भारतीय महिलाएं पश्चिमी रहन-सहन का अनुसरण करें। पर, यह पर्दा प्रथा उनकी सेहत पर बुरा असर डाल रही है। इस वजह से वे अपने पति के साथ काम में पूरा सहयोग नहीं दे पातीं। गांधी ने अपनी पत्नी कस्तूरबा को चंपारण बुलाया। अपने सहयोगियों के साथ मिलकर लड़कियों के लिए विद्यालय शुरू किए। गांधी ने लिखा भी है कि प्राथमिक शिक्षा मुहैया कराना ही काफी नहीं था। गांवों में शौच व्यवस्था की हालत खस्ता थी। बुजुर्गों को स्वच्छता की जानकारी देना जरूरी था।

Mahatma Gandhi

चंपारण घटनाक्रम

19वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में चंपारण में करीब एक लाख एकड़ जमीन पर नील की खेती होती थी। हालांकि 1897 में जर्मनी द्वारा कृत्रिम डाई की खोज करने के बाद प्राकृतिक नील की मांग में भारी कमी आई। वर्ष 1914 तक पूरे बिहार में इसकी कुल पैदावार 8100 एकड़ जमीन पर फैले 59 खेतों तक ही सिमट कर रह गई। प्रथम विश्व युद्ध के शुरू होने के बाद जर्मनी से व्यापार बंद हुआ। इससे बिहार से प्राकृतिक नील की मांग में फिर से तेजी आई। तीनकठिया व्यवस्था ने किसानों के लिए अनिवार्य कर दिया कि वे अपने खेत के कुछ हिस्से पर नील की खेती करें या फिर अंग्रेजों की नील की फैक्टरियों को अधिक किराया दें। किसान इससे भड़क गए और कुछ किसानों ने नील की खेती न करने की एक साथ शपथ भी ली।

11 अप्रैल 1917: गांधी (Mahatma Gandhi) मुजफ्फरपुर पहुंचे और चंपारण के कमिश्नर एलएफ मोर्सहेड को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने बताया कि वह स्थानीय प्रबंधन के सहयोग से नील की खेती का अध्ययन करने आए हैं।

13 अप्रैल: गांधी (Mahatma Gandhi) की खबर पाकर मोर्सहेड ने चंपारण के जिला न्यायाधीश को पत्र लिखा, जिसमें गंाधी की यात्रा को लेकर उन्हें सावधानी बरतने के लिए कहा। ‘उनके आने से लोक शांति में खलल पैदा होने का खतरा है। क्या उन्हें आना चाहिए।’

16 अप्रैल: गांधी (Mahatma Gandhi) हाथी पर सवार होकर जसौलपट्टी पहुंचे, जहां नील की खेती करने वाले मजदूरों ने ब्रितानी मालिकों के अन्याय की शिकायत की। गांधी को बीच रास्ते एक सिपाही ने रोका। वहां से मोतिहारी वापस हुए। जिला न्यायाधीश ने गंाधी को अगली रेलगाड़ी से जिला छोड़ने के लिए कहा। गांधी ने मना कर दिया और वाइसराय को *पत्र लिखा।

17 अप्रैल: साबरमती आश्रम को ब्रितानी सरकार द्वारा दी गई ‘कैसर-ए-हिंद’ उपाधि लौटाने के लिए कहा।

18 अप्रैल: गांधी (Mahatma Gandhi) ने नील की खेती करने वाले किसानों से गवाही लेनी शुरू की। दोपहर को न्यायाधीश के सामने उपस्थित हुए। उनसे कहा कि वह जिला न्यायाधीश के आदेश को न मानने के लिए मजबूर हैं और चंपारण में ही रुकेंगे।

20 अप्रैल: लेफ्टिनेंट गवर्नर की सलाह पर गांधी (Mahatma Gandhi) के खिलाफ कानूनी कार्यवाई रोक दी गई। चंपारण में गांधी की मौजूदगी से भयभीत होकर बिहार प्लांटर्स एसोसिएशन और यूरोपियन डिफेंस एसोसिएशन ने शिकायती पत्र लिखे और प्रस्ताव लाए। उन्हें भय था कि चंपारण में गांधी की मौजूदगी से उनके हितों पर काफी बुरा असर पडे़गा।

22 अप्रैल के बाद: गांधी (Mahatma Gandhi) ने गांवों की यात्रा करनी शुरू की, अकसर वह पैदल ही यात्रा करते। गवाही इकट्ठा करने के लिए वह कई मौकों पर गांवों में रातभर भी ठहरे।

25 अप्रैल: बेतिया के उपप्रभागी न्यायाधीश ने कहा, ‘ ब्रितानी मालिकों द्वारा गांधी को अपना दुश्मन मानना बेहद स्वाभाविक है।’, ‘पर गांधी रैयतों के लिए मुक्तिदाता हैं।’

4 जून: गांधी (Mahatma Gandhi) रांची पहुंचे और लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एडवर्ड गैट को किसानों के गवाह-पत्र सुपुर्द किए।

10 जून: चंपारण की कृषि जांच समिति का गठन हुआ। इसमें गांधी के अलावा भारतीय सिविल सेवा के चार ब्रितानी अफसरों और केंद्रीय सूबों के कमिश्नर एफजी स्लाई को जोड़ा गया।

जुलाई-अगस्त: बेतिया, मोतिहारी और आसपास के गांवों में समिति की कई मीटिंग हुईं। गांधी ने चंपारण में कई स्कूल खोले। इसमें कस्तूरबा ने उनका सहयोग किया।

3 अक्तूबर: समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश की। गांधी मोतिहारी की ओर चल दिए।

11 अक्तूबर: गांधी (Mahatma Gandhi) बेतिया पहुंचे, जहां चार हजार लोग स्टेशन पर उनके आने का इंतजार कर रहे थे।

13 अक्तूबर: गांधी (Mahatma Gandhi) अहमदाबाद की ओर रवाना हुए।

नवंबर: महादेव देसाई गांधी के सचिव बने।

4 मार्च 1918: गवर्नर-जनरल ने चंपारण एग्रेरियन बिल पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ तीनकठिया व्यवस्था का अंत हुआ।

 

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