एके हंगल: 50 की उम्र में किया था बॉलीवुड में डेब्यू, 225 फिल्में करने के बावजूद तंगी में गुजरे आखिरी दिन

हंगल कहते थे कि जब लोग रिटायर होते हैं तब मैंने फिल्मों में एंट्री ली। 1966-67 में जब उनकी उम्र करीब 50 की थी, उन्होंने सुबोध मुखर्जी की फिल्म ‘शागिर्द’ की। उन्हें निर्देशक बासु भट्टाचार्य ने ‘तीसरी कसम’ में राज कपूर के भाई के रोल में काम मिला।

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शोले फिल्म का ऐसा ही एक किरदार 'रहीम चाचा' सबकी यादों में है। आज रहीम चाचा का किरदार निभाने वाले एक्टर 'एके हंगल' की पुण्यतिथि है।

बॉलीवुड की अमर फिल्मों में शुमार फिल्म ‘शोले’। फिल्म ऐसी कि इसके छोटे से छोटे कैरेक्टर ने अपने बेहतरीन संवाद के बूते लोगों के दिलों पर अपनी अमिट छाप उकेर दी। शोले फिल्म का ऐसा ही एक किरदार ‘रहीम चाचा’ सबकी यादों में है। आज रहीम चाचा का किरदार निभाने वाले एक्टर ‘एके हंगल’ की पुण्यतिथि है। एके हंगल बॉलीवुड के ऐसे एक्टर हैं जिन्होंने 50 साल की उम्र में सिनेमा जगत में डेब्यू किया था। 70 से 90 के दशक तक ज्यादातर फिल्मों में अवतार किशन हंगल शंभू काका, रामू काका, नाना, पिता, नेता, स्कूल मास्टर, रिटायर्ड जज, डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर, पंडित, संत, कर्नल, पुजारी, दीवान और प्रिंसिपल जैसी छोटी भूमिकाएं करते रहे।

अपने 40 साल के करियर में एके हंगल ने करीब 225 फिल्मों में काम किया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले एके हंगल का जन्म 1 फरवरी, 1917 को कश्मीरी पंडित परिवार में अविभाजित भारत में पंजाब राज्य के सियालकोट में हुआ था। इनका पूरा नाम अवतार किशन हंगल था। कश्मीरी भाषा में हिरन को हंगल कहते हैं। इनका बचपन पेशावर में गुजरा, यहां उन्होंने थिएटर में अभिनय किया। इनके पिता का नाम पंडित हरि किशन हंगल था। अपने जीवन के शुरूआती दिनों में जब वे कराची में रहते थे उन्होंने वहां पर टेलरिंग का काम भी किया। पिता के सेवानिवृत होने के बाद पूरा परिवार पेशावर से कराची आ गया।

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1949 में भारत विभाजन के बाद एके हंगल मुंबई चले गए। 21 की उम्र में 20 रूपये लेकर पहली बार मुंबई आए थे। इसके बाद बलराज साहनी और कैफी आजमी के साथ थिएटर ग्रुप इप्टा के साथ जुड़े थे। उन्होंने इप्टा से जुड़ कर अपने नाटकों के मंचन के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना जगाई। हंगल साहब पेंटिंग भी करते थे। उन्होंने किशोर उम्र में ही एक उदास स्त्री का स्केच बनाया था और उसका नाम दिया चिंता। वे हमेशा अपनी फिल्मों से ज्यादा अपने नाटक को अहमियत देते थे और मानते थे कि जिंदगी का मतलब सिर्फ अपने बारे में सोचना नहीं है। वे हमेशा कहते थे कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं एहसान-फरामोश और मतलबी नहीं बन सकता।

हंगल कहते थे कि जब लोग रिटायर होते हैं तब मैंने फिल्मों में एंट्री ली। 1966-67 में जब उनकी उम्र करीब 50 की थी, उन्होंने सुबोध मुखर्जी की फिल्म ‘शागिर्द’ की। उन्हें निर्देशक बासु भट्टाचार्य ने ‘तीसरी कसम’ में राज कपूर के भाई के रोल में काम मिला। आगे उन्होंने अभिमान, आनंद, परिचय, गरम हवा, अवतार, मेरे अपने, गुड्‌डी, शोले, बावर्ची, कोरा काग़ज, शौकीन, आंधी, दीवार, चितचोर, सत्यम शिवम सुंदरम, मीरा, शराबी, अर्जुन, मेरी जंग, लगान, पहेली जैसी करीब 225 फिल्मों में काम किया। इनमें उन्हें सबसे ज्यादा लोकप्रियता रमेश सिप्पी की 1975 में प्रदर्शित फिल्म ‘शोले’ में रहीम चाचा के रोल से मिली।

इस फिल्म में उनका संवाद “इतना सन्नाटा क्यों है भाई” पॉपुलर कल्चर में बहुत इस्तेमाल होता है। आमिर खान के साथ ‘लगान’ उनकी आखिरी बड़ी फिल्म थी। उन्होंने हिंदी सिनेमा में कई यादगार रोल अदा किए। राजेश खन्ना के साथ उन्होंने 16 फिल्में की थी। हंगल साहब उर्दू भाषी थे। उन्हें हिंदी में स्क्रिप्ट पढ़ने में परेशानी होती थी। इसलिए वे स्क्रिप्ट हमेशा उर्दू भाषा में ही मांगते थे। आखिरी बार वे 2012 में टीवी सीरियल ‘मधुबाला – एक इश्क एक जुनून’ में अतिथि भूमिका में नजर आए। उसी साल 95 वर्ष की उम्र में 26 अगस्त को उनकी मृत्यु हो गई ।

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