रोजगार की तलाश में था, बहला कर नक्सली बना दिया

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वो घर से यह सोच कर निकला था कि कोई रहबर उसके और उसके परिवार की आर्थिक परेशानियों को समझेगा और उसे नौकरी दिलाएगा। लेकिन रास्ते में उसे रहबर तो नहीं मिला पर राह भटकाने वाला एक साथी जरूर मिल गया। वो उसे अपने साथ लेकर उसे गांव की गलियों से बहुत दूर जंगल और पहाड़ों की खौफनाक दुनिया में ले गया। उसने उसे नक्सलियों से मिलवाया और तब से लेकर कई सालों तक वो लाल आतंक का गुलाम बना रहा। आज बात हो रही है झारखंड के गुमला जिले के आदिवासी इलाकों में रहने वाले राजेंद्र उरांव की।

बात 90 के दशक की है जब बेहद ही गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले राजेंद्र को पैसों का लालच देकर नक्सली संगठन में शामिल कर लिया गया। करीब 10 साल तक राजेंद्र ने झारखंड से सटे छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश के बीहड़ों में नक्सली ट्रेनिंग ली। इस दौरान उसे हथियार चलाने, गुरिल्ला युद्ध और पुलिस को चकमा देने के गुर सिखाए गए। लेकिन इतने सालों तक नक्सलियों के साथ रहने के बावजूद राजेंद्र का दिल कभी भी खौफ और दहशत के कामों में नहीं लगा। एक दिन अचानक वो संगठन छोड़ नए रोजगार की तलाश में रांची आ गया। लेकिन काफी मशक्कत के बाद भी उसे कोई रोजगार नहीं मिला। थक-हार कर राजेंद्र ने असम के चाय बगानों में मजदूरी शुरू कर दी। उस वक्त बड़ी मुश्किल से राजेंद्र ने खुद को जुर्म के रास्ते से अलग किया था।

लेकिन राजेंद्र की किस्मत एक बार फिर उसे दगा दे गई। मजदूरी करने में उसका जी नहीं लगा और वो अपने घर वापस आ गया। यहां उसकी मुलाकात विनोद उरांव नाम के एक शख्स से हुई। दरअसल विनोद नक्सलियों के लिए आदमी ढूंढने का काम करता था। लिहाजा विनोद एक बार फिर राजेंद्र को उसी खून-खराबे के रास्ते पर ले गया जहां से वो कभी लौटा था। दोबारा नक्सलवाद के रास्ते पर लौटे राजेंद्र को इस बार नक्सलियों ने संगठन में काफी तरजीह दी। जल्दी ही उसे खूंखार नक्सली संगठन झारखंड जन मुक्ति परिषद का जोनल कमांडर बना दिया गया।

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इसके बाद राजेंद्र ने नक्सली दस्ते के साथ मिलकर गुमला, लोहरदग्गा, एवं पलामू जिले में ठेकेदारों से मोटी लेवी वसूली। इतना ही नहीं उसने कई बम ब्लास्ट भी किए और कई बार उसका सामना पुलिस वालों से भी हुआ। झारखंड के कई जिलों में राजेंद्र ने अपने गैंग के साथ मिलकर कई गंभीर वारदातों को अंजाम दिया। देखते ही देखते नक्सली राजेन्द्र उरांव पुलिस के लिए सिरदर्द साबित होने लगा। लिहाजा झारखण्ड पुलिस ने इस नक्सली पर 10 लाख रुपए इनाम की घोषणा कर दी तथा इसकी गिरफ्तारी के लिए अभियान तेज़ कर दिया।

पुलिस की सख्ती ने राजेंद्र को हिला कर रख दिया। अब राजेंद्र किसी तरह वापस मुख्यधारा में लौटने के लिए बेचैन हो उठा। आखिरकार झारखंड पुलिस की सरेंडर पॉलिसी ‘नई दिशा’ के तहत 15 फरवरी, 2018 को झारखंड जनमुक्ति परिषद-जेजेएमपी के उग्रवादी राजेंद्र उरांव उर्फ संतोष ने आत्मसमर्पण कर दिया।

राजेंद्र के सरेंडर के बाद उनकी पत्नी लीला देवी का कहना है, ‘मैंने घने जंगलों से अपने पति को खोज निकाला और उन्हें खूब समझाया, बच्चों का वास्ता देने पर वो आत्म समर्पण के लिए मान गए।’ इसके बाद पुलिस से संपर्क कर राजेंद्र ने गुमला डीसी विनोद कुमार व एसपी राजकुमार लकड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। आत्मसमर्पण के बाद पुलिस द्वारा नई दिशा के प्रावधन अन्तर्गत 10 लाख रुपए का चेक भी उसे दिया गया।

सरेंडर करने के बाद राजेंद्र उरांव ने पुलिस को कई राज बताए। जिसमें मुख्य रूप से भगवान हनुमान की जन्मस्थली आंजनधाम को भाकपा माओवादियों द्वारा दहलाने की योजना का खुलासा था। पुलिस ने इस साजिश का भेद जानने के बाद इसे नाकाम कर दिया था। इतना नहीं राजेंद्र ने पुलिस वालों को कई जगह जमीन में छिपे लैंड माइंस की भी जानकारी दी थी। जिसे पुलिस ने समय रहते निष्क्रिय कर दिया। आज राजेंद्र का परिवार शांतिपूर्ण जीवन जी रहा है।

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