सांसद, विधायक और पुलिसवालों को मारा, DIG के सामने दोनों हाथ ऊपर कर कहा- ‘मैं सरेंडर करता हूं’

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झारखंड का एक बड़ा ही मशहूर जिला है खूंटी। यह जिला साउथ छोटा नागपुर सब डिविजन में पड़ता है। साल 1999 में जिले के सुदूर बीहड़ों में कुछ बड़े नक्सली नेताओं की मीटिंग चल रही थी। उस समय तक सीपीआई माओवादी बनी नहीं थी। लिहाजा, यह बैठक नक्सलियों के एक दूसरे ग्रुप माओवादी कम्यूनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (एमसीसी) की थी। जब बैठक खत्म होने को थी उसी वक्त एक 16 साल का लड़का वहां आया। लड़के की शिकायत थी कि उसकी जमीन उसके रिश्तेदारों ने हड़प ली है और इसी वजह से वो परेशान होकर अपने घर से भाग कर घने जंगलों में आया है। यह इस 16 साल के लड़के की खूंखार नक्सलियों से पहली मुलाकात और बातचीत थी। इसके बाद वहां नक्सलियों ने उसे जमीन वापस दिलाने का भरोसा दिलाया और इस भरोसे की कीमत उस लड़के ने माओवादियों के इस संगठन में शामिल होकर अदा की। संगठन का साथ मिलने के बाद इस लड़के ने लाल आतंक का वो खौफनाक और घिनौना खेल खेला जिसने उसे गांव के बीर सिंह पाहन से शीर्ष और कुख्यात माओवादी नेता कुंदन पाहन बना दिया।

पुलिस वालों और राजनेताओं का कत्ल: कुंदन पाहन पर खूंटी में 50, रांची में 42, चाईबासा में 27, सरायकेला में 7 और गुमला में एक केस मिलाकर कुल 128 मामले दर्ज हैं। लेकिन विभिन्न अपराधों के यह आंकड़ें तो सिर्फ सरकारी फाइलों में दर्ज हैं। जानकारी के मुताबिक करीब 20 साल से ज्यादा समय तक कुंदन पुलिस के लिए सिरदर्द बना रहा और इन सालों में उसने एक से बढ़कर एक खूंखार कारनामों को अंजाम दिया। उसके खिलाफ लूट, हत्या, किडनैपिंग और लेवी जैसे कई मामले तो उजागर ही नहीं हो सके। फिर भी जब आप उसके द्वारा की गई नृशंस हत्याओं पर नजर डालेंगे तो आपको अंदाजा लग जाएगा कि यह माओवादी नेता किस कदर आतंक का पर्याय बन चुका था।

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  • साल 2007 में उसने जमशेदपुर के एमपी सुनील महतो की हत्या कर दी।
  • साल 2008 में उसने तमार के विधायक रमेश मुंडा और बुंदू के डीएसपी प्रमोद कुमार की हत्या की।
  • साल 2008 में आईसीआईसी बैंक में करोड़ों रुपए की लूट को कुंदन पाहन के नेतृत्व में ही अंजाम दिया गया था।
  • साल 2009 में उसने स्पेशल ब्रांच के इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदुवार की वीभत्स हत्या की थी। उसने इस खुफिया पुलिस इंस्पेक्टर का सिर धड़ से अलग कर दिया था।
  • 30 सितंबर, 2009 को 37 साल के इंदुवार का अपहरण खूंटी जिले में पाहन गैंग के सदस्यों ने किया था। हत्या से पहले करीब छह दिनों तक इस गैंग के सदस्यों ने उन्हें असहनीय यातनाएं दी थी।

ऐसे किया सरेंडर: साल 2013 में माओवादी संगठन ने पाहन को संगठन के लिए जमा की गई लेवी को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने और अन्य आरोपों के मद्देनजर संगठन से बाहर का रास्ता दिखा दिया।  इसके बाद पाहन ने अपना गैंग बना लिया। इधर पुलिस ने उसके जिंदा या मुर्दा पकड़े जाने पर 25 लाख रुपए का इनाम घोषित कर दिया था। पुलिस उसकी शिद्दत से तलाश कर रही थी। जब कुंदन पाहन को यह डर सताने लगा कि या तो वो पुलिस की गोलियों का निशाना बन सकता है या फिर उसकी मौत गैंगवार में हो सकती है तब उसने पुलिस के सामने सरेंडर करने का फैसला लिया।

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14 मई 2017, यह वो दिन था जब झारखंड की राजधान रांची में मीडिया का जमावड़ा लगा हुआ था। इस दिन 38 साल का मोस्ट वांटेड नक्सली कुंदन पाहन छोटानागपुर रेंज के डीआईजी ए.वी. होमकर के रांची स्थित आवास पर पहुंचा। भूरे बाल और हरे रंग के यूनिफॉर्म में 5 फुट 5 इंच के इस नक्सली को देखने के लिए वहां लोगों की भीड़ जमा थी। कुंदन पाहन सीपीआई माओवादियों का कमेटी सेक्रेट्री रहा था। उसने डीआईजी के सामने कहा,

‘मैं सरेंडर करता हूं।’ अपने दोनों हाथ ऊपर उठाते हुए उस वक्त कुंदन पाहन ने कहा था, ‘अब मैं सरकार के विकास कार्यक्रमों का हिस्सा बनना चाहता हूं।’

सरकार से मिली सुविधाएं: सरेंडर करने के बाद पाहन का यह दावा है कि उसे नहीं मालूम की साल 2008 में आईसीआईसीआई बैंक से लूटे गए 5 करोड़ रुपए और करीब डेढ़ किलो सोना कहां है? इतना ही नहीं उसका कहना है कि उसे उन एके-47 रायफलों के बारे में भी नहीं पता जो उसके गैंग के सदस्यों के पास था। कुंदन मूल रूप से खूंटी जिले के अड़की प्रखंड स्थित बारीगड़ा गांव का बासिंदा है। उसके दो भाई भी माओवादियों के साथ हाथ मिला चुके हैं। हालांकि, उसका एक भाई दिम्बा पाहन पहले ही आत्मसमर्पण कर चुका है जबकि दूसरे भाई श्याम पाहन को पुलिस ने पंजाब से गिरफ्तार किया था। बहरहाल, पाहन को सरकार की पुनर्वास नीतियों के तहत अब जीवन यापन के लिए पैसे दिए गए। उसे 5,000 रुपए वोकेशनल ट्रेनिंग के लिए दिए गए। इसके अलावा उसे अपने बच्चों को स्नातक तक पढ़ाने के लिए भी पैसे मिले। साथ ही, कुछ अन्य सुविधाएं भी मिलीं।

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कई नक्सलियों ने किया सरेंडर: बता दें कि पिछले कुछ सालों में 159 माओवादियों ने झारखंड में सरेंडर किया है। लेकिन इनमें से तीन ऐसे बड़े और खूंखार माओवादी हैं जिन पर पुलिस अधिकारियों और राजनेताओं की हत्या का आरोप लगा है। फरवरी 2017 में इंस्पेक्टर सुशील नाग की हत्या के आरोपी मशहूर नक्सली कान्हू मुंडा ने पुलिस के सामने सरेंडर किया था। करीब 20 पुलिस वालों को मारने वाले कुख्यात नकुल यादव ने 4 मई 2017 को रांची में पुलिस अधिकारियों के सामने हथियार डाले थे। नकुल यादव के सिर पर 15 लाख रुपए का इनाम भी था। 29 अप्रैल 2017 को नुन्नू लाल हंसदा और देवीलाल हंसदा नाम के दो माओवादी नेताओं ने दुमका जिले में पुलिस के सामने सरेंडर किया। इन दोनों पर साल 2013 के जुलाई के महीने में पाकुर के एसपी अमरजीत बलिहार की हत्या का आरोप है। इसके अलावा इन्होंने साल 2010 में इंस्पेक्टर सतानंद सिंह की हत्या की और साल 2011 में एक नन को भी मौत के घाट उतारा। 26 अप्रैल को 10 माओवादियों ने पुलिस के सामने घुटने टेके। इनमें एरिया कमांडर विशाल खेरवार भी शामिल था। इन सभी ने लोहरदगा पुलिस के सामने सरेंडर किया।

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