कश्मीरियों पर हमलेः कृपया तिल को ताड़ ना बनाएं

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पुलवामा हमले के एक दिन बाद से ही सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया में इस तरह की खबरें आनी शुरू हो गईं कि कश्मीर घाटी के बाहर रह रहे और पढ़े रहे कश्मीरियों पर हमले किए जा रहे हैं। उन्हें तंग किया जा रहा है। डराया-धमकाया जा रहा है और उनके खिलाफ देशभर में हिंसक उन्माद पैदा करने का प्रयास हो रहा है। हुर्रियत नेता मीर वाइज़ उमर फारूक, अब्दुल्ला पिता-पुत्र एवं अन्य कई कश्मीरी नेताओं के साथ-साथ देश के कई प्रबुद्ध नागरिकों और राजनेताओं ने इसकी भर्त्सना और तीखी आलोचना करते हुए सरकार को देश के अन्य भागों में रह रहे कश्मीरियों को समुचित सुरक्षा देने की मांग दोहराई है। शनिवार को हुई सर्वदलीय बैठक में जो प्रस्ताव पारित किया गया है उसमें भी कश्मीर के बाहर रह रहे कश्मीरियों की सुरक्षा की बात मजबूत तरीके से कही गई है।

जहां भी कश्मीरियों के खिलाफ हिंसा हो रही है वह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और भर्त्सनीय है। इसकी जितनी भी आलोचना की जाए उतनी कम है। लेकिन यह आलोचना करते हुए और पुलवामा में हुए आतंकी हमले को ध्यान में रखते हुए हमें अपना दृष्टिकोण भी नहीं खोना चाहिए। इंडियन एक्सप्रेस, इंडिया टुडे, टाइम्स ऑफ इंडिया, एनडीटीवी इत्यादि जितने भी मुख्यधारा के सम्मानजनक मीडिया और प्रकाशन समूह हैं सबने इन खबरों को तवज्जो से छापा है। लेकिन इन वारदातों और इस हिंसा की टेंडेंसी की भर्त्सना करते हुए हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि देशभर में इतने नृशंस, वीभत्स और दर्दनाक आतंकी हमले के बाद ऐसी कितनी घटनाएं रिपोर्ट की गई हैं। अगर संख्या की दृष्टि से हम देखें तो ऐसी घटनाओं को छिटपुट वारदातों से ज्यादा की संज्ञा अगर हम देते हैं तो वह भी अतिशयोक्ति होगी। क्या इतने विशाल देश में कोई भी व्यक्ति इन घटनाओं में गंभीर रूप से घायल हुआ है? इसका मतलब कतई ये नहीं है कि डराने धमकाने या कश्मीरियों को वापस घर भेजने की मांग या उन्हें उनके हॉस्टल में बंद कर देने का प्रयास उचित है। साथ ही यह भी बिल्कुल सही है कि बात को बढ़ने से पहले ही संभालने का प्रयास होना चाहिए, जो कि हो रहा है।

पुलवामा हमले में CRPF के 40 जवान शहीद हुए थे। पर, देश में कश्मीरियों की सुरक्षा के लिए सबसे पहले CRPF ने एक हेल्पलाइन लॉन्च की है, सीआरपीएफ मददगार (CRPF Madadgar Helpline)। गृह मंत्रालय द्वारा भी तमाम एजेंसियों, फोर्स और राज्य सरकारों को निर्देश जारी कर दिए गए हैं कि कश्मीरियों को समुचित सुरक्षा मुहैया कराई जाए। कहने का हमारा तात्पर्य सिर्फ इतना है कि इस तरह की एक भी घटना के प्रति जहां हमारा ज़ीरो टॉलरेंस होना चाहिए वहीं हमें अनावश्यक रूप से असुरक्षा का माहौल बनाने का भी कोई अधिकार नहीं है। और, सोशल मीडिया ने तो इस बात का बवंडर ही बना दिया है।

हमें लगता है कि हमने इस विषय पर अपना मत काफी स्पष्टता से रख दिया है। पर एक बात और, क्या उन कश्मीरी छात्रों को भी समझाने का प्रयास नहीं होना चाहिए जो सोशल मीडिया पर पुलवामा हमले को लेकर सेलिब्रेशन नहीं तो कुछ सेटिसफैक्शन तो व्यक्त कर ही रहे हैं। क्या मीरवाइज उमर फारूक को उस शख्स की भी आलोचना नहीं करनी चाहिए जो एक भारतीय कंपनी में नौकरी करते हुए पुलवामा हमले को असली सर्जकल स्ट्राइक (Surgical Strike) की संज्ञा दे रहा है। लाल चौक में शनिवार को स्थानीय निवासियों द्वारा देशभर में कश्मीरियों को टारगेट बनाए जाने के खिलाफ तो बंद रखा पर उनमें से किसी ने क्या एक आंसू भी उन 40 CRPF जवानों की शहादत पर बहाने की जहमत उठाई?

भारत को कमजोर करने और तोड़ने की साजिश का अगर एक चेहरा पुलवामा हमला है तो उसी का दूसरा चेहरा और रूप कश्मीरियों के खिलाफ हो रही हिंसा को बढ़ा चढ़ाकर कर पेश करना और उसे अनावश्यक तूल देना है। जब हम ये कहते हैं और दिल से मानते हैं कि कश्मीर में हुए आतंकी हमले के पीछे पाकिस्तान और कुछ भटके हुए स्थानीय नौजवान हैं तो फिर हम ये क्यों नहीं मानने के लिए तैयार होते कि सवा अरब के देश में कुछ पगलेट लोग कश्मीरियों को तंग करने की कोशिश कर रहे हैं। बात घूम फिर कर वहीं आती है, पर्सपेक्टिव (दृष्टिकोण)।

अतं में, पुलवामा हमले के बाद और कुछ लोगों को उससे पहले भी ‘हाऊज़ द जोश’ में देशभक्ति के जज्बे की बजाय जिंगोइज्म (कट्टर राष्ट्रवाद) की बू आती थी। अब जब कुछ लोग ‘हाऊज़ द जैश’ की बात कर रहे हैं तो फिर इन लोगों का क्या कहना है। सिर्फ सच की संपादकीय टीम आप जैसे जहीन और सूझबूझ वाले पाठकों को इन विचारणीय पहलुओं के साथ छोड़ कर अपनी बात को विराम देना चाहती है।

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