हर बार क्यों ठगा जाता है किसान?

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वित्त वर्ष 2019-20 के लिए अंतरिम बजट (Budget 2019) पेश हो चुका है। हर साल की तरह इस बार भी चर्चा का विषय है कि आखिर किसानों को क्या मिला? सियासी हलकों में इस पर चर्चा गर्म है। जितने दल उतने राग, पर किसानों को लेकर हितैषी वाला स्वर सब में समान है। इस मुद्दे पर हम सिर्फ सच पर भी चर्चा करते रहेंगे और अलग-अलग विशेषज्ञों की राय से आपको अवगत करवाएंगे। आज की चर्चा में शामिल हैं 2 फरवरी को इंडियन एक्सप्रेस में छपे ICRIER के चेयर प्रोफेसर अशोक गुलाटी और भारत कृषक समाज के चेयरमैन अजय वीर जाखड़ के लेख।

अशोक गुलाटी लिखते हैं कि भारत के किसानों ने अब सरकारों से उम्मीद करना ही छोड़ दिया है। मोदी सरकार ने साढ़े चार सालों में किसानों को लेकर बहुतेरे वादे किए। दावा किया गया कि आय दोगुनी हो जाएगी, लेकिन उलटा किसानों की आय पहले से भी कम हो गई।

ताज़ा अंतरिम बजट में सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के ज़रिए दो हेक्टेयर से कम ज़मीन वाले हर किसान को सालाना 6 हज़ार रुपए देने की घोषणा की है। इसके लिए कुल 75000 करोड़ रुपए आवंटित किया है। इसमें एक बिंदु यह भी है कि जिन किसानों के पास दो हेक्टेयर से अधिक भूमि है उन्हें इस स्कीम से वंचित रखा जाएगा और साथ ही साथ वो मजदूर वर्ग जो भूमिहीन है, वो भी इसका लाभ नहीं उठा सकता। इस स्कीम को लागू करने में कई तरह की परेशनियां भी पेश आएंगी। सबसे बड़ी समस्या भूमि रिकार्ड को साबित करने में होगी। ये बताने के लिए किसानों को अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ेंगे कि इनके पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है क्योंकि इस देश में अभी तक भूमि रिकार्ड सुचारू रूप से उपलब्ध ही नहीं है। इससे भ्रष्टाचार में इजाफे की आशंका है। दूसरी समस्या ये कि क्या महज 6 हज़ार रुपए में उर्वरक, सिंचाई, बीज इत्यादि पर साल भर में खर्च होने वाली लागत की भरपाई हो पाएगी?

फसली ऋण के लिए ब्याज के ज़रिए माली मदद को दोगुना करना, पशु पालन एवं मत्स्य पालन के लिए दो से तीन प्रतिशत ब्याज छूट की आर्थिक मदद, प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित किसानों के लिए दो प्रतिशत की ब्याज सहायता, समय पर ऋण भुगतान के लिए उन्हें भी तीन प्रतिशत अधिक सहायता। ये सब स्वागत योग्य पहल हैं।

राष्ट्रीय गोकुल मिशन एवं राष्ट्रीय कामधेनु आयोग के ज़रिए गौपालन एक अच्छी स्कीम है पर वहीं ज़मीन पर देखेंगे तो पाएंगे कि यही किसान आवारा और छुट्टा पशुओं से परेशान है। किसानों की पूरी फ़सल नुक़सान हो रही है। इस पर सरकार की तरफ़ से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। मौजूदा मार्केट ट्रेड पॉलिसी के ज़रिए जिस तरह से किसानों का लाखों करोड़ रुपया हर साल नुक़सान होता है उसकी एवज़ में मात्र 72000 करोड़ की स्कीम से उनका कोई भला होने वाला नहीं।

अशोक गुलाटी, वाजपेई सरकार द्वारा चलाई गई किसान क्रेडिट कार्ड स्कीम को एक शानदार स्कीम बताते हैं, जो किसानों को आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर बनाने में मील का पत्थर साबित हुआ। किसान अपनी ज़रूरतें इससे पूरी कर लेते थे। पर आज ये स्कीम बंद सी होती दिख रही है। हैरत की बात ये है कि फिलवक्त सिर्फ 10 फीसदी किसान ही किसान क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल कर रहे हैं। जरूरी है कि सरकारें इस उदासीनता के कारणों का पता लगाएं और इसके सुचारू रूप से इस्तेमाल को लेकर प्रतिबद्धता दिखाएं।

बकौल अशोक गुलाटी, किसानों की मुख्य समस्या आपूर्ति को लेकर नहीं है बल्कि सप्लाई की तरफ है जहाँ किसानों को उनकी फसल का उनका उचित दाम नहीं मिल पाता। गन्ना किसानों की समस्याए आज भी वैसी की वैसी हैं। ना ही इनको उचित दाम मिल पाता है और ना ही समय पर भुगतान। सरकार दुग्ध उत्पादन में बढ़ोत्तरी की बात कर रही है पर इस उत्पादन से किसानों का क्या फ़ायदा होने वाला है? किसानों को तो जो रेट पहले मिलता था आज भी वही मिलता है। ये अलग बात है कि मार्केट में मिल्क प्रोडक्ट्स के रेट आसमान पर पहुंच गए हैं। सिंचाई की समस्या जिससे किसान सबसे अधिक जूझ रहे हैं उसको लेकर कोई रोडमैप नहीं बना है।

फसल बीमा योजना जिसे मोदी सरकार एक क्रांतिकारी पहल की तरह पेश कर रही थी पर ये भी सिर्फ कॉर्पोरेट घरानों और बीमा कंपनियों को फायदा पहुंचाने में मददगार साबित हो रही है।

अशोक गुलाटी सवाल करते हैं कि क्या ये बजट कृषि क्षेत्र में रोजगार एवं व्यवसाय का अवसर बढ़ाएगी? क्या कृषि के क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा? क्या सब्ज़ी-फल की पैदावार और इसके अवसर बढ़ेंगे? क्या किसानों को उनकी लागत के हिसाब से मुनाफ़ा मिलेगा? क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाज़ार मूल्य के बीच की खाई खत्म होगी? जवाब है, नहीं। गुलाटी इस बात पर दुख जताते हैं कि  जिस देश की 62 फ़ीसदी आबादी की आजीविका का स्रोत कृषि है, जो देश की कुल आय में करीब 14 फीसदी सहयोग देता है। 50 प्रतिशत से अधिक श्रम शक्ति को रोज़गार प्रदान करता है। उसी क्षेत्र में निवेश सबसे कम है। वह साफ चेताते हैं कि देश तभी ख़ुशहाल होगा जब खेत में काम करने वाला किसान ख़ुशहाल होगा।

वहीं अजय जाखड़ भी इसे किसानों को ठगने वाला बजट ही मानते हैं। उनके मुताबिक, चार साल के नारों और वादों के बाद, किसानों ने किसी चमत्कार पर विश्वास करना बंद कर दिया है। ये अपने आप में दुर्लभ घटना है कि मौजूदा कीमतों पर कृषि के लिए जोड़े गए सकल मूल्य में वृद्धि, स्थिर कीमतों के मुकाबले अधिक नहीं है। कृषि मूल्य तीन से चार प्रतिशत के बीच मुद्रास्फीति की दर से नीचे रहे हैं। आजादी के बाद से संभवतः ऐसा तीसरी बार हुआ है।

अजय जाखड़, पीएम किसान सम्मान निधि योजना को प्रगतिशील तो बताते हैं लेकिन इसमें काश्तकार और भूमिहीन मजदूरों का शामिल नहीं होना उन्हें अखरता है। अशोक गुलाटी की तरह अजय जाखड़ भी फसली ऋण संबंधी आर्थिक मदद का स्वागत तो करते हैं लेकिन उनके मुताबिक यादी कर्ज के लिए ब्याज अनुदान को भी बढ़ाया जाना चाहिए था। पशुपालन और मत्स्य पालन को कृषि आय के रूप में वर्गीकृत करके आयकर लाभ को भी बढ़ाया जाना चाहिए था। लेकिन अफसोस कि इनकी पूरी तरह अनदेखी की गई। पिछले कुछ सालों में किसानों का जितना नुकसान हुआ है उसकी भरपाई 2019 बजट की बेहतरीन घोषणाओं से भी नहीं की जा सकती है।

अजय सवाल करते हैं कि क्या यह बजट रोजगार पैदा करेगा? क्या यह फल और सब्जियों की प्रोसेसिंग को बढ़ाएगा? क्या यह आजीविका को बदल देगा? उनके मुताबिक ऐसा होने की उम्मीद नहीं लगती। यह तो वही बात हुई कि जहां सर्जरी की आवश्यकता थी वहां बैंड-ऐड से काम चला लिया गया। वित्त मंत्री ने पिछले चार वर्षों में सरकार की गलतियों को स्वीकार किए बिना, समाज के उन दुखियारे वर्गों के घाव पर मरहम लगाने की कोशिश की, जिन्हें सरकार की नीतियों ने ही आर्थिक रूप से कमजोर किया है।

अजय मौजूदा दौर को भारतीय राजनीति के लिए बेहद अहम मानते हैं। बकौल अजय, आजीविका के दूसरे विकल्पों के लिए किसानों का पलायन और ग्रामीण आय में गैर-कृषि घटक का हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है। इसलिए, यह संभवतः ऐसा अंतिम आम चुनाव होगा जिसमें किसान निर्णायक तरीके से परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। फिलहाल, आने वाले दिनों में असंतुष्ट महत्वाकांक्षी पीढ़ी और फिर से चुनाव की अनिश्चितता का डर माननीय सांसदों को बहुत सताएगा।

सिलिकॉन वैली कैपिटलिस्ट टॉम पर्किन्स के शब्दों में, “युद्ध जीतने के बाद, उन्हें पता लगा कि घोड़े ने हमेशा की तरह बहुत सारा घास खाया और हमेशा की तरह पूरे खेत को खराब कर दिया।” यही वो एहसास है जो हर चुनाव के बाद किसानों को होता है।

अजय जाखड़ के मुताबिक इस बार हालत और भी बदतर है क्योंकि ये भावना चुनावों की घोषणा से पहले ही मौजूद है। इस तरह, भारत नीतिगत-विफलता और राजनीतिक सफलता दोनों तरह के जोखिम झेल रहा है।

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