शहीद हनुमंथप्पा के परिवार से सरकार की वादा खिलाफी

siachen martyr hanumanthappa

लांसनायक हनुमंथप्‍पा सियाचिन में 6 दिन तक बर्फ के नीचे दबे रहे। उनको जीवित अवस्‍था में सेना ने बाहर निकाल लिया था। यह एक चमत्कार की तरह था कि 6 दिनों तक 25 फीट नीचे बर्फ में दबे रहने का बाद भी वे जीवित थे। लेकिन उनकी तबीयत इतनी ज्‍यादा खराब हो गई थी कि उन्‍हें बचाया नहीं जा सका। उन्हें दिल्‍ली के आर्मी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। शहादत के बाद मानो समूचा देश उनके साथ खड़ा था। धारवाड़ जिले में उनके पैतृक गांव बेटादुर में पहुंचे मंत्रियों और अधिकारियों ने उनके परिवार से ढेर सारे वादे किए।

शहीद हनुमंथप्पा के परिवार से किए उन वादों को 3 साल का वक्त गुजर चुका है। पर वादे अब भी अधूरे हैं। कर्नाटक के रहने वाले लांसनायक हनुमंथप्पा की पत्नी 3 साल से उस सरकारी नौकरी की बाट जोह रही हैं, जो उन्हें मिलनी थी। उनकी शहादत के बाद केंद्र और राज्‍य सरकारों ने जवान के घरवालों को नौकरी, घर और जमीन देने का वादा किया था। साथ ही उनकी 5 साल की बेटी का भविष्‍य सुरक्षित करने की बातें भी कही गई थीं। पर आज उस शहीद की पत्‍नी महादेवी और उनका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा है।

महादेवी बताती हैं कि उन्‍होंने नौकरी पाने के लिए बहुत कोशिश की। मुख्‍यमंत्री, जिलाधिकारी से लेकर कई विभागों को पत्र भेजा लेकिन कोई जवाब नहीं आया। केंद्रीय मंत्री स्‍मृति ईरानी ने उन्हें सरकारी नौकरी दिए जाने को लेकर एक ट्वीट भी किया था। लेकिन उनके हुबली आने पर जब महादेवी ने उनसे मुलाकात की तो उन्‍होंने ऐसा कोई ट्वीट किए जाने से साफ इनकार कर दिया। सरकारों की असंवेदनशीलता की वजह से महादेवी ने अब नौकरी की आस छोड़ दी है।

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कर्नाटक सरकार ने शहीद के परिवार को बेगदूर के पास कृषि के लिए चार एकड़ जमीन दी है। पर बंजर होने की वजह से यह भूमि किसी काम की नहीं है। इसके अलावा बारीदेवरकोप्‍पा में एक एकड़ का प्‍लॉट भी मिला है पर अभी तक उस पर घर नहीं बनवाया गया है। महादेवी को अपनी बेटी के भविष्‍य की भी चिंता है। उन्‍होंने अपनी बेटी के लिए निःशुल्‍क शिक्षा की मांग की है। पर नौकरी के वादे की तरह ये वादा भी अब तक वादा ही बना हुआ है।

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