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Chhattisgarh Foundation Day: नक्सलवाद की कमर टूटी, बस्तर के जंगलों में 6 अरब की लागत से बन रहीं सड़कें

फाइल फोटो।

Chhattisgarh Foundation Day: पहले नक्सली 800 गांवों में अपनी सरकार चलाते थे, अब वह सिमटकर केवल 200 गांवों तक ही रह गई है। हार्डकोर नक्सलियों की संख्या भी 3 हजार से कम होकर एक हजार के आस-पास रह गई है। इसके अलावा 120 गांवों में सुरक्षाबलों ने अपने कैंप लगाए हुए हैं।

छत्तीसगढ़: नक्सलियों द्वारा दिए गए तमाम घावों के बावजूद बस्तर में विकास का पहिया दौड़ने लगा है। जिन जंगलों में कभी नक्सलियों का कब्जा था, आज वहां सरकार की विकास योजनाओं के माध्यम से सड़कें बन गई हैं। नक्सलवाद का दायरा भी पहले की अपेक्षा में काफी छोटा हो गया है।

जब से छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh Foundation Day) अलग राज्य बना, तभी से नक्सलवाद के खिलाफ जंग भी शुरू हो गई। जगदलपुर से बीजापुर के भोपालपटनम तक BRO ने सड़क बनाना शुरू कर दिया। इसी दौरान CRPF की जरूरत महसूस हुई। 2005 में बीजापुर से नक्सलियों के खिलाफ सलवा जुडूम अभियान की शुरुआत हुई। इसके बाद से लेकर अब तक नक्सलियों के खिलाफ लगातार कई ऑपरेशन्स को अंजाम दिया जा रहा है।

मिली जानकारी के मुताबिक, पहले नक्सली 800 गांवों में अपनी सरकार चलाते थे, अब वह सिमटकर केवल 200 गांवों तक ही रह गई है। हार्डकोर नक्सलियों की संख्या भी 3 हजार से कम होकर एक हजार के आस-पास रह गई है। इसके अलावा 120 गांवों में सुरक्षाबलों ने अपने कैंप लगाए हुए हैं।

वहीं अगर नक्सल क्षेत्रों में विकास (Chhattisgarh Foundation Day) की बात करें तो, बस्तर के जंगलों में 6 अरब की लागत से सड़कें बन रहीं हैं। घने जंगलों में फोर्स के कैंप खुल गए हैं। नक्सल क्षेत्रों में राशन की दुकानें खुल गई हैं।

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दंतेवाड़ा पुलिस अलग से नक्सलियों के खिलाफ मुहिम चला रही है। 2 महीने में 150 युवा नक्सलवाद का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में शामिल हुए हैं।

फोर्स ने भेज्जी से 6 किमी आगे पालोड़ी में कैंप बना लिया है। बीजापुर के पामेड़ में पुल बनाने के लिए चिंतावागु नदी के तट पर कैंप बन रहा है।

नारायणपुर से सोनपुर तक सड़क बन गई है। जुडूम के समय बंद हुए स्कूलों को दोबारा शुरू किया जा रहा है। हैरानी और आश्चर्य की बात ये है कि जिन नक्सलियों ने कभी स्कूल तोड़े थे, वही मुख्यधारा में शामिल होकर स्कूलों को बनवा रहे हैं।

हालात ये हैं कि अब नमक लेने के लिए मीलों नहीं चलना पड़ता, नक्सल क्षेत्रों में राशन की दुकानें हैं। नक्सल क्षेत्रों में बच्चों के लिए शिक्षा की सुविधा है। पुल बनने से एंबुलेंस पहुंच जाती है, इसलिए लोगों को समय पर इलाज मिलने लगा है। ये विकास के पहिए का जादू है जो युवाओं का नक्सलवाद से मोहभंग करवा रहा है और मुख्यधारा में ला रहा है।

नक्सलवाद का गढ़ माने जाने वाले दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर आदि शहरों की तस्वीर अब काफी बदल चुकी है। कभी केवल नक्सली उत्पात के लिए कुख्यात ये शहर अब विकास के रास्ते पर तेजी से बढ़ रहे हैं। यहां के युवा मेडिकल, इंजीनियरिंग, यूपीएससी जैसी तमाम सर्विसेज में आगे बढ़ रहे हैं।