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करगिल युद्ध में दुश्मनों के छक्के छुड़ाकर शहीद हुए सूबेदार नागेश्वर, याद में प्रतिमा बनाने की मांग कर रहा परिवार

शहीद सूबेदार नागेश्वर करगिल युद्ध के सच्चे नायक हैं।

ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से दुश्मन दनादन गोलियां बरसा रहे थे और भारत मां के वीर सपूत नीचे धरती की रक्षा के लिए दुश्मनों से लोहा ले रहे थे। दुश्मन की हर चालाकी का वीर जवानों ने मुंहतोड़ जवाब दिया और आखिरकार इस युद्ध में पाकिस्तान को परास्त कर विजयी बने। इस युद्ध में जब पाकिस्तान की तरफ से फेंका गया एक गोला नायब सूबेदार नागेश्वर के बगल में आकर गिरा तो वो वहां से हटे नहीं बल्कि डटकर दुश्मनों की उनकी करतूत का जवाब दिया। इस घनघोर लड़ाई में शहीद हुए सूबेदार नागेश्वर करगिल युद्ध के सच्चे नायक हैं। सूबेदार नागेश्वर सिंह झारखंड के लाल थे। रांची में आज भी उनका परिवार रहता है और उनके बलिदान की गाथा कहते-कहते उनका सीना आज भी चौड़ा हो जाता है। इस युद्ध में 13 जून 1999 को नागेश्वर शहीद हुए थे। 16 जून को उनका पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव लाया गया था। उस वक्त उनके घरवालों के आंखों में आंसू तो थे लेकिन सीने में उनकी देशभक्ति के प्रति सम्मान उससे कहीं ज्यादा था।

करगिल युद्ध में शहीद हुए नायब सूबेदार शहीद नागेश्वर महतो की धर्मपत्नी संध्या कहती हैं कि ‘मेरे जैसी भारतीय नारी के लिए यह बहुत ही सौभाग्य वाली बात है कि मेरे पति मर कर भी अमर हैं.. तो मैं क्यों रोऊं, रोने से उनकी आत्मा को ठेस पहुंचेगी।’ पति को याद कर संध्या कहती हैं, ‘वो मेरे दिल में बसते हैं। वह मेरे लिए कभी नहीं मरे…उनकी यादों को मैं संजो कर रखती हूं…उनकी यादों से मुझे बहुत हिम्मत मिलती है और यही कारण है कि मैं कभी भी उदास होती हूं तो वह खुद मुझे आगे बढ़ने की हिम्मत देते हैं जिसकी बदौलत आज मेरे बच्चे आगे बढ़ रहे हैं।’ शहीद की पत्नी संध्या रांची स्थित एक पेट्रोल पंप की मालकिन हैं। उनके तीन बच्चे हैं। जिसमें 29 साल का बड़ा बेटा मुकेश कुमार अपनी मां के साथ पेट्रोल पंप के कामों मे उनका हाथ बंटाता है। संध्या का दूसरा पुत्र मुकेश जो 27 वर्ष का हो चुका है वो हैदराबाद स्थित एक कंपनी में चार्टर्ड अकाउंटेंट के पद पर तैनात है और संध्या का छोटा बेटा आकाश रांची से ही ग्रेजुएशन कर रहा है।

शहीद जवान की पत्नी बनकर संध्या को गर्व जरूर है लेकिन उनका कहना है कि उनके पति की मौत के बाद सरकार की ओर से जो भी घोषणाएं हुई थी उन्हें मुकम्मल तौर पर अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है। शहीद का परिवार सरकार से गुजारिश कर रहा है कि शहीद नायब सूबेदार नागेश्वर की एक प्रतिमा बनाई जाए ताकि उनकी वीरगाथा को सभी जान सकें।

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