Donald Trump In India: पीएम मोदी का मास्टरस्ट्रोक कहीं खाली तो नहीं चला जाएगा?

अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump भारत दौरे पर हैं। पर सवाल उठता है कि इस यात्रा और मेहमान नवाज़ी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत को क्या हासिल होगा।

Donald Trump, Trump In India

36 घंटे के भारत दौरे पर डोनाल्ड ट्रंप।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने पूरे परिवार के साथ दो दिनों की राजकीय यात्रा पर पहली बार भारत आ रहे हैं। उनके साथ उनके सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ड ओ-ब्रायन, वित्तमंत्री स्टीवन मनुचिन, वाणिज्य मंत्री विल्बर रॉस और ऊर्जा मंत्री डॉन ब्रूएत के अलावा उनकी पत्नी मलेनिया ट्रंप, बेटी इवांका और जमाई जेरेड कुश्नर भी हैं, जो साबित करता है कि ट्रंप इस यात्रा को कितना महत्व दे रहे हैं। वे इसी महीने इंपीचमेंट से बरी हुए हैं और उन्हें आठ महीने बाद नवंबर में चुनाव लड़ना है। चुनावों में इस यात्रा से उन्हें दो तरह से फ़ायदा हो सकता है। एक तो फ़्लोरिडा, न्यू हैम्पशर, पैन्सिलवेनिया, मिशिगन, विस्कोन्सिन, मिनिसोटा और नवाडा जैसे कांटे की टक्कर वाले स्विंग स्टेटों में बसे भारतीय मूल के लोगों के निर्णायक वोट मिल सकते हैं। दूसरे इन राज्यों के मज़दूरों और किसानों को फ़ायदा पहुंचाने वाले व्यापार सौदे हो जाएं तो आम वोटरों से मिलने वाले वोट भी बढ़ सकते हैं। शायद इसी वजह से ट्रंप ने चुनावी वर्ष में भारत की यात्रा पर आने का फ़ैसला लिया है।

वैसे तो ज़्यादातर अमेरिकी लोग बड़ी चीज़ों को पसंद करते हैं लेकिन ट्रंप को बड़ी चीज़ों का जुनून जैसा है। बड़ी भीड़, बड़ा जश्न, बड़ा सौदा और बड़ा दिखावा, उन्हें हर चीज़ बड़ी चाहिए और यदि न हो तो उसे डींगे हांक कर बड़ा बना लेते हैं। जैसे अपने शपथ ग्रहण समारोह की सभा को वे अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी सभा मानते हैं। उनकी इसी तबीयत को भांपते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने, जो ख़ुद कोई कम दिखावापसंद नहीं हैं, ट्रंप के लिए अहमदाबाद में दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम में एक विशाल जलसे का आयोजन किया है। हवाई अड्डे से लेकर साबरमती आश्रम और स्टेडियम तक जाते समय राष्ट्रपति की झलक पाने के इच्छुक लोगों की कतारों का प्रबंध किया जा रहा है, जिनकी संख्या के बारे में ट्रंप अपनी दो-तीन रैलियों में 70 लाख तक के दावे कर चुके हैं। लगभग 61 साल पहले 1959 में भारत की यात्रा पर आए राष्ट्रपति आइज़नहावर के बाद ट्रंप दूसरे ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति होंगे जो भारत में जनसभा को संबोधित करेंगे। आइज़नहावर की रैली रामलीला मैदान में हुई थी और ट्रंप की रैली अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में होगी।

सवाल उठता है कि इस यात्रा और मेहमान नवाज़ी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत को क्या हासिल होगा। राष्ट्रपति ट्रंप की विभाजक नीतियों की वजह से अमेरिका की विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा ट्रंप से नफ़रत करता है। ऐसे में उनके भव्य स्वागत सत्कार से डेमोक्रेट नेता और नाराज़ हो सकते हैं और यदि ट्रंप हार गए तो चुनकर आने वाले डेमोक्रेट राष्ट्रपति के साथ नए सिरे से रिश्ते बांधने की नौबत भी आ सकती है। ट्रंप के स्वभाव और नीतियों की वजह से अमेरिकी संसद में भारत के साथ रिश्तों को लेकर सत्ताधारी और विपक्षी दोनों पार्टियों की जो एक आमराय बनी हुई थी वह टूटने लगी है। डेमोक्रेट पार्टी के सांसदों के भारत विरोधी बयान और प्रस्ताव आने लगे हैं। यानी ट्रंप के साथ इस समय नज़दीकी बढ़ाना एक राजनीतिक जुआ है। शायद इसीलिए भारत ने एक बड़ी और व्यापक व्यापार संधि से हाथ खींच लिए हैं।

लेकिन इस स्थिति का एक पहलू और है, और वो यह कि इम्पीचमेंट की प्रक्रिया से गुज़रने और चुनाव के सिर पर होने की वजह से ट्रंप इस समय थोड़े कमज़ोर हैं। उन्हें किसी बड़े देश के लोगों और सरकार के समर्थन की सख़्त ज़रूरत है। इसलिए उनके साथ व्यापार और सामरिक रिश्तों को लेकर फ़ायदे का सौदा करने का इससे मुनासिब समय शायद बाद में नहीं मिलेगा। समस्या यह है कि ऐसे सौदे पूरी तैयारी के बिना जल्दबाज़ी में नहीं किए जा सकते। परन्तु उनके लिए ज़मीन ज़रूर तैयार की जा सकती है और वादे लिए जा सकते हैं। चुनाव जीत जाने के बाद ट्रंप के हौसले और बढ जाएंगे और उनके साथ कोई फ़ायदे का सौदा करना नामुमकिन सा हो सकता है। शायद यही सोचविचार कर प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें चुनाव से पहले यात्रा पर बुलाने की बाज़ी खेली है। वैसे भी यात्रा का न्योता तो सितंबर की Howdy Modi यात्रा के समय ही दे दिया गया था। आने का समय तय करना काफ़ी हद तक अमेरिकी राष्ट्रपति के हाथों में था।

लेकिन यात्रा पर आने से पहले अमेरिका ने एक-दो ऐसे क़दम उठाए जिनसे माहौल में थोड़ी तल्ख़ी आई है। भारत अमेरिका व्यापार संधि की बातचीत तीन साल पहले, डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता संभालने के बाद शुरू हुई थी। अमेरिका के व्यापार घाटे को व्यापार लाभ में बदलने और America First के नारों के बल पर सत्ता में आए ट्रंप ने भारत को सीमाशुल्क की ऊंची दरों के लिए कोसते हुए स्टील और एल्यूमीनियम के आयात पर भारी सीमा शुल्क लगा दिया। भारत ने इसका जवाब अमेरिका से आने वाले बादाम, अखरोट और हार्ली डेविडसन मोटरसाइकिलों पर शुल्क बढ़ा कर दिया। इससे नाराज़ होकर अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि USTR ने पिछली जून में GSP व्यवस्था के तहत भारत के कुछ निर्यातों को मिलने वाली सीमाशुल्क की छूट को बंद कर दिया। इस व्यवस्था के ज़रिए भारत अमेरिका को लगभग सवा छह अरब डॉलर का माल सीमाशुल्क दिए बिना निर्यात करता था जो अमेरिका को होने वाले कुल निर्यात का 12 प्रतिशत था। निर्यातकों को GSP से लगभग 25 करोड़ डॉलर का मुनाफ़ा होता था।

25 हजार करोड़ के डिफेंस डील पर है सबकी नजर

ट्रंप यात्रा से उम्मीद की जा रही थी कि भारत अपनी GSP व्यवस्था बहाल करा लेगा। भारत ने GSP बहाली के बदले में सवा छह अरब डॉलर का तेल और गैस आयात करने की पेशकश भी की थी। लेकिन ट्रंप साहब चाहते थे कि भारत बादाम, अखरोट और डेयरी का माल ख़रीदे ताकि पेनसिलवेनिया, मिशिगन और फ़्लोरिडा जैसे उन स्विंग स्टेट्स के किसानों को फ़ायदा हो जिनका वोट ट्रंप की जीत सुनिश्चित कर सकता है। भारत को अपने किसानों की लोगों की धार्मिक भावनाओं की चिंता थी। इसलिए सौदा नहीं पटा और यात्रा से ठीक दस दिन पहले अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने ब्रज़ील, दक्षिण अफ़्रीका, इंडोनेशिया और हांक-कांग के साथ भारत को भी विकासशील देशों की श्रेणी से हटा दिया। GSP का लाभ केवल विकासशील देश ही उठा सकते हैं इसलिए ऐसा लगता है कि अब GSP की बहाली की कोई संभावना नहीं बची है।

सारे झगड़े की जड़ राष्ट्रपति ट्रंप की America First की नीति और व्यापार घाटा समाप्त करने की ज़िद है। व्यापार घाटे को वे अमेरिका की समृद्धि की डकैती के रूप में देखते हैं। असलियत यह है कि व्यापार घाट कम होने से कंगाली आए न आए, व्यापार घटने से बेरोज़गारी और कंगाली ज़रूर आती है। इसीलिए व्यापार को बढ़ाने पर ज़ोर दिया जाता है। भारत को इस समय अपना व्यापार फैलाने की सख़्त ज़रूरत है। क्योंकि एक तो उसकी अर्थव्यस्था मंदी के दौर से गुज़र रही है और दूसरे हर साल करोड़ों नए हाथों को रोज़गार की ज़रूरत है। हालांकि भारत का सबसे ज्‍यादा व्यापार यूरोप के साथ होता है लेकिन सबसे ज़्यादा निर्यात अमेरिका को जाता है। इसलिए अमेरिका के साथ व्यापार बढ़ना और भी ज़रूरी है।

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चीन में फैले Corona वायरस के प्रकोप और संक्रामक रोगों के फैलाव के बढ़ते ख़तरों को देखते हुए और चीन में बनने वाले माल की बढ़ती लागत को देखते हुए भारत के साथ व्यापार बढ़ाना अमेरिका के भी हित में दिखाई देता है। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप की पड़चून वाली शैली के चलते यह तब तक संभव नहीं है जब तक भारत कुछ और अमेरिकी माल ख़रीद कर उसके व्यापार घाटे को कम नहीं करता। भारत के लिए ऐसा करना मुश्किल नहीं होना चाहिए। इस यात्रा में ट्रंप भारतीय उद्योगपतियों और निवेशकों के साथ भी बैठक करेंगे जिसका उद्देश्य भारतीयों को अमेरिका में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करना है। भारतीयों नें अमेरिका में 18 अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश किया है। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप चाहेंगे कि भारतीय निवेश के और ऐलान करें जिन्हें चुनाव प्रचार में भुनाया जा सके। लेकिन बदले में भारतीय कंपनियां चाहेंगी कि H1B वीज़ा को लेकर भारतीय कंपनियों के साथ किया जा रहा भेदभाव बंद किया जाए और उनकी संख्या बढ़ाई जाए। IT उद्योग संगठन नैस्कॉम का कहना है कि TCS और इन्फ़ोसिस जैसी भारतीय कंपनियों की तुलना में गूगल, माइक्रोसोफ़्ट जैसी अमेरिकी कंपनियों को H1B वीज़ा आसानी से दिए जा रहे हैं।

व्यापार संबंधों के पटरी पर आते ही सामरिक और क्षेत्रीय संबन्धों की गाड़ी भी आगे बढ़ने लगेगी। इसीलिए लॉकहीड मार्टिन के सी-हॉक और अपाची लड़ाकू हेलीकॉप्टरों की ख़रीद का साढ़े तीन अरब डॉलर का सौदा किया जा रहा है जिससे स्विंग स्टेट पेंसिलवेनिया में रोज़गार बढ़ेंगे जहां लॉकहीड मार्टिन का कारख़ाना है। ट्रंप की शिकायत रही है कि भारत रक्षा का सामान अमेरिका की बजाए रूस से ज़्यादा ख़रीदता है। इस सौदे से उनकी वह शिकायत भी एक हद तक दूर होगी। एक सप्ताह पहले सहायक आणविक ऊर्जा मंत्री रीता बरनवाल भारत की यात्रा पर आई थीं और अब डॉन ब्रुएत ट्रंप के साथ आ रहे हैं। इससे यह उम्मीद भी बन रही है कि शायद वैस्टिंगहाउस कंपनी से छह परमाणु रियेक्टर ख़रीदने के सौदे पर आरंभिक सहमति बन जाए। हालांकि भोपाल गैस कांड के कड़वे अनुभव को याद करते हुए और वैस्टिंगहाउस के जल प्रदूषण के रिकॉर्ड को देखते हुए भारत शायद ही ऐसे किसी समझौते का साहस जुटा पाएगा।

FATF में ब्लैकलिस्ट होने से पाकिस्तान को बचा पाएंगे तुर्की और मलेशिया?

राष्ट्रपति ट्रंप की दिलचस्पी भले ही सामरिक और क्षेत्रीय समीकरणों से कहीं ज़्यादा व्यापार घाटा हटाने में हो लेकिन भारत को अपनी नज़र वहाँ से नहीं हटानी चाहिए। सामरिक और क्षेत्रीय समीकरणों पर राष्ट्रपति ट्रंप से बुश और ओबामा जैसी दूरदृष्टि की आशा तो नहीं की जा सकती। लेकिन उन्हें भी व्यापार से ख़ुश रखते हुए चीन-रूस और पाकिस्तान की धुरी के मुकाबले भारत-जापान-दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रिलिया की धुरी को मज़बूत करने, हिंद-प्रशांत क्षेत्र के समुद्री मार्गों की सुरक्षा और आतंकवाद के ख़िलाफ़ वैश्विक मोर्चे के कामों मे भारत की भूमिका और महत्व याद दिलाया जा सकता है। भारत और अमेरिका के जिन संबन्धों के आयाम क्लिंटन की यात्रा से खुले थे, जिनकी नींव राष्ट्रपति बुश की यात्रा के दौरान हुई परमाणु संधि से पड़ी और जो ओबाम की यात्राओं से विशेष सामरिक दोस्ती में बदले थे उन्हें वहाँ से आगे ले जाना तो ट्रंप की इस यात्रा से शायद ही संभव हो लेकिन उन्हें पक्का और अटूट ज़रूर बनाया जा सकता है, बशर्ते कि दोनों देश अपने-अपने America First और Make India वाले आर्थिक राष्ट्रीयतावाद की ज़िद को छोड़ कर आगे की सोचें।

इन रिश्तों की एक कड़ी चीन से जुड़ी है जिसमें अमेरिका की दिलचस्पी ज़्यादा है और दूसरी पाकिस्तान से जिसे काबू में रखने में भारत की दिलचस्पी ज़्यादा है। पिछले शुक्रवार को पैरिस में हुए Financial Action Task Force के महाधिवेशन में FATF ने काले धन के कारोबार और आतंकवादियों को मिलने वाले पैसे पर अंकुश लगाने के पाकिस्तान के प्रयासों को स्वीकार तो किया लेकिन साथ ही उन सभी 27 शर्तों को जून तक पूरा करने की चेतावनी भी दी जिनमें, आतंकवादी संगठनों और उनके सरबराओं को कड़ी सज़ाएं देना और आतंकवादियों के पैसे के सभी स्रोतों पर पूरी तरह अंकुश लगाना शामिल हैं। पाकिस्तान की इमरान ख़ान सरकार ने आतंकवादी संगठन लश्कर के सरगना हाफ़िज़ सईद को निचली अदालत से सज़ा दिलवाने और उनके जमात-उद-दावा जैसे संगठनों पर पाबंदी लगाने जैसे 14 काम गिनाकर अपना नाम ग्रे-लिस्ट से हटाने की अपील की थी। लेकिन FATF ने पाकिस्तान को ग्रे-लिस्ट से नहीं हटाया।

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FATF के अधिवेशन में संवाददाताओं को जाने की अनुमति नहीं है इसलिए अंदर किस देश ने क्या किया यह सही-सही पता कर पाना मुमकिन नहीं है। कुछ सूत्रों के हवाले से ख़बर मिली थी कि चीन और सऊदी अरब ने भी पाकिस्तान को ग्रे-लिस्ट में बनाए रखने और कड़ी चेतावनी जारी रखने की हिमायत की। केवल तुर्की पूरी तरह से पाकिस्तान के पक्ष में बोला और उसे ग्रे-लिस्ट से हटाने की दलील रखी। अगर यह बात सच है तो यह निश्चय ही भारत की दलीलों की जीत और पाकिस्तान के और अकेला पड़ने का संकेत है। कश्मीर को लेकर OIC की बैठक न बुलाने की वजह से पाकिस्तान सऊदी अरब से नाराज़ और निराश है। इसलिए उसने तुर्की और मलेशिया के साथ दोस्ती गांठने के प्रयास शुरू किए हैं। जिन्हें लेकर सऊदी शहज़ादा सलमान या MBS नाराज़ बताए जाते हैं। क्योंकि तुर्की और मलेशिया OIC के एक ऐसे धड़े का नेतृत्व करते हैं जो ईरान को साथ लेकर चलना चाहता है।

जो भी हुआ हो, पाकिस्तान एक बार फिर FATF में ब्लैकलिस्ट होने से बच गया है बावजूद इसके कि उसने मसूद अजहर, ज़कीउर रहमान लखवी और दाऊद इब्राहिम जैसे आतंकवादियों और उनके संगठनों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की है। हाफ़िज़ सईद को सुनाई गई सज़ा भी आतंकवादियों के लिए चंदा जमा करने को लेकर है। मुंबई के हमलों का उसमें कोई ज़िक्र नहीं है और उच्च न्यायालय में इस सज़ा को चुनौती देकर उन्हें ज़मानत मिल सकती है। ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है।

लगता यह है कि ऐन वक़्त पर अफ़गानिस्तान में तालिबान के साथ हुए एक हफ़्ते के युद्ध विराम और उसके कामयाब रहने पर शांति समझौते की संभावना ने अमेरिका, चीन और सऊदी अरब को पाकिस्तान के साथ नरमी बरते जाने का दबाव डालने पर मजबूर किया होगा। अमेरिका जैसे-तैसे तालिबान और अफ़गान सरकार के बीच समझौता करा कर अफ़ग़ानिस्तान से जान छुड़ाना चाहता है। ताकि ट्रंप अपनी चुनाव रैलियों में सैनिकों को वापस लाने का वादा निभाने के दावे कर सकें। मगर अफ़ग़ानिस्तान में असली खेल अमेरिका के जाने के बाद शुरू होगा। तालिबान अफ़गान सरकार को अमेरिका की कठपुतली सरकार मानते हैं। ठीक उसी तरह जैसे मुजाहिदीन सोवियत नजीबुल्लाह सरकार को रूस की कठपुतली सरकार मानते थे। इसकी पूरी संभावना है कि अफ़ग़ानिस्तान फिर उसी राह पर चले जिस पर वह सोवियत वापसी के बाद चला था। भारत और चीन दोनों के लिए ही वह सूरत किसी दुस्वप्न से कम नहीं होगी। फिर भी उम्मीद है कि बेहतरी की है। अलीम मसरूर की पंक्तियां हैः

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अंगारों से गुलशन फूटेगा शबनम से शरारे निकलेंगे…

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