रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार को क्यों लौटा दी उनकी दी ‘सर’ की उपाधि

सन् 1915 में ही अंग्रेज सरकार ने रवींद्रनाथ को ‘सर’ की उपाधि से विभूषित किया। इसके बाद उन्होंने ‘घर-बाहर ‘, ‘माली’, ‘बालक’ आदि कई पुस्तकें लिखीं। सन् 1916 में रबींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) ने ‘राष्ट्रीयता’ और अमेरिका में ‘व्यक्तित्व’ विषय पर प्रभावोत्पादक व्याख्यान दिए।

Rabindranath Tagore

भारतीय इतिहास में बीसवीं शताब्दी का पूर्वार्ध महात्मा गांधी और रबींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) की जीवन गाथाओं का इतिहास है। ये भारत के अतिरिक्त विश्व के अन्य देशों में भी समान रूप से प्रसिद्ध और चर्चित रहे। महात्मा गांधी ने जहाँ देश को स्वतंत्रता दिलाई वहीं रबींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) ने विश्वप्रसिद्ध ‘नोबेल पुरस्कार’ प्राप्त कर देश का नाम रोशन किया। रवींद्रनाथ का परिवार बंगाल के प्राचीन कला-प्रेमी परिवारों में गिना जाता है। उनके पूर्वज बनर्जी ब्राह्मण और जमींदार थे, जिन्हें ‘ठाकुर दा’ कहा जाता था संभवत: यही नाम बिगड़कर ‘टैगोर’ हो गया। वे लोग कलकत्ता (अब कोलकाता) में एक तीन मंजिला विशाल महल में रहते थे, जिसे

‘जोड़ासांको वाला महल’ कहा जाता है। उनका परिवार ‘ठाकुर’ कहा जाता है। उनके पूर्वज समाज के अगुआ थे। वे जाति के ब्राह्मण और शिक्षा तथा संस्कृति के क्षेत्र में अग्रणी थे। कट्टरपंथी हिंदू उन्हें ‘पिराली’ कहते थे, क्योंकि वे लोग मुसलमानों के साथ उठते-बैठते थे। इसलिए उन्हें जाति-भ्रष्ट माना जाता था। रवींद्रनाथ के दादा द्वारकानाथ ठाकुर ‘प्रिंस’ कहलाते थे। उनके वैभव की धाक देश में ही नहीं, विदेशों में भी थी। रवींद्रनाथ के पिता देवेंद्रनाथ ठाकुर भी काफी प्रसिद्ध थे उनकी बहुत बड़ी जमींदारी थी। उनकी माता का नाम शारदा देवी था रबींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) के चौदह भाई – बहन थे। रवींद्र उनमें सबसे छोटे थे। रवींद्रनाथ का जन्म कलकत्ता में 7 मई, 1861 को हुआ था। बचपन में परिवार के लोग उन्हें ‘रवि’ कहकर पुकारते थे उनका बचपन इसी पुश्तैनी मकान में बड़ी सादगी के साथ बीता। जाड़ों में भी वह सूती कपड़े पहनते थे। उनके खान-पान में सादगी दिखाई देती थी। शैशवावस्था तक रवि हवेली में ही रहे। फिर उन्हें नौकरों के हवाले कर दिया गया। शायद धनी परिवारों की यही रीति-नीति थी। नौकर-चाकर ही रवि को खिलाते-पिलाते थे रात में सोने के लिए ही वह माँ के पास जाते थे नौकरों से उन्हें प्रायः डाँट-फटकार मिलती रहती थी, जिसकी पीड़ा के कारण उन्होंने अपने बचपन के जमाने को ‘सेवकशाही’ के रूप में याद किया है।

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