Bastar

छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में पुलिस और सुरक्षाबलों द्वारा लगातार चलाए जा रहे एंटी नक्सल ऑपरेशन से प्रदेश में नक्सलियों का क्षेत्र सिमटता जा रहा है। राज्य से नक्सलवाद (Naxalism) के खात्मे के लिए केंद्र सरकार भी कमर कस चुकी है।

लाल आतंक के गढ़ बस्तर (Bastar) में नक्सलियों (Naxals) के खिलाफ लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं। आए दिन नक्सलियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ की खबरें आती रहती हैं। सुरक्षाबलों को चकमा देने के लिए नक्सली नई-नई चालें भी चलते रहते हैं।

बस्तर (Bastar) को लोग वैसे तो छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में लाल आतंक के गढ़ के तौर पर जानते हैं। लेकिन इस इलाके की संस्कृति कितनी समृद्ध रही है, ये बात शायद बहुत कम लोग ही जानते हैं। यहां कि आदिवासी संस्कृति की पहचान देश ही नहीं विदेशों में भी है।

छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के नक्सल गढ़ बस्तर (Bastar) में विकास की रफ्तार तेज हो रही है। धुर नक्सल प्रभावित इस संभाग में पांच बड़े स्टील प्लांट खोले जाएंगे। दंतेवाड़ा के सरपंच संघ की मांग पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल (CM Bhupesh Baghel) ने इसकी मंजूरी दे दी है।

बस्तर में बीते 2 महीने में हुई 25 हत्याओं के मामले में बड़ी जानकारी सामने आई है। नक्सलियों ने इन हत्याओं की जिम्मेदारी ली है।

गांधी जी के जन्म दिवस यानी 2 अक्टूबर के मौके पर नक्सल प्रभावित (Naxal Area) बस्तर में नई शांति प्रक्रिया की शुरुआत होने जा रही है। इसमें एक अनूठी ई-रैली का आयोजन किया गया, जिसका नाम दिया है- 'चुप्पी तोड़ो'।

छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के धुर नक्सल बस्तर (Bastar) 21 सितंबर से जगदलपुर से रायपुर और हैदराबाद के लिए हवाई यात्री सेवा शुरू हो रही है। इसके संचालन के लिए भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण की पांच सदस्यीय टीम 20 सितंबर को जगदलपुर पहुंच गई थी।

छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के धुर नक्सल प्रभावित बस्तर (Bastar) में स्थानीय पुलिस ने नक्सलियों (Naxalites) के खिलाफ जबरदस्त अभियान शुरू किया है। इसके तहत नक्सलियों का आदिवासी विरोधी चेहरे को बेनकाब किया जा रहा है।

सुरक्षाबल अब छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में लाल आतंक का गढ़ कहे जाने वाले बस्तर (Bastar) के सुदूर जंगलों तक पहुंचने की तैयारी कर रहे हैं। क्योंकि बस्तर के उन जंगलों में अब भी नक्सली (Naxals) समानांतर सत्ता चला रहे हैं।

आयता ने भी जिंदगी के करीब 13 से इसी मुगालते में गुजार दिए कि वह अपने समाज और आदिवासियों के हितों की लड़ाई लड़ रहा है। पर, जब असलियत से सामना हुआ तो संगठन में उसका दम घुटने लगा।

बस्तर पुलिस ने इन समस्याओं से निपटने का एक सही तरीका ढूंढ निकाला है। ऐसा तरीका जिससे नक्सलियों का अर्बन नेटवर्क और कथित समाजसेवी संस्थाओं की ये कोशिशें नाकाम हो जाएंगी।

आयता ने भी जिंदगी के करीब 13 से इसी मुगालते में गुजार दिए कि वह अपने समाज और आदिवासियों के हितों की लड़ाई लड़ रहा है। पर, जब असलियत से सामना हुआ तो संगठन में उसका दम घुटने लगा।

दरअसल बीते कुछ समय से बस्तर के स्थानीय नक्सली लगातार लाल आतंक का रास्ता छोड़ रहे हैं और मुख्यधारा में जुड़ रहे हैं। इसी वजह से नक्सलियों का जनाधार गिरता जा रहा है।

राष्ट्रीय त्योहारों पर पहले यहां के गांवों में लाला आतंक के खौफ से तिरंगे के बजाय नक्सलियों का काला झंडा फहराया जाता था। या फिर लोग डर के मारे न तो तिरंगा फहराते थे, न ही इस दिन खुशियां मना पाते थे।

पिछले दो महीनों में 70 नक्सलियों ने लोन वर्राटू अभियान के तहत सरेंडर किया है। जिसमें एक लाख से लेकर 8 लाख रुपये तक के इनामी नक्सली शामिल हैं।

बस्तर (Bastar) के इतिहास में यह पहला मौका है जब मानसून काल में इस खूबसूरत जलप्रपात को निहारने आने वाले स्थानीय लोगों और पर्यटकों को यहां आने के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया है।

छत्तीसगढ़ का बस्तर (Bastar) जिला, जिसकी पहचान नक्सलवाद (Naxalism) से होती है, उसी बस्तर जिले के एक छोटे से पंचायत की इस पहल ने देश भर में कोरोना के संकटकाल में मिसाल कायम किया है।

यह भी पढ़ें