भटके हुए आंदोलन का सबसे बड़ा उदाहरण है ‘नक्सलवाद’, जानें कैसे आतंक में बदल गई हक की लड़ाई

‘नक्सलवाद’ (Naxalism) सिर्फ देश की आंतरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है बल्कि राजनीतिक और आर्थिक समस्या के साथ-साथ एक विकट सामाजिक समस्या भी है।

Naxalism

सांकेतिक तस्वीर।

‘नक्सलवाद’ (Naxalism) ने अब तक हजारों लोगों की जानें ली हैं। अमेरिकी विदेश मंत्रालय की तरफ से 2018 में जारी एक रिपोर्ट में यह बात कही गई कि भारत के आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती बने नक्सली दुनिया के चौथे सबसे खतरनाक आतंकी संगठन हैं।

जब भी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरों की बात आती है, तो ‘नक्सलवाद’ (Naxalism) सबसे पहले आता है। ‘नक्सलवाद’ सिर्फ देश की आंतरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है बल्कि राजनीतिक और आर्थिक समस्या के साथ-साथ एक विकट सामाजिक समस्या भी है। इसके साथ ही एक भटके हुए आंदोलन का भी सबसे बड़ा उदाहरण है ‘नक्सलवाद’।

नक्सलबाड़ी से शुरू हुई हक की लड़ाई कैसे बन गई ‘नक्सलवाद’

कहानी शुरू हुई 25 मई, 1967 को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी में हुए भूमि विवाद में जमींदारों और किसानों के बीच हुए संघर्ष से। दरअसल यह लड़ाई गरीब किसानों के हक के लिए शुरू हुई थी। इस संघर्ष के दौरान 11 किसानों की जान चली गई और यहीं से भड़की ‘नक्सलवाद’ (Naxalism)  की चिंगारी। धीरे-धीरे इस चिंगारी ने आग का रूप ले लिया और इसकी ज्वाला में पश्चिम बंगाल के साथ-साथ बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिमी उत्तर-प्रदेश, आंध्रप्रदेश सहित कई राज्य झुलसने लगे। धीरे-धीरे यह एक सशस्त्र आंदोलन बन गया। समय के साथ इस आंदोलन की कमान गलत हाथों में चली गई और फिर यह पूरा आंदोलन भटक गया। वही, भटका हुआ आंदोलन आज देश के सामने आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा बनकर खड़ा हो गया है।

नक्सली दुनिया के चौथे सबसे खतरनाक आतंकी संगठन

अलग-अलग संगठन बनाकर ‘नक्सलवाद’ (Naxalism) के नाम पर देश में हिंसा फैलाई जाने लगी। ‘नक्सलवाद’ ने अब तक हजारों लोगों की जानें ली हैं। अमेरिकी विदेश मंत्रालय की तरफ से 2018 में जारी एक रिपोर्ट में यह बात कही गई कि भारत के आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती बने नक्सली दुनिया के चौथे सबसे खतरनाक आतंकी संगठन हैं। देश में जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में होने वाले आतंकी हमलों की तुलना में नक्सली हिंसा ने अधिक सुरक्षाकर्मियों की जानें ली है। सीपीआई (CPI) माओवादी को विश्व का चौथा सबसे खतरनाक संगठन करार देते हुए 2018 की अमेरिकी स्टडी में कहा गया कि भारत में हुए 53 प्रतिशत हमलों में इसका हाथ रहा है। हालांकि, इस अध्ययन के मुताबिक, भारत में 2016 और 2017 के बीच नक्सली हमलों में कमी आई है।

मासूमों को  बनाते हैं निशाना

बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिमी उत्तर-प्रदेश, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, बंगाल, तमिलनाडु, तेलंगाना, महाराष्ट्र आदि राज्यों के कई हिस्से अभी भी ‘नक्सलवाद’ (Naxalism) की चपेट में हैं। नक्सलवाद का दंश सबसे अधिक कोई झेल रहा है तो वह है यहां के निर्दोष लोग, मासूम बच्चे और महिलाएं। नक्सली तो पहले इन इलाकों के मासूम लोगों और आदिवासियों को उनका हक दिलाने के नाम पर बरगलाते हैं और फिर उन्हें अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं। जे लोग उनकी बातों में नहीं आते, उन्हें डरा-धमकाकर नक्सली जबरदस्ती संगठन में शामिल करते हैं। इतना ही नहीं, विरोध करने पर नक्सली इन मासूमों की जान भी ले लेते हैं। सरकारी मदद लेने पर नक्सली उन्हें डराते-धमकाते हैं। नक्सली गांव वालों को पुलिस का खबरी बताकर मारते-पीटते हैं।

विकास की राह में बना रोड़ा

आज हालात ये हैं कि ‘नक्सलवाद’ (Naxalism) देश के विकास के रास्ते में भी सबसे बड़ी बाधा बन चुका है। नक्सलियों (Naxalites) ने इन इलाकों को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित कर रखा है। जहां ये सुविधाएं पहुंची भी, वहां पर भी विकास के दुश्मनों ने इन्हें तबाह कर दिया। स्कूलों, अस्पतालों और सरकारी भवनों को नक्सलियों ने बंद करवा दिया या विस्फोट कर ध्वस्त कर दिया। उन्हें भी डर है कि यदि यहां के लोग पढ़-लिख लेंगे तो उनकी बातों में नहीं आएंगे और उनका वर्चस्व कमजोर हो जाएगा।

जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए सरकार ने कस ली है कमर

हालांकि, अब सरकार भी ‘नक्सलवाद’ (Naxalism) की समस्या पर विशेष ध्यान दे रही है। नक्सल प्रभावित इलाकों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। क्योंकि इन इलाकों का विकास, ‘नक्सलवाद’ की समस्या से निजात पाने के लिए सबसे अहम है। इन इलाकों के लिए सरकारें विशेष योजनाएं चला रही हैं। सरकार और प्रशासन नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए पूरी तरह कमर कस चुकी है।

नक्सल ग्रस्त इलाकों के विकास पर दिया जा रहा  विशेष ध्यान

इन इलाकों में मूलभूत सुविधाएं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क आदि को लोगों तक पहुंचाने के लिए सरकार हर संभव प्रयास कर रही है। नक्सल ग्रस्त इलाकों में शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सबसे अधिक नक्सल प्रभावित सभी 30 जिलों में जवाहर नवोदय विद्यालय और केंद्रीय विद्यालय संचालित किए जा रहे हैं। नक्सल प्रभावित इलाकों में मूलभूत सुविधाओं को पहुंचाने के साथ ही इन इलाकों में संचार का नेटवर्क की मजबूती ने भी नक्सलियों की कमर तोड़ने में मदद की है। संचार मंत्रालय के यूएसओ फंड की मदद से टेलीकॉम कंपनियों ने इन क्षेत्रों में मोबाइल टावरों की संख्या में काफी वृद्धि की है।

मुख्यधारा से जोड़ने के लिए किए जा रहे प्रयास

सरकार और प्रशासन द्वारा नक्सलवाद पर दोतरफा प्रहार किया जा रहा है। सुरक्षाबलों के द्वारा नक्सलियों की धर-पकड़ और एनकाउंटर तो किया ही जी रहा, साथ ही इन भटके हुए लोगों को फिर से मुख्यधारा से जोड़ने के लिए भरपूर प्रयास किए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में प्रशासन द्वारा चलाया जा रहा ‘लोन वर्राटू’ अभियान (घर लौटो अभियान) इसका ताजा उदाहरण है। इस अभियान का नतीजा है कि काफी कम समय में बड़ी संख्या में नक्सलियों और उनकी मदद करने वालों ने सरेंडर किया है।

सरेंडर करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास के लिए भी सरकार और प्रशासन ने आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीतियां बनाई हैं। इन नीतियों के तहत सरेंडर करने वाले नक्सलियों को आर्थिक मदद के साथ उन्हें रोजगार दिलाने की जिम्मेदारी भी सरकार और प्रशासन उठा रहा है। इन नीतियों का सकारात्मक असर दिखने को मिल रहा है। इसके तहत नक्सली लगातार आत्मसमर्पण कर रहे हैं।

नक्सली वारदातों में आई कमी

सरकार की नीतियों का नतीजा है कि पिछले 5-6 सालों में नक्सली वारदातों में जबरदस्त कमी आई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2009-13 के बीच कुल 8,782 नक्सली घटनाएं हुईं वहीं, 2009-13 के बीच देश में 4,969 नक्सली घटनाएं हुई हैं। साल 2009-13 के बीच इन घटनाओं में 3,326 लोगों ने (इनमें सुरक्षा बल के जवान भी शामिल हैं) नक्सली घटनाओं में अपनी जवान गंवाई। वहीं, साल 2014-18 के बीच यह आकंड़ा घट कर 1,321 पर सिमट गया।

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साल 2016 से 2019 के दौरान नक्सल प्रभावित इलाकों में हिंसा की वारदातों में 2013-15 के मुकाबले 15.8 फीसद और इनमें होने वाली मौतों की संख्या में 16.6 फीसद की कमी आई है। सरकार की नीति और साल 2015 के एक्शन प्लान पर अमल की वजह से यह कमी आई है। इस अवधि में नक्सली हिंसा से प्रभावित जिलों की संख्या भी साल 2018 में घटकर 60 रह गई थी। इनमें भी दो तिहाई घटनाएं केवल दस जिलों में ही हुई हैं। 30 जून, 2019 तक नक्सली हिंसा में मरने वालों की संख्या 117 रही है। जबकि इसके मुकाबले साल 2018 में जून तक नक्सली हिंसा में 139 लोगों की मौत हुई थी।

कम हुआ नक्सलियों का वर्चस्व

आंकड़ों के मुताबिक, 2008 में 223 जिले नक्सल प्रभावित थे लेकिन, तत्कालीन सरकार के प्रयासों से इनमें कमी आई और 2014 में यह संख्या 161 रह गई। 2017 में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या और घटकर 126 रह गई। गृह मंत्रालय की 2019 में आई रिपोर्ट के अनुसार, 44 जिलों को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया है जबकि 8 नए जिलों में नक्सली गतिविधियां देखी जा रही हैं। केरल में ऐसे तीन, ओडिशा में दो और छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश में एक-एक जिले हैं, जहां पहली बार नक्सलियों (Naxals) की हलचल दिखी है। लिहाजा, नक्सल प्रभावित कुल जिलों की संख्या अब 90 हो गई है। ये सभी जिले देश के 11 राज्यों में फैले हैं जिनमें तीस सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित बताए गए हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और बिहार को सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित राज्यों में शामिल हैं।

‘नक्सलवाद’ की समस्या के लिए ‘समाधान’

नक्सली हिंसा की घटनाओं और मरने वाले लोगों की संख्या में कमी आने की एक बड़ी वजह नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास की रफ्तार को तेज करना रहा है। साथ ही बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती ने भी नक्सलियों की साख को कमजोर किया है। इसके अलावा राज्य सरकारों की तरफ से चलाए गए आत्मसमर्पण नीतियों और उसके तहत नक्सलियों के पुनर्वास की योजनाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ‘नक्सलवाद’ (Naxalism) को खत्म करने के लिए सरकार ने ‘समाधान’ नाम के एक 8 सूत्री पहल की घोषणा की है। इसके तहत नक्सलियों से लड़ने के लिए रणनीतियों और कार्ययोजनाओं पर जोर दिया गया है।

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