जिस स्कूल में नक्सली लगाते थे पंचायत, अब बच्चे पाठशाला में हासिल करते हैं शिक्षा

यहां नक्सली किस कदर बेलगाम थे इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि यहां कभी नक्सली हथियारों की मंडी सजाते थे। बीच सड़क पर चादर या कोई अन्य सामान बिछा कर नक्सली अपने हथियार यहां खुलेआम सजा कर रखते थे।

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1954 में सरयू मीडिल स्कूल की स्थापना हुई थी। सांकेतिक तस्वीर।

कहा जाता है कि यहां कभी नक्सलियों की तूती बोलती थी और वो जब चाहे जैसे चाहे इस जगह पर अपनी हुकूमत चलाते थे। लेकिन अब सूरत-ए-हाल कुछ और हैं। हालात बिल्कुल बदली हुई कहानी बयां करते हैं।

हम बात कर रहे हैं झारखंड के लातेहार जिले चोरहा पंचायत की। वर्ष 1954 में यहां सरयू मीडिल स्कूल की स्थापना हुई थी। उस वक्त इलाके में स्कूल तो था लेकिन कुछ ही बरसों बाद इन जगहों पर नक्सलियों का खौफ भी काफी बढ़ गया।

यहां नक्सली किस कदर बेलगाम थे इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि यहां कभी नक्सली हथियारों की मंडी सजाते थे। जी हां, बीच सड़क पर चादर या कोई अन्य सामान बिछा कर नक्सली अपने हथियार यहां खुलेआम सजा कर रखते थे। लाल आतंक के खौफ का आलम यह था कि लोग अपने घरों से निकलना तो दूर घर की खिड़कियों से बाहर झांकने में भी कतराते थे।

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नक्सलियों के लिए लहू बहाना यहां इसलिए आसान था क्योंकि बरसों पहले पुलिस इन इलाकों तक आसानी से नहीं पहुंच पाती थी। लेकिन नक्सली खौफ की यह कहानी अब पुरानी हो चुकी है। सरयू मीडिक स्कूल के बाहर अब पुलिस पिकेट है और यहां पक्की सड़कों का जाल बिछ चुका है।

पहले यह स्कूल इसलिए चर्चा में रहता था क्योंकि स्कूल के अंदर नक्सली अपनी पंचायत लगाते थे लेकिन अब यहां बच्चे पाठशाला में शिक्षा हासिल करने आते हैं। इस स्कूल से इलाके के लोगों का हौसला बढ़ा है और सरकार तथा प्रशासन के प्रयास से यहां विकास की बयार भी काफी बही है। हालांकि झारखंड का यह जिला अभी भी नक्सल प्रभावित जिलों में से एक माना जाता है लेकिन इस पंचायत के लोगों ने बंदकू को जवाब अपनी कलम से देकर बड़ी मिसाल भी पेश की है।

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