नक्सल प्रभावित सुकमा की इस बेटी की सफलता को सलाम

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रानी राय ने बनाई अलग पहचान।

SUKMA GIRL RANI RAI : जहां चाह है वहां राह है- इस कहावत को चरितार्थ किया है रानी राय ने। गोली-बारूद और हिंसा भरे माहौल से दक्षिण-अफ्रीका तक का सफर तय करने वाली रानी राय की कहानी उन हजारों-लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो मुश्किलों के आगे या तो घुटने टेक देते हैं या गलत राह अख्तियार कर लेते हैं। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले के एक छोटे से गांव दोरनापाल की रानी ने एक मिसाल कायम किया है। रानी के पिता ठाकुर दास राय गांव के पास के छोटे से बाजार में पुराने कपड़े बेचकर बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर पाते थे। लेकिन पिता का सपना था कि किसी भी तरह बच्चों को अच्छी शिक्षा दें। गरीबी के कारण ठाकुर दास राय शिक्षा से वंचित रहे। खुद नहीं पढ़ पाए लेकिन शिक्षा की अहमियत अच्छी तरह समझते थे।

यही कारण था कि माली हालत ठीक नहीं होने के बावजूद बच्चों की शिक्षा में कभी कमी नहीं आने दी। नतीजा, आज उनकी बड़ी बेटी रानी राय ने सिर्फ पिता के सपनों को ही पूरा नहीं किया बल्कि पूरे परिवार के लिए सहारा भी बन गई है। अपनी स्थिति और बेटी के सफर के बारे में बताते-बताते वे रो पड़ते हैं और कहते हैं- कौन कहता है बेटियां पराई होती हैं।

रानी का बचपन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। चार भाई बहनों में रानी उनमें सबसे बड़ी हैं। वह बचपन से ही होनहार थीं। बेटी की शिक्षा के प्रति रूचि देखकर पिता ने उसे उच्च-शिक्षा दिलाने की ठान ली। रानी की प्राथमिक शिक्षा दोरनापाल में पूरी होने के बाद उसे दंतेवाड़ा भेज दिया। एक साल की पढ़ाई पूरी करने के बाद घर की तंगी ने रानी को वापस सुकमा वापस आने पर मजबूर कर दिया। रानी ने सुकमा में ही किसी तरह हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद हायर-सेकेंड्री के लिए ठाकुर दास ने उसे रायपुर भेज दिया। बेटी का अच्छे नंबरों से लगातार उत्तीर्ण होना पिता का हौसला बढ़ाता तो पिता का संघर्ष बेटी को प्रेरणा देता।

लाख कठिनाइयों के बावजूद पिता ने हार नहीं मानी। बेटी के इंजीनियर बनने के सपने को पूरा करने के लिए ठाकुर दास राय ने अपनी पुस्तैनी जमीन तक बेच दी। हायर-सेकेंड्री के बाद रानी ने भिलाई के शंकराचार्य कॉलेज से 2014 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर में ही देश की एक बड़ी कंपनी में उनका कैंपस सलेक्शन हो गया। वर्तमान में रानी मुंबई की एक कंपनी में लाखों रुपए के मोटे पैकेज पर पोस्टेड हैं। वह फिलहाल साउथ अफ्रीका में उसी कंपनी के एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं।

रानी बताती हैं, उनके पिता जिले के ग्रामीण इलाकों में लगने वाले हाट में पुराने कपड़े बेचते हैं। विरासत में मिले इस व्यवसाय के अलावा उनके पास और कोई रास्ता नहीं था। हालात ऐसे थे कि जिस दिन हाट नहीं जा पाए उस रोज परिवार को फाके पर गुजारा करना पड़ता था । थोड़े अधिक पैसे मिल जाएं, इसके लिए ठाकुर दास औरों से ज्यादा देर तक काम करते थे। रानी बताती हैं कि जब वो अपने दोस्तों से बतातीं कि वे नक्सल प्रभावित क्षेत्र से आई हैं, तो उनके दोस्त ये सुनकर काफी खुश होते और हमेशा उनका हौसला बढ़ाते थे। रानी आज जिस मुकाम पर हैं उसमें उन दोस्तों का भी खासा योगदान है।

अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करने के बाद रानी अपने छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई में मदद कर रही हैं। वह उन्हें अच्छा इंसान बनाना चाहती हैं। रानी के परिवार में दो बहनें दुर्गा राय, निर्मला राय और एक भाई विवेक राय हैं। वह उनकी पढ़ाई का खर्च उठा रही हैं। बहन दुर्गा राय भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है तो निर्मला नर्सिंग की तैयारी कर रही है। भाई अभी 8वीं कक्षा में है। रानी का सपना है कि वो डॉक्टर बने। देश की इस होनहार बेटी को सलाम।

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