इस गांव की महिलाओं पर नहीं चला नक्सलियों का जोर, बना दिया नदी पर पुल

नक्सलियों का नहीं चला इस गांव की महिलाओं पर जोर, संगठित हो आगे बढ़ने का दिखाया जज्बा।
नक्सल प्रभावित इलाके (Naxal Affected Area) में महिलाओं ने दिखाई हिम्मत, अपने दम पर बनाया नदी पर पुल।
नदी जल संग्रह से शुरू किया कृषि कार्य, गांव में आई हरियाली ।
शौचालय निर्माण में भी बढ़ाया अपना हाथ, महिलाओं ने खुद ईंट बनाकर बनाया शौचालय।

Naxal Affected Area
Naxal Affected Area में महिलाओं द्वारा नदी पर बनाया गया पुल

झारखंड का लातेहार जिला, जहां के जंगलों को नामी-गिरामी और इनामी नक्सलियों का पनाह क्षेत्र माना जाता है, इसी जिले के नक्सल प्रभावित (Naxal Affected Area) बरवाडी प्रखंड का आखरी, नवनाग, नवर और नागु गांव की महिलाएं संगठित होकर ऐसे-ऐसे कार्यों को संभव कर दिखाया जो सरकार एवं सरकारी मिशनरियों के लिए आफत जान पड़ती थी। परंतु इन महिलाओं ने अपने हौसले के आगे किसी की नहीं चलने दी। आज इस नक्सल प्रभावित गांव (Naxal Affected Area) में हरियाली छा रही है तथा सभी घरों में शौचालय निर्माण हो जाने के कारण गांव भी स्वच्छ एवं शौच मुक्त हो चुका है। इन महिलाओं के संयुक्त दृढ़ इच्छा के आगे नक्सलियों का भय भी छोटा पड़ गया।

नक्सलियों के कारण इस गांव के साथ-साथ इसके पड़ोसी गांव में भी विकास की रोशनी नहीं फैली थी। लेकिन अपनी गरीबी का दंश झेल रही महिलाों ने आगे आना शुरू किया। इन्होंने इस गांव में पड़ने वाली एक छोटी सी नदी को बोरे में बालू भरकर बांध बनाया और नदी के जल का संग्रह किया। इस संग्रहित पानी से कृषि कार्य शुरू किया गया जिसने इस गांव की दिशा और दशा दोनों को बदल दिया। इन सभी के पीछे-पीछे सखी मंडल की महिला मित्र रीता देवी एवं संजू देवी की अहम भूमिका है। लोग संजू को बहुत प्यार करते हैं क्योंकि ग्रामीणों को वे हमेशा आगे बढ़ने और उन्नति के रास्ते पर जाने के लिए प्रेरणा देती रहती हैं। लोग इनकी बात का बहुत सम्मान करते हैं।

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जिसका परिणाम है कि यहां की महिलाओं ने मीना और संजू देवी की बात मानते हुए नदी को बांध दिया। खेतों में पानी पहुंचाने के लिए मीना और संजू देवी ने सखी मंडल से लोन दिला कर मशीन खरीदवाया। परिणाम स्वरूप इस संग्रहित पानी से मशीन के द्वारा खेतों में लगाए गए फसल में पटवन आसानी से किया जाने लगा। आज हर मौसम में मौसमी फसल उपजा कर यहां के किसान 1 लाख से 2 लाख तक की कमाई कर लेते हैं। वहीं सखी मंडल द्वारा शौचालय निर्माण का कार्य भी खुद करवाया गया। मीना कहती हैं कि गांव में ईंट उपलब्ध नहीं था और लोग हमारे गांव नहीं आना चाहते थे। क्योंकि हमारे गांव में रास्ता ही नहीं था। इसलिए सबसे पहले संगठित होकर रास्ता बनवाया, नदी पर पुल बनवाया। फिर सभी ने मिलकर अपने ही गांव में ईट भट्ठा बनाया।

अपने ही भट्ठे से बने ईंटों से गांव में शौचालयों का निर्माण करवाया गया। वे बताती हैं कि ऐसा करने पर काफी बचत हुआ तथा मुनाफे को सखी मंडल के सदस्य महिलाओं के खाते में डाल दिया गया। जो भी लाभ हुआ हम लोगों ने बराबर बराबर हिस्से में बांट दिया। आज हमारे गांव में कोई भी बाहर शौच करने नहीं जाता। हमारा गांव खुले में शौच मुक्त गांव घोषित हो चुका है। वह आगे बताती हैं कि कभी नक्सलियों के डर से हमारे गांव में कोई नहीं आता था। क्योंकि गांव आने के लिए कोई रास्ता नहीं था। नक्सलियों के भय से कोई भी यहां रास्ता बनाने के लिए सोच नहीं सकता था। परंतु हम महिलाओं ने आगे बढ़कर वह कर दिखाया जो सरकारी मिशनरियों के लिए मुश्किल था। वहीं गांव की संजू कहती हैं, कि हमारे काम को देख कर नक्सली भी हतप्रभ रह गए हैं।

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