सरकार की पहल ने तोड़ी नक्सलवाद की कमर, विकास कार्यों में बढ़ी महिलाओं की भागीदारी

छत्तीसगढ़ राज्य का बस्तर जिला, एक ऐसा क्षेत्र जो दशकों से नक्सलवाद (Naxalism) की समस्या से जूझ रहा है। यहां की आबो-हवा भी नक्सलवाद (Naxalism) से प्रभावित रही है। लेकिन सरकार के अथक प्रयास के बाद अब ये तस्वीर बदलती नजर आ रही है।

Naxalism

बस्तर के दंतेवाड़ा इलाके में आदिवासियों को नक्सलवाद (Naxalism) की समस्या से निकालने के लिए शासन-प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। शायद देर से ही सही अब स्थानीय लोगों को सरकारी प्रयासों का सकारात्मक परिणाम दिख रहा है और इसी का असर है कि यहां की महिलाएं अब जागरूक हो गई हैं। दंतेवाड़ा की महिलाएं अब  नक्सलवाद (Naxalism) की दलदल से निकलकर आत्मनिर्भर हो रही हैं। आलम ये है कि अब मौजूदा समय में हम इन महिलओं को ई-रिक्शा चलाने से लेकर, वनोपज से हथकरघा उद्योग का सामान तैयार कर अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं। ये महिलाएं अपने स्वास्थ्य के प्रति भी ज्यादा जागरूक हो गईं हैं और दूसरों को भी सचेत और सुरक्षित रहना का संदेश दे रही हैं।

सरकार के प्रयासों का ही असर है कि जिले के सूदूर जंगलों में भी महिलाओं को स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही हैं। इन इलाकों में महिलाओं में स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति जागरूकता लाने के लिए ‘मेहरार चो मान’ यानी ‘महिलाओं का सम्मान’ अभियान के तहत प्रशासन जोर-शोर से अभियान चलाई है।। जिसका उद्देश्य केवल किशोरियों और महिलाओं को सेनेटरी पैड उपलब्ध कराना न होकर उन्हें महावारी के बारे में फैले गलत भ्रांतियों के प्रति जागरूक कर गंभीर बीमारियों से बचाना है।

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सरकार के इस अभियान से जुड़कर समूह की महिलाएं खुद सेनेटरी पैड बनाकर अच्छी कमाई कर रही हैं और अपने परिवार को संभालने की जिम्मेदारी भी निभा रही हैं। साथ ही ये सेनेटरी पैड यहां की किशोरियों और ग्रामीण महिलाओं को मुफ्त में बांटकर उन्हें स्वास्थ्य के प्रति जागरूक भी कर रही हैं।

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प्रशासन ने एनएमडीसी के सहयोग से जिले में 5 केंद्र बनाए हैं जिसमें करीब 45 महिलाएं सेनेटरी पैड बनाने का काम कर रही हैं। इन महिलाओं को इस काम से करीबन 3-4 हजार रुपये महीने की कमाई हो जाती है। इन केंद्रों में बने सेनेटरी पैडों को आस-पास के महिला आश्रम, स्कूलों, छात्रावास की महिलाओं को मुफ्त में बांटा जा रहा है। प्रशासन के इस काम में सहयोग करने के लिए जिले के महिला एवं बाल-विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के साथ स्थानीय एनजीओ की करीब 4 हजार महिलाएं जुड़ कर काम कर रही हैं। जिले के इन 5 केंद्रों पर हर महीने करीब 10-11 हजार सेनेटरी पैड तैयार हो जाता है। ऐसे में इस अभियान की सफलता को देखते हुए शासन-प्रशासन इसका और विस्तार करने जा रही है।

सरकार के इस अभियान से जुड़ी हुई मां दंतेश्वरी नाम के एनजीओ की सदस्य ने कहा कि जिले के ग्राम संगठन के माध्यम से हम सेनेटरी पैड बनाती हैं। करीब 8 समूहों की 10 महिलाएं इस काम को करती हैं और फिर ये ही अपने आस-पास के पंचायतों की महिलाओं को ये बने हुए पैड मुफ्त में बांटने के काम भी करती हैं।

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वहीं नई दिशा नाम की एनजीओ की अध्यक्षा ने बताया कि उनके संगठन में करीब 12 महिलाएं सेनेटरी पैड बनाने की ट्रेनिंग ले चुकी हैं और उनमें से 10 यहीं पर ही पैड बनाने का काम भी करती हैं। अध्यक्षा के अनुसार, ‘गांव की महिलाओं में सेनेटरी पैड के उपयोग को लेकर जागरूकता की कमी थी, इसलिए उन्हें इसके फायदे और नुकसान के बारे में घर-घर जाकर और समूहों की बैठक में जागरूक करना पड़ा। ग्रामीण महिलाओं को जब इसके बारे में पता चला तो उन्होंने माहवारी के समय गंदे कपड़े का इस्तेमाल बंद कर पैड का उपयोग शुरू कर दिया।

दंतेवाड़ा में ही 12वीं में पढ़ने वाली एक छात्रा ने बताया कि वो भी एक समूह के साथ जुड़ी हुई है और जिसमें पहले से ही पढ़ी-लिखी तीन-चार लड़कियां जुड़ी हुई हैं। ये सभी सेनेटरी पैड के रोजगार से बहुत खुश हैं।

ऐसे में दंतेवाड़ा में बह रही विकास की बयार से यहां के आदिवासी लोगों में इस बात की संभावना जगी है कि आने वाले दिनों में ये लोग नक्सलवाद (Naxalism) की समस्या से निकलकर विकास के भागीदार बनेगे।

 

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