हिंसा से इतर भी है बस्तर की पहचान, सात समंदर पार तक फैली इसकी गमक और चमक

छत्तीसगढ़ के बस्तर की हर्बल चाय ने इस वक़्त पूरी दुनिया में धूम मचाया हुआ है।

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छत्तीसगढ़ के बस्तर की हर्बल चाय ने इस वक़्त पूरी दुनिया में धूम मचाया हुआ है।

वैसे तो जब भी चाय का नाम ज़ुबान पर आता है तो सबसे पहले असम याद आ जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि छत्तीसगढ़ के बस्तर की हर्बल चाय ने इस वक़्त पूरी दुनिया में धूम मचाया हुआ है। जिसकी धूम अपने देश के साथ-साथ सात समुंदर पार भी पहुंच चुकी है। बस्तर जिसका नाम हमेशा हिंसाग्रस्त क्षेत्र से जोड़ा जाता था। दुनिया आज चाय की चुस्की के साथ उसका नाम बड़े फख्र से लेती है। इस बदलाव का श्रेय जाता है मां दंतेश्वरी हर्बल प्रोडक्ट महिला समूह की आदिवासी महिलाओं को।

हर्बल चाय का उत्पादन बस्तर की आदिवासी महिलाओं (Tribal Women) के समूह “मां दंतेश्वरी हर्बल प्रोडक्ट महिला समूह” द्वारा किया जा रहा है। इस चाय की खेती ने सैकड़ों आदिवासी महिलाओं की जिंदगी बदल दी है। जो महिलाएं कभी आर्थिक समस्याओं से जूझ रही थीं, उनकी ज़िंदगी में क्रांतिकारी बदलाव आया है। जो महिलाएं कभी पाई-पाई की मोहताज थीं, वो आज अपने दम पर पूरे परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं। महिला सशक्तिकरण की इससे बेहतरीन मिशाल और क्या होगी।

इस समूह में तकरीबन क़रीब चार सौ आदिवासी महिलाएं (Tribal Women) जुड़ी हुई हैं। जिनमें से सभी महिलाएं कोंडागांव जिले के ग्राम चिखलकुटी और आसपास के गांवों की हैं। ये महिलाएं मिलकर काम करती हैं। इनकी मेहनत और लगन की वजह से आज इस समूह द्वारा बनाए जा रहे प्रोडक्ट की पूरी दुनिया में अलग पहचान बन गई है।

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम एक बार बस्तर आए थे। समूह की महिलाएं कलाम साहब से मिली थीं। डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम साहब ने इस समूह के महिलाओं की प्रशंसा की और सुझाव दिया था कि पहले इस हर्बल चाय को पेटेंट कराएं फिर उसकी पैकेजिंग करें। जिसके बाद समूह ने इस चाय को पेटेंट कराया।

वैसे तो करीब 16 साल पहले इस समूह की शुरुआत हुई थी। समूह के ज़रिए बहुत से उत्पादों को लेकर काम किया गया। शुरुआत में दालचीनी, काली मिर्च की खेती होती थी। पर जहां समूह में महिलाओं की संख्या वक्त के साथ बढ़ती गई तो इसके साथ-साथ कई तरह के उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी हुई। इसके बाद हर्बल चाय की शुरुआत हुई।

समूह द्वारा विकोंरोजिया की जड़ें, स्टीविया, लेमन ग्रास और काली मिर्च चारों को सही अनुपात में मिलाकर हर्बल चाय तैयार किया जाने लगा। समूह ने डॉक्टरों से लेकर रीसर्च लैब तक से मदद लिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस हर्बल चाय को प्रमाणित कर चुका है। यह कई तरह की बीमारियों में भी औषधि का काम करता है जैसे सर्दी, खांसी, बुखार, मधुमेह, सिरदर्द जैसी बीमारियां।

खास बात ये है कि समूह द्वारा तैयार हुए इस हर्बल चाय को बनाते समय दूध और शक्कर की जरूरत नहीं पड़ती, जबकि इस चाय में भरपूर मिठास रहती है। इस हर्बल चाय में मौजूद स्टीविया की वजह से मिठास आ जाती है और लेमन ग्रास से खुशबू। इसको बनाने के लिए गर्म पानी में मात्र एक पैकेट हर्बल चाय डालते हैं जिससे चाय तैयार हो जाती है। ये बेहद सस्ती और सेहतमंद चाय है।

आज इस हर्बल चाय अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल चुकी है। जर्मनी समेत यूरोप के कई देशों में ये चाय खासी प्रसिद्धि हासिल कर रही है। अपने देश में आज इसके पीने वालों की संख्या में दिन-प्रतिदिन बढ़ोत्तरी हो रही है।

यह सब कुछ हासिल किया है बस्तर की इन आदिवासी महिलाओं (Tribal Women) ने। इन महिलाओं ने ना सिर्फ़ बस्तर की फिज़ा बदली बल्कि इसके साथ अपने देश का नाम भी रोशन किया। ये महिलाएं महिला सशक्तिकरण की एक बेहतरीन उदाहरण हैं। जिन्होंने आत्मनिर्भर होने का मतलब सिखाया और दुनिया में अपनी काबिलियत का झंडा गाड़ कर दिखाया। इन्होंने बता दिया कि आदिवासी महिलाएं भी किसी से कम नहीं हैं। हिंसाग्रस्त एवं अति पिछड़े क्षेत्र से होने के बावजूद ये न सिर्फ़ राष्ट्रनिर्माण में कंधे से कंधा मिलाकर आगे ही नहीं बढ़ीं बल्कि सुदूर भारत में रहने वाली महिलाओं के लिए एक उम्मीद भी जगाई।

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