कर्नल सुशील तंवर की कहानी ‘मुजाहिद’

वो अक्सर इम्तियाज़ को दिया हुआ ईमेल चेक करता है। उसे पता है कि इम्तियाज़ शहीद हो चुका है, पर फिर भी उसके दिल में कहीं एक छोटी सी उम्मीद है और उस छोटी सी उम्मीद के साथ-साथ एक बहुत बड़ा बोझ भी।

Mujahid, Jammu Kashmir

कर्नल सुशील तंवर की कहानी 'मुजाहिद'। सांकेतिक तस्वीर।

कर्नल सुशील तंवर की कहानी ‘मुजाहिद’। कहानी कश्मीर के एक 19 साल के लड़के की है, जो एक कैप्टन रैंक के अधिकारी समर के कहने पर कोवर्ट मिशन के तहत आतंकी संगठन लश्कर ए तैय्यबा में शामिल हो जाता है। पर, क्या उनका मकसद पूरा हो पाता है? क्या वो मुजाहिद वापस अपने घर लौट पाता है? वो कौन सी टीस है जो कैप्टन समर को परेशान करती रहती है?

 “चलो सर जम्मू स्टेशन आ गया।” ट्रेन के कोच अटेंडेंट की बेरुखी सी आवाज़ अभी दो-तीन बर्थ दूर थी कि समर जल्दी से उठ कर अपना सामान समेटने लगा था। कैप्टन समर चौहान पुणे में तीन महीने का ट्रेनिंग कोर्स करके वापस आ रहा था अपनी कर्मभूमि में।

ये वर्ष 2001 की बात है। समर डेढ़ साल पहले ही यूनिट में आया था। आते ही CO ने उसको बुलाकर अपना फरमान ज़ारी कर दिया था, “I am sending you to surankot it is a very tough area. तुम्हारी पहली पोस्टिंग है यहां। संभल कर काम करना। पहले ज़्यादा से ज़्यादा सीखने की कोशिश करो। याद रखना कि जोश के साथ-साथ होश भी ज़रूरी होता है। I am sure you will do well. good luck!”

समर जवाब में सिर्फ “थैंक यू सर” ही बोल पाया था।

सूरनकोट। पुंछ से तकरीबन 27 कि.मी. दूर सूरन नदी के किनारे बसा हुआ एक छोटा सा शहर। अगर भारत के किसी और राज्य में स्थित होता तो उसके इर्द-गिर्द के ऊंचे पहाड़ और घने जंगल सैलानियों की भीड़ का खूब नज़ारा देखते। लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच की लाइन ऑफ़ कंट्रोल से थोड़ी ही दूर बसा यह शहर उन दिनों आतंकवादियों का गढ़ बना हुआ था। पाकिस्तान से घुसपैठ करने के बाद कश्मीर घाटी में जाने वाले आतंकवादी अक्सर यहीं से गुज़रते थे। रोज़ कोई ना कोई हादसा या एनकाउंटर होता था।

Mujahid, Lashkar E Taiyaba
कर्नल सुशील तंवर

ऐसे मुश्किल हालात में वहां पहुंचा, कैप्टन समर अपने CO की उम्मीदों से कई गुणा बेहतरीन साबित हुआ था। बहुत सारे उत्कृष्ट एंटी-मिलिटेंसी ऑपरेशन्स करने के बाद भी वह कुछ नया करने को हमेशा तैयार रहता। तमाम शहर से वाकफियत हो गयी थी उसकी। अपने साथियों के समझाने के बावजूद अक्सर निकल पड़ता था लोगों से मिलने। कभी बाज़ार में और कभी दूर-दराज़ के गांव में। He was always on the move.

और आज ट्रेन से उतर कर जम्मू रेलवे स्टेशन की भीड़ में खोया समर जल्दी से जल्दी सूरनकोट पहुंचना चाहता था। स्टेशन की पार्किंग में खड़ी सफेद जिप्सी को दूर से ही पहचान कर उसकी तरफ बढ़ ही रहा था कि “ज़य हिंद साहिब” चिल्लाते हुए सिपाही लखविंदर सिंह ने इतनी गरम जोशी से उसका स्वागत किया कि आस-पास वाले लोग मुड़ कर उसी को देखने लग गये थे। “कैसे हो लक्खी”, कहते हुए गाड़ी में बैठा समर अभी कुछ और बोलता कि उस से पहले ही लक्खी ने अपनी दास्तान शुरू कर दी थी, “साहिब, पूरी टीम आपका ही इंतजार कर रही है। सब ठीक है। हालात तो ज़्यादा खराब हो गये… वग़ैरह वग़ैरह”।
समर लक्खी को सुन तो रहा था लेकिन उसके दिमाग़ में एक ही नाम चल रहा था। “इम्तियाज़”।

समर अक्सर शाम को शहर के नौजवानों के साथ वॉलीबॉल खेलता था। उसे लगता था कि लोगों से जुड़ने का यह एक कारगर तरीक़ा है। वहीं उसकी मुलाक़ात इम्तियाज़ से हुई थी। तकरीबन 19 साल का इम्तियाज़ सूरनकोट से कुछ दूर मरहौट गांव का रहने वाला था। दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी उसने ताकि अपने ग़रीब परिवार की मदद कर सके। उसने थाने के पीछे वाले बाज़ार में कबाब और तुज्जी बनाने का रेड़ा लगा लिया था। वक़्त निकाल कर शाम को वो खेलने भी आता था। कभी खेलता और कभी बाहर बैठ कर चुपचाप देखता। समर वहीं उस से मिलता। परिवार का हाल चाल भी पूछता। इस से ज़्यादा कुछ ख़ास बातचीत नहीं हुई थी उनकी।

और फिर एक दिन अचानक इम्तियाज़ समर के ऑफिस में पहुच गया था। उसके गांव में कुछ लोग नौजवान लड़कों को अपनी आतंकवादी तनज़ीम में शामिल होने के लिए बोल रहे थे। “मैंने सुना तो सीधा आपके पास आ गया साहिब, हमारे गांव में तो हालात आपको पता ही है। अगर मेरे लायक कोई काम हो तो बोलो साहिब पक्का करूंगा। अब ये ग़रीबी सहन नहीं होती साहिब।”

“इम्तियाज़ सुनो, ये आतंकवादियों के लफड़े से दूर रहो? घर वालों का ख्याल करो। अभी तो ज़िंदगी शुरू हुई है तुम्हारी। मुझे कुछ काम होगा तो बताऊंगा। और इधर ऑफिस में मत आना। लोग ख़्वामख़्वाह ही तुम पर मुखबिरी का शक़ करेंगे।”

इम्तियाज़ तो चुपचाप चला गया था पर समर के दिमाग़ में हज़ारों सवाल भी छोड़ गया था। एक तरफ तो समर के जासूसी दिमाग़ को लगा कि एक अच्छा मौका है किसी टेररिस्ट तनज़ीम में अपने ही बंदे को शामिल करने का, लेकिन दूसरी तरफ इम्तियाज़ की कम उम्र और घर की हालत का भी ख्याल आता। उसे ये भी लग रहा था कि इम्तियाज़ अगर तनज़ीम में चला भी गया तो क्या कर पाएगा हमारे लिए? और इतना मुश्किल काम कैसे करेगा? फिर क्या पता कि ये असल में ही आतंकवादी बनना चाहता हो और सिर्फ़ हमारा सहारा ले रहा हो? समर के अगले कुछ दिन इसी कशमकश मे बीत गये।

इम्तियाज़ अक्सर वॉलीबॉल खेलने आता और समर के जवाब का इंतज़ार करता। पहले सुस्त सा दिखने वाला इम्तियाज़ उन दिनों ग्राउंड में कुछ ज़्यादा ही जोश से खेलने लगा था। शायद खुद को साबित करने की कोशिश कर रहा था।

लेकिन समर को कोई जल्दी नहीं थी। वो यह यकीन करना चाहता था कि इम्तियाज़ ने आतंकवादी वाली बात किसी जज़्बे या तैश में तो नहीं कही थी। इन इलाकों में लोग अक्सर ऐसी बातें करने के बाद मुकर जाते थे। समर जल्दबाज़ी में कोई फ़ैसला नहीं लेना चाहता था क्योंकि उसके जहन में जो तरकीब पनप रही थी उस से इम्तियाज़ की जान भी जा सकती थी।

और फिर एक दिन वो यूं ही पहुंच गया था इम्तियाज़ की रेहड़ी के पास। शाम के तकरीबन चार बजे। समर को पता था कि उस वक़्त बाज़ार में बहुत कम लोग होते हैं। समर ऐसी छोटी-छोटी बातों का हमेशा ध्यान रखता था और शायद ये ही उसकी कामयाबी का एक कारण था।

“शाम को घर जाते वक़्त नर्सरी के बाईं तरफ वाली चक्की के पास इंतज़ार करना”, कबाब लेते वक़्त इम्तियाज़ को मिलने की जगह और वक़्त समझा दिया था उसने। ये सब सुनते ही इम्तियाज़ के मासूम चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान छा गयी थी। मानो कुछ करने की जल्दी थी उसको।

इम्तियाज़ से उस मुलाक़ात का एक-एक पल आज भी समर को याद है जैसे मानो कल की ही बात हो। “इम्तियाज़, क्यों फालतू में ख़तरा मोल लेना चाहते हो? ना यहां के रहोगे ना वहां के।” समर इम्तियाज़ के इरादों को अपने तरीक़े से टटोल रहा था।

“साहिब, ग़रीब की भी कोई ज़िंदगी होती है और इसमें ख़तरा कैसा। रोज़ तो गांव में मुजाहिद घूमते हैं। सॉरी साहिब, मुजाहिद नहीं आतंकवादी, वो गांव में उनको सब मुजाहिद ही बोलते हैं ना, इसलिए मुंह से यही निकल गया।”

“हां हां, ठीक है। तुम उनको मुजाहिद ही बोलो। तुम अब खुद मुजाहिद ही तो बनने जा रहे हो।” वैसे जितनी आसानी से समर ने ये कह दिया, उस से कहीं ज़्यादा मुश्किल था एक मुजाहिद बनना और वैसी ज़िंदगी बसर करना।

समर को यह तो यकीन हो गया था कि इम्तियाज़ अपनी ग़रीबी और रोज़मर्रा की मायूस ज़िंदगी से बचने के लिए ये सब करने को तैयार हुआ है। उसकी बातों में देशभक्ति, अमन, दीन वग़ैरह जैसे सैद्धांतिक पहलुओं का कोई असर नही था।

“ध्यान से सुनो इम्तियाज़। इसमें ख़तरा तो है लेकिन मेरे बताए तरीक़े से चलोगे तो सब ठीक होगा। अगली बार जब LeT (लश्कर ए तैयबा) वाले कोई आतंकवादी आयें तो उनकी खूब खातिरदारी करना। तुम्हें लश्कर में ही शामिल होना है। उसमें ज़्यादातर पाकिस्तानी हैं, उन्हें लोकल लड़कों की ज़्यादा ज़रूरत है। लेकिन हिज़्ब (हिज़्बुल मुजाहिदीन) वालों से राबता मत रखना, वो सब लोकल हैं। ख़ासकर कश्मीरी। ज़्यादा एहतियात बरतते हैं किसी नये बंदे को साथ लेने से पहले…”

“और हां, वो नूर ख़ान, जो स्कूल में मास्टर है, बिल्लौरी आंखों वाला अगर वो किसी तनज़ीम में जाने या मदद को बोले तो बिल्कुल चुप रहना। कुछ नहीं करना। वो दोनों तरफ खेलता है। काम भी करवाएगा और पुलिस को भी बताएगा। हमारा गेम शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाएगा”, हल्की सी हंसी के साथ समर ने समझाया तो इम्तियाज़ भी मुस्कुरा दिया। वो दोनों ज़िंदगी और मौत की बातें इस तरह कर रहे थे मानो ये सच में कोई खेल हो।

“अपना रुटीन ज़्यादा मत बदलो। इंतज़ार करो उनका.. वो तो वैसे आते ही रहते हैं ना गांव में। कोई काम बताए तो ज़्यादा उतावलापन भी मत दिखाना। शक़ हो सकता है। थोड़ा डरने की भी एक्टिंग करना। समझे?”

इम्तियाज़ चुपचाप समर की हिदायतें सुन रहा था। “वो तुमको ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान पक्का ले जाएंगे। बस यही हमारा मक़सद है। आम तौर पर जब 8-10 नये लड़के इकठ्ठे कर लेते हैं तब वो पूरा ग्रुप एक साथ पार भेजते हैं। बस एक बार वहां पहुंच गये तो फिर हमारा असली काम शुरू होगा।”

“वहां ट्रेनिंग बहुत कड़क होती है। रह लोगे ना घर से दूर। दूसरे देश में…??” समर के इस सवाल पर इम्तियाज़ अचानक बोल पड़ा था, “क्यों नहीं साहिब। यहां से तो कई लड़के वहां गये हैं। कुछ ने तो जेहाद से तंग आकर वहां शादी भी कर ली। परेशान हैं लेकिन साहिब वहां। मेरा एक ममेरा भाई भी है वहीं कहीं”

“वेरी गुड। लेकिन वहां जा कर तुम भी शादी-वादी के चक्कर में मत पड़ जाना। तुम्हें ट्रेनिंग करनी है, कैंप में रहना है…अगर अल्लाह ने चाहा तो वो तुम्हें अपने ऑफिस में भी काम करवाएंगे। बस यह सोचो कि तुम असली मुजाहिद हो ना कि हमारे साथ काम करने वाले। दो तीन साल वहां रहो। कोशिश करना वहां इस से भी ज़्यादा टाइम निकालने का। ये भी हो सकता है कि तुम्हें कुछ महीनों बाद ही ग्रुप के साथ इनफिल्ट्रेशन के लिए लॉन्च कर दें। कब कहां और कैसे आ रहे हो मुझे ज़रूर बताना।” ये कहते हुए अपना लैंड लाइन नंबर समर ने उसको दे दिया, “इसको याद कर लो। कहीं लिखना मत।”

“और एक बात। अगले दो-तीन हफ्ते कंप्यूटर सीखो। वो यूनुस के साइबर कैफ़े में। कोई पूछे तो बताना कि चंडीगढ़ में होटल में नौकरी मिलने वाली है। सबसे पहले ईमेल करना सीखो। यह रही ईमेल आईडी। तीन दिन बाद अपनी मेल से मुझे मैसेज करना। उसके बाद सिर्फ़ इसी का इस्तेमाल करना है। पाकिस्तान से भी बस फोन और ईमेल से ही राबता हो पाएगा” इन्हीं हिदायतों के साथ एक नोटों से भरा लिफ़ाफ़ा समर ने इम्तियाज़ के हवाले कर दिया था।

“रख लो, काम आएंगे, एक दम से खर्च मत कर देना। यहां लोगों की नज़रें बहुत तेज़ हैं और अब मुझसे मत मिलना। जिस दिन कोई ज़रूरी बात हो उस दिन मुझे इस नंबर पर तहसील ऑफिस के पास वाली एसटीडी से फोन करना। अपने आप मिलने आ जाऊंगा”, ऐसी कई बातें समझाने के बाद समर ने इम्तियाज़ को घर भेज दिया।

सब कुछ प्लान के मुताबिक़ ही हुआ। तक़रीबन एक महीने बाद इम्तियाज़ ने समर को बताया कि उसका राबता लश्कर के एक ग्रुप के साथ हो गया है। ज़्यादा कुछ नहीं पता था उसको लेकिन ये यकीन था कि वो उसको अपने साथ ले लेंगे। “पता नहीं साहिब, कब ले जाएंगे। कुछ बताते नहीं। खाने-पीने का सामान मंगाते हैं पर जल्दी से भरोसा नहीं करते साहिब।”

“अच्छा है। तुम तैयार रहो। घर की चिंता मत करना। स्टेट बैंक में एक अकाउंट खोल लो। जॉइंट अकाउंट, अपनी अम्मी के साथ। बाद में ज़रूरत पड़ेगी। मुझे अकाउंट नंबर दे देना”

“और नशा वशा मत करना। ये साले सब चरसी होते हैं। शायद मुज़्ज़फ़राबाद के आसपास ही होगा तुम्हारा कैंप और ऑफिस। कोशिश करना जल्दी से जल्दी राबता करने की वहां से। खुदा तुम्हारा ख्याल रखेगा।” सिर्फ़ 28 साल की उमर का कैप्टन समर ऐसे बात कर रहा था मानो अपनी औलाद को तालीम के लिए विदेश भेज रहा हो।

कुछ दिनों बाद ये खबर आई कि पूंछ इलाक़े से 5-6 लड़के लश्कर ए तैयबा में शामिल हो गये हैं और एक्सफिल्ट्रेशन कर के पाकिस्तान ऑक्युपाइड कश्मीर (PoK) में ट्रेनिंग के लिए पहुंच गये हैं। उनमें एक नाम था इम्तियाज़ ख़टाना, निवासी मरहोट, उम्र 19 वर्ष।

“साहिब जी। हम अपनी लोकेशन में आ गये”, लक्खी की आवाज़ समर को इम्तियाज़ की यादों से निकाल कर वर्तमान में ले आई। सूरनकोट पहुंचते ही वो अपने काम में डूब गया था। पिछले तीन महीनों का लेखा-जोखा जो लेना था। कई फाइल्स और रिपोर्ट्स का अंबार लगा हुआ था उसकी टेबल पर।

कुछ दिन बाद मौका मिलते ही समर वापस आ गया था वॉलीबॉल ग्राउंड में। आते ही सब लड़कों ने घेर लिया था उसे।

“बहुत मिस किया आपको sir. आपकी टीम तो रोज़ हारती है। हमें तो लगा आप पोस्टिंग चले गये” वग़ैरह वग़ैरह।

“हां हां ठीक है, अब मैं आ गया हूं। अब तो मेरी टीम और भी बुरे तरीक़े से हारेगी”, कह कर समर हंसने लगा था।

उस दिन गेम कम और बातें ज़्यादा हुई थीं। “अरे सर इरफान की तो नौकरी लग गयी बफलियाज़ वाले स्कूल में। अब ये नालायक बच्चों को क्या पढ़ाएगा। और हमीद ने अपना पासपोर्ट बना लिया साहिब। सऊदी जा कर मज़दूरी करेगा बेवकूफ़। मुश्ताक़ तो अब आता नहीं खेलने, शादी कर ली ना उसने, अब बस बीवी की खातिरदारी करता है। और वो इम्तियाज़ था ना.. रेरी वाला, वो तो मर गया sir”

समर के पांवों तले मानो एकदम से ज़मीन खिसक गयी। खुद को संभालते हुए बस इतना ही कह पाया, “कौन सा इम्तियाज़?””अरे sir, वही मरहोट वाला, सुना है वो पाकिस्तान चला गया था ट्रेनिंग के लिए। और पिछले महीने कूपवाड़ा में एक एनकाउंटर हुआ था बॉर्डर पर। शायद उसी ग्रुप में ही था।”

समर के दिल में हज़ारों जज़्बात तूफान की तरह उमड़ रहे थे लेकिन उसका चेहरा बिल्कुल शांत था। “वो कूपवाड़ा कैसे पहुंच गया? कोई गया क्या वहां से उसको लाने के लिए?”

“पता नहीं सर। उसके घर वालों को कुछ दिन पहले ही पता चला। उन्होंने तो उसकी लाश को भी नहीं देखा। उनका कोई रिश्तेदार है पाकिस्तान में। उसने संदेशा भेजा है”
ये सुन कर समर को थोड़ा चैन आया। उसे लगा इम्तियाज़ पक्का अभी भी पाकिस्तान में है और अपनी मौत की खबर भिजवा दी होगी। लेकिन एक अजीब सी बेचैनी भी थी कि क्या पता इम्तियाज़ सच में ही शहीद हो गया हो।

वापस आते ही उसने मरहोट गांव के नज़दीक वाली यूनिट के सीओ को फोन लगाया था। “जय हिंद सर। समर दिस साइड। कल वो मरहोट गांव में जाना है। एक इन्वेस्टिगेशन करनी है। It seems Imtiaz who had become terrorist has died… just want to go to his home and check out. It won’t take much time.. आप एक प्रोटेक्शन पार्टी भेज देना मेरे साथ प्लीज़।”

“डोंट वरी समर, वैसे तुम क्यों परेशान हो रहे हो। I have confirmed that he is dead. Anyways, if u want to go, I will do the needful… और वापस आने के बाद you will have tea with me. Okay.”

उसके बाद समर ने पिछले तीन महीनों में जितने एनकाउंटर हुए थे, सब की जानकारी निकाली। कूपवाड़ा में सिर्फ़ एक एनकाउंटर हुआ था। मचिल के इलाक़े में। बिल्कुल लाइन ऑफ कंट्रोल पर। 6 आतंकवादियों का एक ग्रुप घुसपैठ की कोशिश करते हुए हुमारे सिपाहियों के एम्बुश का शिकार हो गया था। 4 आतंकवादी मारे गये थे और दो वापस भाग गये थे। शिनाख्त ना होने पर वहीं दफ़ना दिया गया था उनको।

पूरी रात सो नहीं पाया था समर और सुबह उठते ही मरहोत गांव पहुंच गया था। फौज को देख कर गांव में कुछ हड़कंप सी मच गयी थी लेकिन ज़्यादा देर नहीं लगी थी उन्हें इम्तियाज़ का घर ढूंढने में। घर क्या एक टूटा सा मकान था। बाकी सिपाहियों को घर के बाहर ही इंतज़ार करने का हुक्म देकर समर सहमे हुए कदमों से अंदर घुसा। उसे अंदर आता देख कर घर के सब लोग कमरों के अंदर चले गये थे और बाहर रह गयी थी एक 40-45 बरस की औरत “जी सर, सलाम वालेकुम। वो घर में अभी कोई मर्द नहीं है। आपको तलाशी लेनी है, तो सब बच्चों को बाहर बुला लेती हूं साहिब।”

“नहीं नहीं, कोई तलाशी नहीं लेनी”, समर को समझ नहीं आ रहा था कि बात कहाँ से शुरू करे, “दरसअल, वो इम्तियाज़ के बारे में…”

इम्तियाज़ का नाम सुनते ही उस औरत की आंखों में आंसू आ गये। “मां हूं उसकी साब। जन्नत चला गया मेरा इम्तियाज़। अभी तो उमर ही नहीं थी उसकी। हमें तो उसकी लाश भी नसीब नहीं हुई। मैंने बहुत मना किया था घर से बाहर जाने को। पता नहीं किसके बहकावे में आ गया” और फिर वो सुबक-सुबक कर रोने लगी। तभी कमरे से एक जवान बच्ची जो शायद इम्तियाज़ की बहन थी आकर उसको चुप कराने की कोशिश करने लगी थी और फिर खुद भी अपनी मां के साथ रोने लगी।”

समर तो जैसे बिल्कुल टूट गया। थोड़ी सी हिम्मत जुटा कर उसने फिर कोशिश की “अम्मा, आपको यकीन है? क्या पता इम्तियाज़ ज़िंदा हो?”

थोड़ी देर तक तो समर उसकी मां के जवाब का इंतज़ार करता रहा। उनकी खामोशी और आंसू समर की सहनशक्ति का पूरा इम्तिहान ले रहे थे। “वो इम्तियाज़ के अब्बा कहां हैं?” समर ने फिर एक बार कोशिश की।

“पूंछ शहर गये हैं अब्बा। वहीं मज़दूरी करते हैं। जुम्मे को आएंगे”, उस बच्ची ने हिचकते हुए जवाब दिया।

“ठीक है”, कह कर समर वापस जाने ही लगा था कि उसकी मां धीरे से बोली, “यकीन करो साब। शहीद हो गया है। मेरे रिश्तेदार ने संदेशा भेजा है मुज़्ज़फ़राबाद से और वो… वो उसके साथी मुजाहिद भी आए थे कुछ दिन पहले यही बताने के लिए।”

समर चुपचाप वापस आ गया था अपने ऑफिस। दिल में एक भारी बोझ लिए। बस यही सोच रहा था कि शायद इम्तियाज़ ने उस से राबता करने की कोशिश की हो। उसकी मौत के लिए अपने को ज़िम्मेदार मान रहा था।

छोटी छोटी बातों का एहतियात रखने वाले समर को विश्वास नहीं हो रहा था कि इतनी बड़ी चूक कहां हो गयी। सब कुछ तो समझाया था उसको, फिर कहां कमी रह गयी।
“क्या पता वहां से फोन मिलना मुश्किल हो। और क्या पता उसने फोन किया हो और यहां पर किसी ने नहीं उठाया हो और या फिर किसी और ही ने उठाया हो। ये भी तो हो सकता है कि वहां इंटरनेट की सहूलियत ही ना हो। तब क्या करना है यह तो नहीं बताया था। लेकिन वहीं रहने को तो कहा था उसको। ज़्यादा होशियारी तो नहीं दिखा रहा? क्या पता वहीं हो अब भी?”

इसी तरह के ख्यालों से परेशान समर अक्सर वो ईमेल एड्रेस चेक करता था। बस यही एक उम्मीद लगाए हुए कि शायद एक दिन इम्तियाज़ का मैसेज आएगा। उसके बैंक अकाउंट में कुछ पैसे भी अक्सर डाल देता था ताकि उसके परिवार की कुछ मदद हो जाए।

समर ने कई बार सोचा था कि वो इम्तियाज़ की मां से मिलने जाएगा लेकिन वो कभी भी हिम्मत ही नहीं जुटा पाया। इस दौरान, इम्तियाज़ का ना कोई फोन आया और ना ही कोई ईमेल। और करीब एक साल के बाद कैप्टन समर की पोस्टिंग हो गयी सूरनकोट से बहुत दूर बंगलूरू में।

इस वाकये को 19 साल बीत चुके हैं। कैप्टन समर अब कर्नल समर हो गया है। आज भी वो अपने फर्ज और देश की खातिर कुछ भी करने को तैयार रहता है।

और वो अक्सर इम्तियाज़ को दिया हुआ ईमेल चेक करता है। वैसे उसे पता है कि इम्तियाज़ शहीद हो चुका है, पर फिर भी उसके दिल में कहीं एक छोटी सी उम्मीद है और उस छोटी सी उम्मीद के साथ-साथ एक बहुत बड़ा बोझ भी।

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