ख़ूब लड़ी मर्दानी वो तो…

दिन भर शाज़िया सिर्फ़ हूजेफ़ा को ख़त्म करवाने का प्लान बनाती। अविनाश नहीं चाहता था कि शाज़िया के घर में एनकाउंटर हो लेकिन शाजिया को तो जैसे कोई भी डर नहीं था। बस एक जुनून था उसके सिर पर।

Indian Army, Jammu Kashmir

सांकेतिक तस्वीर

“जय हिंद साहिब, कोई मिलने आया है आपसे। Lady है साहिब और उसने बुर्क़ा डाला हुआ है।

सुबह-सुबह सिपाही सूरज सिंह की आवाज़ ने मेजर अविनाश को असमंजस में डाल दिया। इस तरह से किसी महिला का आर्मी पोस्ट पर आना थोड़ा अजीब सा था। अविनाश के मन में कई सवाल अचानक़ उमड़ उठे थे। पोस्ट पर आने वाले सब लोगों की तलाशी लेना भी ज़रूरी था, लेकिन उनके पास कोई महिला सैनिक भी तो नहीं थी।

लेकिन कुछ भी हो, पर फौज तो कश्मीर में अवाम के लिए तैनात है और किसी ज़रूरत मंद को वापस भेजना भारतीय सेना के आदर्शों के ख़िलाफ़ होता। यही सोच कर फ़ौरन उस महिला को सादर पूर्वक अपने दफ़्तर में लाने की हिदायत दे दी थी मेजर अविनाश ने।

“सलाम वालेकुम जनाब, मैं शाज़िया… शाज़िया लोन बटपोरा, सोपोर।”

हल्की सी आवाज़ में उसने अपना तआरुफ़ देना शुरू किया। कोई 35-40 साल की होगी वो। काले बुर्क़े के भीतर सिर्फ़ उसकी आंखें नज़र आ रही थीं। बेहद ख़ूबसूरत, लेकिन बहुत उदास।

“SP बारामुला के दफ़्तर में मिली थी साहिब। दो हफ़्ते पहले। याद है आपको?”
अविनाश को थोड़ा वक़्त तो लगा लेकिन फिर उसे सब कुछ याद आ गया। SP ताहिर जावेद खान उसका अच्छा दोस्त था। अक्सर आना-जाना था उसके पास। उस दिन ताहिर के ऑफिस में ही तो मिला था वो उसको। बस ऐसे ही चाय पीने गया था वो वहां।

“ये देखो sir, she is a hardcore OGW (Over Ground Worker), पति आतंकवादी था। LeT में कमांडर था। पिछले साल एनकाउंटर में मारा गया। लेकिन ये अभी भी उन आतंकवादियों की मदद कर रही है।

ज़मीन पर सिर झुकाये शाज़िया किसी बुत की तरह बैठी थी।
“आप 5 मिनट wait करो sir, अभी आता हूं”, कह कर ताहिर अपने ऑफ़िस से निकल गया था।

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कर्नल सुशील तंवर

किसी गांव के 10-12 लोग बाहर खड़े थे। शायद पिछली रात को पुलिस ने किसी युवक को गिरफ़्तार किया था। वो लोग उसी की पैरवी करने आए थे और हमेशा की तरह पुलिस के लिए सच और झूठ का पता लगाना बेहद मुश्किल था।

उन्हीं चंद मिनटो में अविनाश ने शाज़िया से थोड़ी बात की थी। वही रोज़मर्रा की बातें जो वो अक्सर हर इंसान से करता था। परिवार में कौन-कौन है। कोई परेशानी तो नहीं है। घर का गुज़ारा कैसे होता है। किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं है। वग़ैरह वग़ैरह…

“साहिब चाय”, सिपाही सूरज की आवाज़ अविनाश को वर्तमान में खींच लायी थी।

“जी अब याद आया। उस दिन आपने बुर्क़ा नहीं पहना था ना”, कहते हुए उसने शाज़िया को चाय का प्याला थमा दिया था।
“शायद फ़ौजी चाय आपको पसंद न आए। आपकी नून चाय या कहवा जितनी लज़ीज़ नहीं है ये।”

“साहिब, आपने कुर्सी पर बैठाया। चाय पिलाई और इतनी इज़्ज़त दी यही बहुत है। उस दिन आपकी बात सुनकर लगा कि शायद आप मेरी मदद करोगे और इसलिए मैं आ गयी आपके पास।”

बस फिर अगले 25-30 मिनट तक अविनाश चुपचाप सुनता रहा और शाज़िया बोलती गयी।

जंगल से सटा हुआ घर था उसका। तीन बच्चों के साथ रहती थी। लश्कर (LeT) के आतंकवादी अक्सर उसके घर आते थे। खाना खाते, आराम करते। कुछ पैसे भी देते। उनके पुराने साथी का घर जो था।

पिछले कुछ हफ़्तों से एक नया ग्रुप सक्रिय हुआ था इलाक़े में। 6-7 आतंकवादी थे जिनका सरगना था अबू हूजेफ़ा। वैसे तो वो कश्मीरी था। असली नाम था शौकत डार। ऐसा लगता था कि लोगों पर ज़ुल्म करने के लिए उसने हथियार उठाए थे।

और अब उसकी नापाक नज़र रिहाना पर थी।

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रिहाना, शाज़िया की बड़ी बेटी, बीए फर्स्ट ईयर, सोपोर डिग्री कॉलेज में पढ़तीं थी।

फिर एक दिन जब हूजेफ़ा ने उससे बदसलूकी करने की कोशिश की थी तो शाज़िया बीच में आ गयी थी। शाज़िया अपना शोषण तो सहन कर सकती थी पर अपने बेटी की अस्मत उसको जान से भी प्यारी थी। लश्कर के कई आतंकियों को जानती थी वो। बहुत संदेशे भेजे थे उसने सबको ताकि वो हूजेफ़ा और उसके साथियों को चेतावनी दे सकें लेकिन फिर भी कोई असर नही पड़ा था उन दरिंदों की नीयत पर।

और इसलिए अब मेजर अविनाश के पास आयी थी शाज़िया। अपनी आपबीती सुनाते-सुनाते वो रोने लगी थी। वो मजबूर थी पर अविनाश के जेहेन में अब भी कई सवाल थे।

कितना सच है उसकी बातों में? कोई साज़िश तो नहीं? वो पुलिस के पास क्यों नही गयी?

काफ़ी सोचने के बाद तीन दिन का वक़्त मांगा था अविनाश ने। तैयारी के लिए। ये कहकर कि उन आतंकियों के साथ शाज़िया के बर्ताव में कोई बदलाव नहीं आना चाहिए। रिहाना को पढ़ाई के बहाने किसी रिश्तेदार के घर भेजने की हिदायत भी दे डाली थी। साथ ही, दिया था उसको एक मोबाइल फ़ोन, “जो भी बात हो, मुझे इस से ही फ़ोन करना। और किसी और को इस नंबर से कॉल मत करना।”

उसकी बात सुनकर थोड़ा मुस्कुराई थी शाज़िया, “मुझे पता है साहिब, कई सालों से इन जिहादियों से ऐसे ही अलग-अलग फ़ोन से बात करती हूं।”

और अविनाश को इत्मिनान हो गया था कि उसे शाज़िया को ज़्यादा कुछ सिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

दिन बीतते गए। आतंकवादियों का उसके घर आना-जाना लगा रहा। वो अविनाश को रोज़ उनकी हरकतों के बारे में बताती। अविनाश नहीं चाहता था कि शाज़िया पर किसी को कोई शक हो, इसलिए आतंकियों को किसी और जगह घेरना ज़रूरी था।

इसके अलावा उनके ग्रुप और LeT की बाक़ी गतिविधियों के बारे में जानकारी हासिल करने में शाज़िया आर्मी की बहुत मदद कर सकती थी। आतंकियों को पूरा भरोसा था शाज़िया पर। वो उनकी बातें ध्यान से सुनती और अविनाश को बता देती थी।

उनके मोबाइल नंबर, मैसेंजर आईडी, कोड वर्ड्स… सब जानती थी वो। उसी की बदौलत आर्मी को धीरे-धीरे उस इलाक़े में Let के पूरे नेटवर्क का पता चल गया था।

अगले कुछ दिनों में आर्मी ने उसके कहे अनुसार कई ऑपरेशन किए। शायद कुछ शक भी हो गया था आतंकियों को जब उन्होंने शाज़िया के हाथ एक घर में कुछ सामान भेजा था और उसी घर में आर्मी ने छापा मार कर के एक आतंकवादी को पकड़ लिया था।

हूजेफ़ा ने बहुत सवाल किए थे शाज़िया से। थोड़ा पीटा भी था लेकिन शाज़िया ने चुपचाप रह कर अपनी बेक़सूरी का यक़ीन दिला दिया था।

दिन भर शाज़िया सिर्फ़ हूजेफ़ा को ख़त्म करवाने का प्लान बनाती। अविनाश नहीं चाहता था कि शाज़िया के घर में एनकाउंटर हो लेकिन शाजिया को तो जैसे कोई भी डर नहीं था। बस एक जुनून था उसके सिर पर।

और एक अहसास कि कई सालों से जिस आतंक की वो मदद कर रही थी, वो कितना ग़लत था।

हूजेफ़ा ख़ूंख़ार तो था ही पर बहुत चालाक भी था। अक्सर बिना किसी को बताए हरकत करता था। पहले इलाक़े की तफ़्तीश करता। और वो हर एहतियात बरतता जिससे कोई ख़तरा ना हो।

मेजर अविनाश को इंतज़ार था उसकी सिर्फ़ एक ग़लती का। हूजेफ़ा के कई साथी तो मारे गए थे, पर वो ज़िंदा था। और साथ ही ज़िंदा था उसका आतंक।

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उधर शाज़िया भी परेशान थी। “साहिब, मैं रिहाना को घर बुला रही हूं”, ये कह कर अविनाश को भी परेशान कर दिया था उसने।

“क्यों खतरे में डाल रही हो उसको?”
“साहिब, अगर रिहाना आएगी तो हूजेफ़ा भी आएगा”, ये दलील देकर चुप करा दिया था उसने अविनाश को।

“बस आप मेरे फ़ोन का इंतज़ार करना और कोई ग़लती मत करना साहिब”, कह कर चली गयी थी शाज़िया।

फिर बातों-बातों में उसने हूजेफ़ा के सामने रिहाना के घर आने का ज़िक्र किया था। हूजेफ़ा ने जवाब में कुछ नहीं कहा था लेकिन शाज़िया सब समझती थी।

एक हफ़्ते के बाद रिहाना घर आ गयी। अविनाश को शाज़िया का फ़ोन भी आया और उसे यक़ीन था की हूजेफ़ा भी आएगा।

जंगल से तीन रास्ते उतरते थे शाज़िया के घर, पूरे दिन आर्मी की टोलियां नीचे गांव में गश्त लगाती रही और अंधेरा होते ही उन रास्तों पर घात लगा कर छोटी-छोटी टुकड़ियों में बैठ गए थे अविनाश और चंद सिपाही।

रातभर कोई हरकत न होने से अविनाश के मन में थोड़ी मायूसी छाने लगी थे लेकिन शाज़िया को पूरा यक़ीन था।

फिर सुबह चार बजे एक रास्ते पर थोड़ी हरकत हुई।

सिर्फ़ 5 मिनट चला था एनकाउंटर। हूजेफ़ा और उसके दो साथी मारे गए, बिना कोई मुक़ाबला किए।

बहुत भीड़ इक्कठा हुई थे उनके जनाज़े में। शाज़िया भी गयी थी मातम मनाने। अपनी आंखों में आंसू लिए।
पर वहां लोगों को नहीं पता था कि वो ख़ुशी के आंसू थे।

बिना वर्दी की सिपाही थी शाज़िया।
उसके पास ना कोई शोहरत था और ना कोई तमग़ा।
लेकिन कमाल की हिम्मत थी उसमें।
वो थी आर्मी की असली हीरो।

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