नया सवेरा: कर्नल सुशील तंवर की कहानी

मेजर भूपेंद्र की एक साल पहले ही उस इलाक़े में पोस्टिंग हुई थी। राष्ट्रीय राइफल्स में अल्फा कंपनी कमांडर। उनकी कंपनी बारामुला और हंडवारा के बीच एक छोटे से गांव तरागपोरा में पिछले कई सालों से तैनात थी।

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कहानी इंडियन आर्मी के उस मेजर की जिसने कश्मीर के एक गांव की तस्वीर बदल दी।

कर्नल सुशील तंवर की कहानी ‘नया सवेरा’। बारामुला और हंडवारा के बीच बसे एक छोटे से गांव तरागपोरा में कैसे इंसानियत की दस्तक से हालात बदलने लगे। कैसे एक मेजर की कोशिशों ने नफरत की जमीन पर मोहब्बत और दोस्ती के फूले खिला दिए। हुर्रियत के कट्टर नेता भी कैसे भारतीय फौज के मुरीद बन गए।

“हम क्या चाहते आजादी”
“आई आई लश्कर आयी… भारत तेरी मौत आयी”
“जब तक सूरज चांद रहेगा… अफ़ज़ल तेरा नाम रहेगा”

दूर से सुनाई दे रहे इन नारों ने, अपने दफ्तर में बैठे मेजर भूपेंद्र राठौर को पल भर के लिए थोड़ा विचलित ज़रूर किया लेकिन फिर वो एक ठंडी आह भर कर कुछ अजीब ओ ग़रीब सुकूं के साथ वापिस अपनी चाय की चुस्कियों में डूब गया था।

मेजर भूपेंद्र की एक साल पहले ही उस इलाक़े में पोस्टिंग हुई थी। राष्ट्रीय राइफल्स में अल्फा कंपनी कमांडर। उनकी कंपनी बारामुला और हंडवारा के बीच एक छोटे से गांव तरागपोरा में पिछले कई सालों से तैनात थी।

राष्ट्रीय राजमार्ग पर बसे इस गांव को मानो कुदरत ने अपने हिस्से की सारी खूबसूरती से नवाजा था। घने जंगल, अनोखी हरियाली, सेब से लदे बाग, साफ पानी के चश्मे। सचमुच जन्नत जैसा था तरागपोरा।

बर्फ के बोझ से झुके पहाड़ों के आंचल में बसे तरागपोरा को मेजर भूपेंद्र और उसके जवानों ने पूरे दिल से अपना लिया था।

लेकिन बाहर गूंजते हुए नारे उस अपनेपन को चुनौती दे रहे थे।

आज वैसे भी जुम्मा था। हर जुम्मे की नमाज के बाद, वहां यही तमाशा होता था। कभी कम और कभी ज्यादा।

लोग नमाज़ के लिए इकठ्ठा होते। वहां कुछ लोग उनको भड़काते। थोड़ी देर नारे लगते, कभी जुलूस भी निकलता और फिर सब अपने घर चले जाते।

जब कश्मीर घाटी में कहीं हालात ज्यादा नाज़ुक होते, तो उसका असर यहां भी दिखाई देता और फिर ये नारेबाज़ी, पत्थरबाज़ी में बदल जाती।

अब तो पुलिस, सीआरपीएफ और फौज को इसकी आदत हो गयी थी।

“जय हिंद साहिब”, तभी सुबेदार आनंद सिंह की रौबदार आवाज ने भूपेंद्र की चाय में थोड़ी और कडकी भर दी।

“साहिब, ये लोग फिर शुरू हो गए। क्या तकलीफ है इनको? सब कुछ तो है इनके पास? हमारे गांव में तो न ऐसी सड़क है और न ही इतनी बिजली।
हम कितनी कोशिश करते हैं इनको खुश करने की। अपने हिस्से का राशन, दवाइयां वगैरह सब इनकी मदद के लिए लगाते हैं। और ये है कि नारे लगा रहे हैं। मन तो करता है कि…”
“अरे, शांत रहो सूबेदार साहिब”

भूपेंद्र ने अपने से कई साल उम्र में बड़े आनन्द सिंह को तुरंत ही समझाना शुरू कर दिया।

“ये भीड़ है। जल्दी बहकावे में आ जाती है। इंसानी फितरत है। पूरे देश में यही होता है। राजस्थान में, हरियाणा में और वह तमिलनाडु वाली स्टरलाइट फैक्ट्री में भी तो भीड़ ऐसे ही बेकाबू हुई थी। अब कितनी ऐसी मिसालें दूं आपको और फिर कश्मीर में तो यही रिवाज़ रहा है..”

“लोग तो अपने ही हैं न। शिकायत भी हमसे ही करेंगे और फिर हमारे सारे काम में भी तो यही लोग मदद करते हैं। आतंकवादियों की खबर से लेकर ज़रुरत के सामान की सप्लाई तक हम इन्हीं के भरोसे तो रहते हैं। है ना?”

“अच्छा, अब जाओ। वो सलीम ठेकेदार मेन गेट पर आएगा। उसको अंदर भिजवा देना”, कह कर भूपेंद्र ने सूबेदार साहिब को बाहर भेज दिया।

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कर्नल सुशील तंवर

सलीम। तरागपोरा का रहने वाला सलीम शहज़ाद। तकरीबन 30 साल की उम्र का होगा। हमेशा हंसते रहने वाला सलीम दुनियादारी में बहुत माहिर था। पूरा गांव उसको जानता था और वैसे थोड़ा-बहुत मानता भी था।

छोटा मोटा बिज़नेस करते-करते उसने फ़ौज को भी रोज़मर्रा की ज़रुरत का सामान पहुंचाना शुरू कर दिया था।अच्छी-खासी कमाई थी इस काम में।

“सलाम वालेकुम सर”। हर जुम्मे की तरह सलीम नमाज़ के बाद सीधे भूपेंद्र के पास आ गया था।

“थोडा देर हो गई साहिब। वो आज जुम्मे की नमाज़ के बाद फिर वही तमाशा हुआ। वो हाजी रशीद पीर है न। आज उसने फिर से भड़काऊ तक़रीर की। कहता था इस्लाम खतरे में है। कितना फ़रेबी है वो, साहिब। बच्चे बाहर पढ़ रहे हैं। सरकारी पेंशन मिलती है और फिर भी ये लोगों की ज़िंदगी में ज़हर घोल रहा है। उसका कुछ करो, साहिब। नहीं तो बर्बाद कर देगा गांव को।”

भूपेंद्र के चेहरे पर ये सुनते ही एक शरारत भरी मुस्कराहट फैल गयी।

 

“अबे सलीम, अपने कश्मीरी भाई की चुगली करते हुए शर्म नहीं आती तुम्हें।”

“जब तुम सब को पता है कि कुछ लोग पूरे गांव को गुमराह कर रहे हैं, तो तुम लोग खुद क्यों कुछ नहीं करते। सारी गंदगी हमसे ही साफ कराओगे क्या?”

“साहिब, आपको पता तो है। असल में हाजी रशीद जैसे लोगों के लिये कश्मीर सिर्फ एक ज़रिया है। दौलत और शोहरत हासिल करने का बहुत आसान तरीक़ा। इनके बहकावे में आकर बेरोजगार नौजवान और छोटे बच्चे सड़कों पर आ जाते हैं। हालात जितने खराब होंगे इनको उतना ही फायदा होगा”, सलीम का सुंदर चेहरा गुस्से में लाल होने लगा था।

“चिन्ता मत करो सलीम। कुछ करते हैं इस बारे में हैं। ये बहुत लम्बी जंग है। ख्याल और ज़ज़्बात की जंग। ऐसी जंगें गुस्से से नहीं मोहब्बत से जीती जाती हैं।”

“अच्छा सुन। इस साल हमने सोचा है कि प्राइमरी स्कूल के बच्चों को कंप्यूटर सिखायेंगे।”

“और खातून, खासकर कर बेवाओं के लिए वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर भी बनाने का प्लान है। उनको सिलाई और बेकरी जैसै कुछ काम सिखाएंगे ताकि वो आत्मनिर्भर बन सकें। तुम बाजार का सर्वे करना शुरू करो। काफी सामान खरीदना पड़ेगा और हां, पिछले साल जो तूने सस्ता और घटिया किस्म का क्रिकेट किट सप्लाई किया था ना वैसा नहीं होना चाहिए। तुम्हारे अलावा और सप्लायर भी हैं जो तैयार बैठे हैं। समझे?”

भूपेन्दर के इस ताने को सुनकर सलीम झेंप तो गया लेकिन वो भी कम मुंहफट नहीं था।

“ओह हो। ठीक है साहिब जी। गलती हो गयी। लेकिन इतना ख़राब सामान भी नहीं था। खेलना ही तो है इन बच्चों को। ये थोड़े कोई सचिन तेंदुलकर बन जाएंगे।”

और इस से पहले भूपेंद्र कुछ और बोले सलीम जल्दी-जल्दी दफ्तर से बाहर चला गया था।

पढ़िए कर्नल सुशील तंवर की कहानी ‘मुजाहिद’

उस के जाने के बाद भूपेंद्र फिर एक गहरी सोच में पड़ गया। सबकुछ तो ठीक था तरागपोरा में। कम से कम ऊपर से तो यही लगता था। फ़ौज लोगों के लिए जो बन सकता था करती थी। मेडिकल कैंप, ऑपरेशन सद्भावना के अंतर्गत भारत-दर्शन। और यहां तक कि दूर-दराज के इलाकों में सड़क और पुल का निर्माण भी।

लेकिन फिर भी अक्सर उनके ख़िलाफ़ नारेबाज़ी हो जाती। अगर कश्मीर में कहीं भी कुछ हादसा होता, तो यहां भी लोग कभी नेशनल हाईवे पर थोड़ी देर के लिए धरना दे देते।

कुछ दिन पहले तो पत्थर बाज़ी भी हुई थी और इन सब के लिए गांव के चंद लोग ही ज़िम्मेदार थे।

फौज और सरकार के हर काम के खिलाफ लोगों को भड़काना इनका मकसद था। कई बार समझाने के बावजूद उनकी हरकतों में कोई कमी नहीं आई थी।

लेकिन इस सबके बावजूद फ़ौज के “आवाम और जवान–अमन है मुक़ाम” की सोच पर कोई खास असर नहीं पड़ा था। पूरी कश्मीर वादी में तरह-तरह के कार्यक्रमों का आयोजन मेजर भूपेंद्र जैसे हज़ारों कंपनी कमांडर उसी जोश-ओ-ख़रोश और इंसानियत से करते रहे।

1990 के बाद से सीमा पार द्वारा प्रायोजित आतंकवाद से लड़ती भारतीय फ़ौज अब यह भली-भांति समझती है कि कश्मीर की आम जनता का ख्याल रखना भी उतना ही ज़रूरी है जितना आतंकवादियों को ठिकाने लगाना और इसलिए वहां तैनात फौजियों को लोगों के साथ तावून रखने की एक आदत बन गयी थी।

तरागपोरा में भी मेजर भूपेंद्र और उसकी कंपनी का हर तबके के लोगों से चाहे वह अमीर हो या गरीब। बुजुर्ग हो या नौजवान, सब से मिलने-मिलाने का एक अटूट सिलसिला बन गया था।

इसी सिलसिले को बरक़रार रखने के लिए भूपेंद्र ने हाजी रशीद पीर को मिलने के लिए संदेशा भेज दिया था।

हाजी रशीद एक ज़माने में स्कूल टीचर था।

रिटायर होने के बाद हुर्रियत कांफ्रेंस के साथ जुड़ गया और तभी से उसने गांव वालों को अपनी विचारधारा में समेटना शुरू किया था।

तीन-चार संदेशे भेजने पड़े थे रशीद के पास। तब जाकर कुछ दिन बाद अपने दो तीन चमचों को लेकर आखिर रशीद, भूपेंद्र के दफ्तर आ ही गया।

“आओ रशीद साहब। बैठो, कैसे हो? बहुत दिनों के बाद मुलाक़ात हो रही है आपसे। आखिरी बार शायद डीसी साहिब के दफ़्तर में मिले थे न।”

हाजी रशीद को मेजर साहब से इतनी गर्मजोशी की उम्मीद नहीं थी। “आज हमें कैसे याद किया, मेजर साहिब। कोई ख़ास बात है क्या? किसी ने शिकायत की होगी पक्का।”

“आपकी शिकायत करने की जुर्रत किस में है, हाजी साहिब। बस यूं ही मन कर रहा था आपसे मुलाक़ात का।

“आप तो हमारे ख्यालात से वाकिफ हो, मेजर साहिब। हम तो सिर्फ अमन चाहते हैं। और आज़ादी भी। वैसे ये नमकीन पकौड़े खिलाने के बाद आप हमें नमक हराम तो करार नहीं कर दोगे!”

बातों का बड़ा शातिर था रशीद। ऐसा लगता था मानो चाय और पकौड़ों की गर्मी रशीद की ज़बान में आ गयी थी।

“क्या रशीद साहिब। आप इतनी तक़रीर करते हो। हमारे निज़ाम को बुरा-भला बोलते हो। हम पर तोहमत लगाते हो। ये आज़ादी ही तो है। हमारे यहां एक पुरानी कहावत है, रशीद साहिब। दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो दूसरों को इस्तेमाल करते हैं और दूसरे वो जो औरों के द्वारा इस्तेमाल होते हैं। मैं अक्सर सोचता हूं कि हमारे तरागपोरा वाले लोग और खासकर आप किस खाते में आएंगे।”

“दफा करो मेजर साहिब। आप इस सियासत में न ही पड़ो तो ठीक है। हमें अपने हाल पर छोड़ दो। आप अपनी ड्यूटी करो। लेकिन बच्चों को कॉपी पेंसिल बांटने से और दो चार लोगों को दवाइयां देने से आप हमारे गांव का हिस्सा नहीं बन जायेंगे। ये आपकी सद्भावना, अख़बारों में फोटो छपवाने के लिए ठीक है।”

उन दोनों की चाय खत्म हो गयी पर नोकझोंक तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। मेजर भूपेंद्र में भी गज़ब का धैर्य और सहनशीलता थी। उसका मक़सद और दिल दोनों साफ़ थे वो सिर्फ आवाम की बेहतरी चाहता था, लेकिन हाजी रशीद ये बात कहां मानने वाला था।

इसी तरह दिन गुजरते गए। तरागपोरा के प्राइमरी स्कूल में कंप्यूटर लैब भी बन गया। वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर भी बना लेकिन गांव की औरतें वहां आने में कतराती रहीं। सलीम का कहना था कि हाजी रशीद समेत कुछ लोगों ने इसको गैर इस्लामिक बोलकर लड़कियों को वहां नहीं जाने की सख्त हिदायत दी थी।

वो दिसंबर की सर्द सुबह थी। बाहर बिछी बर्फ की चादर कमरे के अंदर से जितनी खुबसूरत नज़र आती थी, बाहर निकल कर उतनी ही सरफिरी लगती थी।

ऐसे में गरम बुखारी के आगोश में बैठे भूपेंद्र के पास सूबेदार आनंद सिंह अचानक भागते हुए आए।

“साहिब, वो हाईवे पर एक ट्रक और कार का एक्सीडेंट हो गया है। हमारी एक पेट्रोलिंग पार्टी वहीं पास में थी। ट्रक वाला भाग गया लेकिन उसकी गाड़ी का नंबर नोट कर लिया है। कार में दो लेडीज और एक लड़का है। काफी चोट है साहिब। उनकी हालत नाज़ुक है।”

“ओह! इतनी सुबह यहां सिविल हॉस्पिटल में कोई नहीं होगा। ऐसा करो, उनको जल्दी दुर्गमुल्ला वाले मिलिट्री हॉस्पिटल भिजवाओ। मैं भी निकलता हूं। और आप यहीं रुको। अगर हो सके तो इनके घर वालों का पता लगा कर उनको इत्तिला कर देना। पुलिस स्टेशन में भी मैसेज करो। ऐसा न हो कि बाद में कोई मसला बन जाए।”

अगले कुछ घंटे जैसे ज़िन्दगी और मौत के बीच की लड़ाई में गुज़र गए। भूपेंद्र ने हेडक्वार्टर्स को बता कर उनके इलाज का बंदोबस्त कराया और खुद भी मिलिट्री हॉस्पिटल पहुंच गया। जब तीनों घायल लोगों को वहां लाया गया तो ऑपरेशन के लिए डॉक्टर्स तैयार थे। खून की ज़रुरत पड़ी तो तीन चार जवानों का खून भी मिल गया।

ऑपरेशन सफल रहा और तीनों लोगों की जान बच गयी। इस सब भागदौड़ में पूरा दिन कैसे निकल गया, भूपेंद्र को यह पता ही नहीं लगा। देर रात, जब थका हारा मेजर भूपेंद्र अपने सैनिकों के साथ वापस आया तो उनके कैंप के गेट पर गांव वालों की भीड़ खड़ी थी।

भूपेंद्र थोड़ा सकपका सा गया, “इतनी देर रात, ये लोग यहां। अब पता नहीं क्या हो गया।”

उसके पास पहुंचते ही लोगों ने उसको घेर लिया था। इससे पहले वो कुछ कह पाता, एक आदमी उसके गले से लिपट कर रोने लगा था।

“आपका बहुत शुक्रिया जनाब। आपने मेरे बच्चों और बीवी को बचा लिया। अगर फ़ौज नहीं होती तो आज मैं बर्बाद हो जाता।”

उस अंधेरे में भी भूपेंद्र हाजी रशीद पीर की आवाज़ को पहचान गया था।

“नहीं हाजी साहिब। हमने तो बस अपना फ़र्ज़ अदा किया।”

“खुदा आपको सलामत रखे साहिब। मैं श्रीनगर में था। बच्चे पेरे पास ही आ रहे थे। मैंने एक्सीडेंट के बारे में सुना तो सीधा यहां आ गया। सूबेदार साहिब ने बताया कि वह आईसीयू में हैं और ठीक हैं। मुझे हॉस्पिटल ले चलो साहिब प्लीज।”

“हाजी साहब, इत्मीनान रखें। अभी बहुत देर हो गयी है। वैसे भी डॉक्टर अभी मिलने नहीं देंगे। कल सुबह आप को वहां ले चलेंगे। खुदा का शुक्र है कि सब ठीक है। वो ट्रक वाला भी पकड़ा गया। यहीं हंडवारा का है।”

किसी तरह दिलासा देकर मेजर भूपेंद्र ने सबको वापस भेज दिया। बस उसे इस बात का सुकून था कि उनके कारण तीन इंसानों की जान बच गयी।

अगले जुम्मे को हर बार की तरह सलीम सीधा भूपेंद्र के दफ्तर में आ गया था।

“अस्सलाम वालेकुम साहिब। आज तो कमाल हो गया। जुम्मा की नमाज़ के बाद किसी ने तक़रीर नहीं की। कोई नारेबाजी नहीं हुई। सब लोग नमाज़ पढ़ने के बाद हंसते बतियाते घर चले गए।”

ये सुन कर भूपेंद्र हल्का सा मुस्कुरा दिया था, “चलो अच्छा है। देखते हैं गांव वालों को यह अमन कब तक पसंद आएगा।”

सलीम वापस जाने लगा था कि भुपिंदर ने उसे रोक कर बोला, “अरे सुन। वो लेडीज के वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर के लिए कुछ नया सामान खरीदना है। एक हफ्ते के अंदर। अच्छी क्वालिटी होनी चाहिए।”

दोनों ये जानते थे कि फ़ौज के इस नेक मिशन का अब इस गांव में कोई विरोध नहीं करेगा।

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