कर्नल सुशील तंवर की कहानी ‘कबूल है’

आशीष ने गौतम को अपना प्लान समझा दिया था। रोज तार के आगे रहने वाले लोग अपना शिनाख्ती कार्ड चेकपोस्ट पर दिखा कर अपने घर जाते थे।

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प्रतीकात्मक तस्वीर।

कर्नल सुशील तंवर की कहानी ‘कबूल है’। एक ऐसी महिला की दास्तान जिसने कबूल तो खुशियां की थीं, लेकिन गम के साए स्याह होने लगे। फिर जब मेजर आशीष से मुलाकात हुई, तो लगा कि गम की इस दास्तान में चंद खुशियां आ सकती हैं। और फिर एक रोज़ कुछ ऐसा हुआ कि खुशियों की तलाश में सरहद की दुश्वारियां भी नामालूम सी लगने लगीं।

“साहिब आगे रास्ता बंद है। लोगों की भीड़ जमा है। कुछ नारेबाजी भी हो रही है। मेरी मानें तो आप थोड़ी देर यहीं रुकें।”

बारामूला से श्रीनगर जा रहे मेजर आशीष गहलोत की गाड़ी अभी पट्टन शहर के संकरे से बाजार के पास पहुंची ही थी कि चौक पर खड़े पुलिस कांस्टेबल ने उनको आगे रास्ता बंद होने की जानकारी दी।

“अब क्या हुआ भाई। रोज का ड्रामा है यहां। आज तो कोई बंद या हड़ताल भी नहीं थी। फिर अचानक ये क्या सियापा हो गया।”

खिजलाये हुए मेजर आशीष ने कुछ और तफ्तीश की तो पता चला कि आगे तहसील ऑफिस के सामने तीस-चालीस औरतें इकट्ठा होकर इज्तिहाद कर रही हैं। और उन्हीं के कारण वहां भीड़ तमाशाई बन कर जमा हो गई है।

वैसे तो कश्मीर में लोगों का सड़कों पर विरोध करना आम बात थी। और आज भी है। कभी-कभी तो यूं लगता है कि लोगों को बस एक बहाना चाहिए नारे लगाने का। फिर चाहे सुरक्षाबलों की किसी कार्रवाई की बात हो या बिजली का ट्रांसफार्मर खराब होने का मसला। भीड़ का कहीं भी उमड़ आना जैसे उनकी स्वाभाविक सी प्रकृति है।

लेकिन आज मामला कुछ अलग था और ऐसा इसलिए क्योंकि ये औरतें कश्मीरी नहीं बल्कि पाकिस्तानी थीं। वो महिलाएं जिन्होंने 90 के दशक में जिहाद की उमंग में पाकिस्तान जा पहुंचे कश्मीरियों से शादी कर ली थी। और जब इन कश्मीरी युवकों ने अपने फिजूल के जज्बे की नाकामी से हताश होकर वापस कश्मीर में आकर आत्मसमर्पण कर दिया तो ये महिलाएं भी उनके साथ यहां आकर बस गई थीं। लेकिन ना तो इन महिलाओं और उनके बच्चो को यहां पहुंच कर भारत की नागरिकता मिली और ना मिली बाकी कोई भी सहूलियत। अब इनकी बेबसी का ये आलम था कि ये सब परिवार ना यहां के रहे और ना वहां के।

बहरहाल, थोड़ी देर इंतजार करने के बाद रास्ता खुल गया और मेजर आशीष ने अपना सफर उस छोटे से अनचाहे विराम के पश्चात फिर शुरू कर दिया। मगर पाकिस्तान से इक नई जिंदगी की उम्मीद लेकर आए इन परिवारों के खस्ता हाल ने आशीष के दिमाग में कई सवाल खड़े कर दिए थे।

कश्मीर वादी में कई साल बिताने के कारण वो यहां की अनगिनत इंसानी त्रासदियों से बखूबी वाकिफ था लेकिन इन महिलाओं की मुसीबतों का ये पहलू उसके लिए कुछ नया था। और उसने तय किया कि इस बारे में वो जल्द ही ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटाएगा।

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कर्नल सुशील तंवर

उसकी जगह कोई और होता तो शायद इस पूरे घटना क्रम को नजर अंदाज कर देता लेकिन मेजर आशीष का ताल्लुक मिलिट्री इंटेलिजेंस से था। आमतौर पर इस क्षेत्र में काम करने वाले अफसरों को औरों से ज्यादा सचेत, ज्यादा जिज्ञासु और अधिक परिपक्व रहने की जरूरत होती है क्योंकि उनकी जिम्मेदारी का दायरा ज्यादा बड़ा होता है। ऐसे में उनको किसी भी इलाके के सभी पहलुओं जैसेकि सामाजिक हालत व आर्थिक स्थिति और सांस्कृतिक तरीके वगैरह से हमेशा अवगत रहने की आवश्यकता रहती है।

वैसे आशीष को इसमें अपना स्वार्थ भी नजर आ रहा था। कोई निजी स्वार्थ नहीं बल्कि अपने काम के लिहाज से कुछ मदद हासिल करने का स्वार्थ। उसे लगा कि चूंकि कश्मीर में आतंकवाद की डोर पाकिस्तान में बैठे आकाओं के हाथों में है तो ये लाचार महिलाएं उन तक पहुंचने का एक जरिया बन सकती हैं।

अगले कुछ दिनों में आशीष ने अपने आस-पास के इलाके में ऐसे लोगों का पता लगाया जो पाकिस्तान से वापस आए थे। वैसे तो पूरे कश्मीर में ऐसे तीन सौ से ज्यादा लोग थे लेकिन आशीष के क्षेत्र बारामूला में ऐसे तकरीबन बीस परिवार मौजूद थे।

ये सभी लोग कश्मीर में आतंकवाद शुरू होने के बाद लाइन ऑफ कंट्रोल के उस पार चले गए थे। लेकिन वहां पर ना उनका आजादी का सपना पूरा हुआ और ना उन्हें चैन की जिंदगी नसीब हुई। हां, ये ज़रूर हुआ कि वहां पर उन्होंने शादियां करके अपना परिवार शुरू कर लिया था। लेकिन जल्द ही गरीबी और गैर-मुल्की आबो-हवा के चलते वो अपने वतन वापस आने का जरिया ढूंढने लगे थे। चूंकि सीमा पर भारतीय सेना का चुस्त पहरा था और कश्मीर का बॉर्डर क्रॉस करने में जान का खतरा था तो इसलिए इन सभी के लिए नेपाल के रास्ते भारत आने का तरीका कारगर साबित हुआ। आशीष की इस खोजबीन को एक कुदरती मदद मिली जब उसके दोस्त शमीम ने बातों-बातों में एक ऐसी महिला का जिक्र किया जो उसके स्कूल में अध्यापक बनने की ख्वाहिश लेकर आई थी।

वो थी फरीदा बेगम। जिला मुजफ्फराबाद। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में रिहायश करने वाली।

शमीम आशीष का खास दोस्त था। वो कई साल पहले आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल तो हुआ था लेकिन चंद महीनों में ही उसे इस पूरी तहरीक के असल मायने समझ में आ गए थे। अपने साथी आतंकियों की हरकतों से निराश होकर उसने सुरक्षाबलों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और एक नई जिंदगी की शुरुआत की थी। एक समृद्ध परिवार से होने के कारण उसने अपने घर वालों की मदद से बारामूला शहर में एक प्राइमरी स्कूल भी स्थापित कर दिया था। ना सिर्फ इसमें अच्छी-खासी कमाई थी बल्कि समाज में एक रुतबा भी था। और अब वो अपने परिवार के साथ खुशी-खुशी अमन का जीवन बसर कर रहा था।

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आशीष ने तो बस पाकिस्तानी महिला का जिक्र सुनते ही शमीम को ये फरमान दे डाला कि जल्द से जल्द वो उसकी मुलाकात फरीदा बेगम से कराए। दो दिन के बाद ही शमीम फरीदा को लेकर आशीष के ऑफिस आ गया था। आशीष ने उनका बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया मगर उसको ज़रा ताज्जुब भी हुआ था कि फरीदा का खाविंद उसके साथ नहीं आया था।

थोड़ी देर बाद शमीम ने आशीष के समझाए अनुसार बाहर जाने का बहाना बना दिया।

“अच्छा आप लोग बातें करो। मुझे बाज़ार में कुछ जरूरी काम है। तकरीबन एक घंटे में आता हूं।”

“फरीदा, इतने में तुम तसल्ली से साहिब के साथ बात करो।”

आशीष को लगा था कि शमीम के इस तरह अचानक चले जाने से फरीदा थोड़ी असहज हो जाएगी। लेकिन फरीदा को तो जैसे कोई फर्क नहीं पड़ा था।

ये उनकी पहली मुलाकात थी और आज आशीष का मकसद सिर्फ उसके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल करना था।

“माफ कीजिए आप को कुछ परेशानी तो नहीं हुई। मैंने इस तरह आपको यहां बुला लिया। वो क्या है ना कि जब मैंने सुना…”

आशीष ने बोलना शुरू किया ही था कि फरीदा ने उसे बीच में ही टोक दिया।

“कोई बात नहीं सर। यहां आकर इतने सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा चुकी हूं कि मुझे अब कोई फर्क नहीं पड़ता। और आप तो कम से कम मुझे यहां बिठाकर तसल्ली से गुफ्तगू कर रहे हो।”

फरीदा को अपनी दास्तान सुनाने में ज्यादा वक्त नहीं लगा था। मुजफ्फराबाद में उसके पिता सरकारी मुलाजिम थे। चार बहनें और तीन भाइयों की लाडली फरीदा ने वैसे तो कॉलेज से ग्रेजुएशन किया था लेकिन जब उसके वालिद साहिब ने उसका निकाह कश्मीर से जिहाद की फिराक में आए मुज्जफर डार से तय किया तो उसने जरा भी आनाकानी नहीं की थी।

“कमाल है। तुम तो खासी पढ़ी-लिखी हो। और मुजफ्फर ने तो शायद इंटर भी मुश्किल से पास किया था। फिर ऐसे कैसे तुम दोनों की जोड़ी जम गई?”

“सब वक्त का खेल है सर। जब आपके यहां कश्मीर से जिहाद का परचम लहराए हजारों लोग हमारी तरफ आए तो उस मजहबी जज्बात में बाकी सब पहलुओं का किसी को कोई ख्याल ही नहीं रहा। उनको अपनी बेटियां सौंप कर हमारे इलाके के लोग शायद इस तहरीक में अपना फर्ज अदा करने की कोशिश कर रहे थे।”

“और मुजफ्फर ने तो जल्द ही सब कुछ छोड़कर वहीं हमारे घर के पास एक दुकान खोल ली थी। मेरे घरवालों ने भी सोचा कि अब तो ये यहीं रहेगा। बेटी भी पास में रहेगी और बाकी कोई झंझट नहीं होगा। बस मैंने भी कबूल कर लिया। हालांकि मेरे रजामंद होने या न होने से शायद उनके फैसले पर कुछ खास फर्क नहीं पड़ता।”

“तो फिर आप लोग यहां वापिस क्यों आ गए?”

“बदकिस्मती से साहिब।”

फरीदा ने इक दुख भरी गहरी सांस खींची।

“सब-कुछ अच्छा चल रहा था। मैं अपनी घर-गृहस्थी संभाल रही थी । हमारा एक प्यारा सा बेटा है। छह साल का। फैसल नाम है। लेकिन पिछले कुछ सालों से मुज्जफर का मन वहां नहीं लग रहा था। और जब से इस तरफ कश्मीर में हालात ठीक हुए तो उसकी वापस आने की कसक और बढ़ गई। वतन की मिट्टी की पुकार में बहुत ताकत होती है ना सर। बस इसलिए पिछले साल हम अपनी बनी-बनाई दुनिया छोड़कर यहां आ गए।”

“तुम और तुम्हारा परिवार खुश तो हो ना यहां आ कर?”

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आशीष अपने इस सवाल का जवाब जानता था पर इससे पहले फरीदा अपना दुख बयान करती शमीम आ धमका था।

“हो गई बात आपकी? कुछ इसकी मदद हो सके तो करना भाईजान। प्लीज।”

“देखते हैं। अगली बार मुजफ्फर को भी साथ लाना। और अगर तुम्हारे पास वक्त ना हो तो इन दोनों को ही भेज देना।” आशीष ने कुछ बेरुखी से शमीम को नसीहत दी।

ये सुनकर फरीदा तुरंत ही बोल पड़ी थी।

“मुज्जफर नहीं आएगा सर। पूरा दिन किसी काम-धंधे की तलाश में घूमता रहता है। सच कहूं तो अब अपने मुस्तकबिल के बारे में सोच कर डर लगता है। तभी तो मैंने शमीम भाई के स्कूल में टीचर की नौकरी की है।”

उनके जाने के बाद आशीष काफी देर तक मुज्जफर और फरीदा के बारे में सोचता रहा था। यहां बारामुला में हर रोज उसके पास कोई ना कोई कश्मीरी किसी मदद की गुहार लेकर आता था। लेकिन आज फरीदा से मिलने के बाद भी उसको ये अंदाजा नहीं हुआ था कि आखिर फरीदा को उससे किस तरह की मदद की उम्मीद थी।

उनकी अगली मुलाकात बाबा शुक्रुद्दीन की जियारत के पास हुई थी। सोपोर से कुछ किलोमीटर दूर वुलर झील के किनारे एक छोटी सी पहाड़ी पर बनी इस जियारत की लोगो के दिलों में एक खास जगह है। रोज यहां आने जाने वालों का तांता लगा रहता है। कोई मुरीद होता है और कोई बीमार। कुछ तिजारती होते हैं और कुछ लोग तो सिर्फ कुदरत का खुबसूरत नजारा लेने के लिए यहां अक्सर आते हैं। इसी कारण किसी से भी मिलने के लिए वो जगह बिलकुल मुनासिब थी। ऐसे में जब फरीदा ने उसे बताया कि वो अपने नन्हे से बेटे फैसल के साथ जियारत पर जा रही है तो आशीष ने उसे वहीं इंतजार करने को कहा था। और वो भी बताए हुए समय पर जियारत के पास पहुंच गया था।

“आज क्या मुराद मांगने आई हो फरीदा? कुछ खास मौका है क्या?”

आशीष के इस सवाल पर उसके चेहरे पर एक सूखी से मुस्कान आ गई थी।

वो धीरे धीरे एक दरख़्त की ओर बढ़ी और उस पर एक धागा बांधते हुए बोली।

“साहिब मेरे मन में तो इतनी मुरादें है कि ये जो हर तरफ ताबीज और रंग बिरंगे धागे बंधे हुए हैं ना वो भी शायद कम पड़ जाएं।”

इतना लालच अच्छा नहीं फरीदा ।

आशीष ने हंसते हुए कहा और फिर फैसल के छोटे-छोटे हाथों को पकड़कर उनकी एक नन्ही सी डाली में धागा बांधने में मदद करने में जुट गया।

“सब खैरियत तो है ना? कुछ परेशान लग रही हो।”

घर वालों की याद आ रही है सर। यहां आकर सब-कुछ अंजाना सा लगता है। ऊपर से मुजफ्फर के परिवार वाले भी हम से कुछ खास खुश नहीं लगते।

“क्या मतलब?” आशीष अब थोड़ा संजीदा हो गया था।

“मतलब ये कि उनको लगता है कि घर में तीन लोगों का खर्चा और बढ़ गया है। उसके भाइयों को लगता है कि घर की जमीन जायदाद में एक और हिस्सेदार आ गया है। मेरा स्कूल जाना भी उनको पसंद नहीं है। यहां तक कि हमारी खाने की आदतें भी नहीं मिलतीं। वो भात ज्यादा खाते हैं। नून चाय पीते हैं। छोड़ो साहिब, अब क्या-क्या बताऊं।”

“तुम्हारी वहां मुजफ्फराबाद में अक्सर बात तो होती होगी ना?”

“होती है साहिब।। लेकिन ज्यादा नहीं। आपको पता है उस पार वाले कश्मीर में हालात यहां की तरह नहीं हैं। मुझे लगता था कि यहां पर सुरक्षाबलों और एजेंसी के कारण लोगों पर बहुत बंदिशें होंगी। लेकिन उस तरफ तो हाल और भी बुरा है सर। यहां से आने वाले हर इंसान को तो क्या हर कॉल को भी वहां मॉनिटर किया जाता है। बस इसलिए मेरे परिवार वाले थोड़ा डरते हैं।”

“एक गुजारिश है आपसे सर। किसी तरह मेरे घर वालों से मेरी और फैसल की मुलाकात करा दो। बड़ा एहसान होगा आपका।”

फरीदा की आंखें भर आई थीं।

“ठीक है। ठीक है। करता हूं कुछ । मैं अगर थोड़ी देर और यहां रुका तो मुझे लगता है कि तुम्हारे कारण इस वुलर झील के पानी का स्तर कुछ और बढ़ जाएगा। “

आशीष ने माहौल को हल्का करने की कोशिश की।

“चलती हूं साहिब। मैंने सुना है कि बॉर्डर पर कोई तंगधार नाम की जगह है जहां से नीलम नदी के आर-पार दोनों तरफ के लोग मुलाकात करते हैं। बस एक बार दीदार ही हो जाए उनका तो मन हल्का हो जाएगा।”

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फरीदा के जाने के बाद आशीष कुछ असमंजस में पड़ गया था। उसकी घर वालों से मुलाकात की ख्वाहिश पूरा करना कुछ खास मुश्किल नहीं था लेकिन उसको ये समझ नहीं आ रहा था कि सिवाय फरीदा को थोड़ा जेहनी सुकून मिलने के अलावा इस मुलाकात से क्या हासिल होगा। और फिर इस पूरे प्रकरण में मुज्जफर की सोच का पता लगाना भी तो जरूरी था।

बस एक उम्मीद थी आशीष के दिल में। यही कि मुज्जफर और फरीदा की मदद करके शायद वहां पाकिस्तान में किसी से राब्ता हो जाए और उनके जरिए वहां से कुछ खबर हासिल कर सके। वैसे अब तक आशीष को वो दोनों किसी खास उपयोग के काबिल नहीं लग रहे थे। लेकिन उसने सोचा कि क्या पता मदद के लालच में ये दोनों और इनका परिवार मुखबिर बन जाए और किसी दिन उसके काम आ सकें।

कुछ दिनों बाद शमीम उन दोनों को लेकर आशीष के दफ्तर आया था। मुज्जफर ज्यादातर वक्त चुपचाप ही बैठा था जबकि फरीदा की शिकायतों का सिलसिला जारी था। उस दिन आशीष को अंदाजा हुआ कि मुज्जफर अपने परिवार के कारण दो हिस्सों में बंटा हुआ है। एक तरफ माता-पिता, भाई-बहन, घर-गांव वाले और दूसरी तरफ फरीदा। और इस बंटवारे की शिकन उसके चेहरे पर साफ नजर आ रही थी। यकीनन वो पहले बहुत खूबसूरत रहा होगा पर अब वो अपनी उम्र से कहीं ज्यादा अधेड़ नजर आ रहा था।

“ना राशन कार्ड बन रहा है साहिब और ना आधार कार्ड। यहां तक कि फैसल के पुराने स्कूल के सर्टिफिकेट को भी यहां नहीं मान रहे हैं। गनीमत है कि वो अभी छोटा है। अगर कहीं मैट्रिक या कॉलेज में दाखिला लेना होता तो सोचो सर कितनी परेशानी होती जैसे वो कानिस्पोरा गांव वाले शौकत को हो रही है।”

आशीष के पास उनकी इन तकलीफों का कोई समाधान नहीं था। पाकिस्तान से वापस आए परिवारों के बारे में जो निर्धारित नीतियां थी उन्हीं के अनुसार सभी सरकारी तंत्र इन लोगों से सुलूक कर रहे थे। हां ये ज़रूर था कि इसमें इंसानियत की बहुत गुंजाइश थी।

“अच्छा आप लोग तो बाकियों की तरह ही नेपाल के रास्ते आए हो ना। तो आपका पासपोर्ट कहां है?”

आशीष अब भी उन्हें कुरेदने की कोशिश कर रहा था।

“सर हमारे पासपोर्ट तो सलीम के पास हैं।”

“सलीम। सलीम कौन।”

“सलीम ट्रैवल एजेंट है साहिब। इस्लामाबाद में। वहां से यहां आने वाले हम जैसे सभी लोगों के पासपोर्ट वो ही बनाता है। पचास हजार रुपए लिए थे हमसे और काठमांडू एयरपोर्ट से निकलने के बाद उसके एक आदमी ने हमसे वो पासपोर्ट वापस भी ले लिया। ये कहकर कि अब इसकी कोई जरूरत नहीं है।”

“उसने हमें गोरखपुर बॉर्डर के पास छोड़ दिया और बोला कि आप लोग यहां से पैदल सीमा पार कर लो और फिर गोरखपुर से ट्रेन पकड़ लेना।”

“समझ गया। और आपके ये पासपोर्ट वो लोग पता नहीं और कितने गैर कानूनी कामों के लिए इस्तेमाल करते होंगे। खैर, मुझसे जो बन सकेगा, आपकी मदद करने की कोशिश करूंगा। आप इत्मीनान रखें।”

आशीष के पास इस वक्त उनको दिलासा देने केअलावा कुछ भी नहीं था। लेकिन उसने ये ठान लिया था कि वो फरीदा को उसके परिवार से मुलाकात कराने की कोशिश जरूर करेगा।

मगर इसके लिए उन्हें तंगधार के इलाके में जाने की जरूरत थी। इसलिए उसने पहले वहां तैनात मिलिट्री इंटेलिजेंस की अपनी टीम से विचार-विमर्श किया। और उनकी रजामंदी के बाद फरीदा को पैगाम भेज दिया कि अगले जुम्मे को अपने घर वालों को तंगधार आने का संदेशा दे दे।

फरीदा तो ये सुनते ही खुशी से झूम उठी थी। आशीष ने उसको हिदायत दी कि वो मुज्जफर और फैसल के साथ जुम्मे को सुबह छह बजे ऑफिस में आ जाएं। साथ ही, उसने शमीम को भी उनको वक्त पर लाने की जिम्मेदारी थमा दी।

जाने वाले दिन आशीष सुबह-सुबह तैयार हो कर उनका इंतजार करने लगा था। वो लोग भी छह बजने के कुछ देर बाद ही हाजिर हो गए थे। 

“मुझे पता था तुम पक्का देर करोगे। अनुशासन नाम की भी कुछ चीज होती है।”

आशीष उनके आते ही मजाक करने लगा था।

“माफ करो सर। बिलकुल वक्त पर आए हैं। देखो ये बेचारा फैसल तो अब भी नींद में है।” शमीम ने सफाई देते हुए कहा।

“अच्छा अच्छा ठीक है। मैं तुम्हारी आदतें बखूबी जानता हूं। मुजफ्फर कहां है। वो नहीं आया क्या। और ये साथ में किसे लाए हो?” आशीष ने शमीम की टवेरा गाड़ी में झांकते हुए पूछा।

“वो नहीं आया साहिब। कहता था इतनी सुबह-सुबह उठना उसके बस की बात नहीं। और वो भी उस जगह को देखने जाने के लिए जिसे वो छोड़कर आ चुका है।”

“और ये जाकिर है। मेरा चचेरा भाई। गाड़ी अच्छी चलाता है। बड़ा शौक है इसको बॉर्डर देखने का। इसको पता लगा कि हम तंगधार जा रहे हैं तो पीछे ही पड़ गया।”

“चलो अब आ ही गया है तो ले चलते हैं। पहले ही देरी हो गई।” आशीष ने उनको अपने साथ आने का इशारा करते हुए कहा।

बारामूला से तंगधार का सफर तकरीबन चार घंटे का था। कुपवाड़ा शहर तक तो रास्ता ठीक था लेकिन उसके बाद सरकार की नाकामी सड़कों पर साफ दिखाई देती थी।

तीन घंटे के सफर के बाद वो मीलों ऊंची शमशाबारी पहाड़ी की नस्ताचून गली पर पहुंचे जहां एक बड़ा फौजी चेक पोस्ट था। कई गाड़ियां वहां कतार में लगी थीं और अपनी जांच का इंतजार कर रही थीं। आशीष हालांकि बिना रुके वहां से निकल गया लेकिन वहां इंतजार कर रहे बाकी लोगों के चेहरे उनको ऐसे जाते देख ईर्ष्या से भर उठे थे।

कहते हैं कि सालों पहले मशहूर फिल्म अभिनेत्री साधना यहां आई थीं और इसलिए सब इस जगह को “साधना पास” के नाम से ज्यादा जानते थे। वैसे अगर साधना जी को पता होता कि बदमिजाज़ मौसम खराब सड़क और लापरवाह ड्राइविंग के कारण उनके नाम वाली इस जगह पर हर साल कई इंसानों की जान चली जाती है तो वो शायद इस पहाड़ी को उनके नाम से माने जाने पर पक्का एतराज कर देतीं।

आशीष का मकसद बारह बजे से पहले तंगधार पहुंचने का था ताकि दिन रहते वो फरीदा को अपने परिवार से मिलने ले जा सके और फिर शाम तक वापस बारामूला पहुंच जाए। तंगधार में भारत और पाकिस्तान की सीमा के बीच एक दरिया है। बस इसी के दोनों तरफ आकर बिछड़े हुए परिवारों के लोग एक दूसरे को देखते है। साथ ही बहते दरिया के शोर से ज्यादा ऊंची आवाज में बातें करने की कोशिश करते हैं।

वहां खड़े होकर किसी भी इंसान को प्रकृति की नायाब खूबसूरती का अंदाजा होता लेकिन आशीष के लिए ये नजारा मानवीय रिश्तों का एक दर्दनीय पहलू था। दरिया के दोनों तरफ खड़े लोग एक दूसरे को इशारें कर रहे थे।

आशीष की टीम ने पहले ही एक ऐसी जगह चुनी हुई थी जहां पर दरिया थोड़ा संकरा था और एक दूसरे को दरिया के पार देख पाना थोड़ा सा आसान। फरीदा ने जब अपने परिवार वालों को दरिया के इस तरफ खड़े हुए देखा तो आशीष ने उसे उनको चुनी हुई जगह आने के लिए इशारा कर दिया था। वो बहुत दर्दनीय दृश्य था। वीडियो कॉलिंग और तमाम तकनीकी साधनों के बावजूद यहां लोग एक दूसरे की झलक देखने के लिए एक नदी के आर-पार खड़े थे। और उन पर नजर रख रहे थे दोनों देशों के खुफिया तंत्रों के कर्मी।

फरीदा फैसल को बता रही थी। “वो देखो नानू-नानी आए हैं। वहां उस बड़े पत्थर के पास और साथ में छोटी खाला भी है। हाथ हिलाओ बेटा। सुनो वो अपना सलाम भेज रहे हैं।”

फैसल बेचारा बस टकटकी लगाए उस तरफ देख रहा था। और कहे अनुसार कभी हाथ हिलाता और कभी मुस्कुराता। थोड़ी देर बाद आशीष ने फरीदा को वापिस लौटने का इशारा किया। किसी और को शायद ऐसे मुलाकात करना फिजूल लगता पर फरीदा को तो जैसे अपने परिवार को देखकर सुकून मिल गया था। आंखों में आंसू लिए वो आशीष के कहे अनुसार वापस गाड़ी में बैठ गई थी।

कहीं से भी लौटने का सफर आमतौर पर छोटा लगता है पर आज उन सब को ये सफर कुछ ज्यादा ही लंबा लग रहा था। वो इसी सोच में डूबा हुआ था जब शमीम ने थोड़ी मायूसी के साथ कहा था।

“लकीरें भी कितनी अजीब चीज होती हैं ना। बदन पर खीचों तो जख्म बना देती हैं और जमीन पर खींचो तो सरहद बना देती हैं। और इस सरहद ने तो जिस्मों के साथ-साथ रूह को भी लहूलुहान कर दिया है।”

वो देर शाम बारामूला वापस पहुंचे थे और आशीष तुरंत ही अपने काम में मशगूल हो गया था। अगले कुछ दिन उसकी ना तो फरीदा से कोई बात हुई और न शमीम ने उनका कुछ जिक्र किया।

फिर एक दिन अचानक फरीदा उसके दफ्तर में आ पहुंची थी। “माफ कीजिए सर। आपको पहले नहीं बताया। वो आज शहर में कुछ काम था तो सोचा आपसे भी मुलाकात कर लूं।”

फरीदा के इस तरह अकेले आने से आशीष थोड़ा सकपका सा गया था। 

“नहीं नहीं कोई बात नहीं। मैं सोच ही रहा था कि तंगधार से वापिस आने के बाद तुम से राब्ता ही नहीं हुआ।”

“कैसी हो? फैसल कैसा है? और मुजफ्फर को कोई काम मिला या नहीं?”

आशीष ने सवालों की झड़ी लगा दी थी लेकिन फरीदा चुप थी।

“अरे। अब ये अपनी खामोशी का रोजा तोड़ो और कुछ बोलो तो सही।” आशीष ने माहौल को हल्का करने की कोशिश की।

काफी देर चुप रहने के बाद फरीदा ने धीमे से कहा था।

“मुझे पाकिस्तान वापिस जाना है सर। प्लीज कुछ करें। अब यहां नहीं रह सकती।”

और इसी के साथ वो फूट-फूट कर रोने लगी।

“रोइए मत। प्लीज। ये लो थोड़ा पानी पी लो।”

“आप कैसे पाकिस्तान जाओगे। पासपोर्ट भी नहीं है। आपके मुल्क की एम्बेसी वाले तक आपको लेने को तैयार नहीं हैं। और ऐसे कितने परिवार हैं। आपको तो पता ही है। वैसे मैंने सुना है कि सरकार इस बारे में जल्द ही कुछ करने का विचार कर रही है।”

“मुझे नहीं पता सर। मुझे बॉर्डर से भेज दो। वहीं तंगधार से ही चली जाऊंगी । दरिया के पार।”

“अच्छा! और फैसल कैसे जाएगा?”

“ले जाऊंगी उसको भी। पीठ पर बांध कर। बस जाना है साहिब।”

“वाह फरीदा! बहुत समझदार हो ना। दोनों तरफ से गोलियां चलेंगी और तुम बेवजह मारी जाओगी।”

“जाना तो है साहिब। अब चाहे जान का खतरा ही क्यों न हो। ये जिल्लत की जिंदगी अब नहीं जी सकती। इतने सालों से कश्मीर के नाम पर लाशों की सियासत ही तो हो रही है। दो और लाशें गिर गईं तो क्या फरक पड़ता है।”

“पागल मत बनो फरीदा। अभी तुम घर जाओ। मुझे सोचने दो जरा।” आशीष ने उसे समझाते हुए कहा।

“कुछ करो साहिब। बस आप पर ही भरोसा है। हमारी नई जिंदगी की शुरुआत करा दो। अल्लाह आपको तरक्की देगा।”

आशीष को अब तक ऐसी मदद भरी गुजारिशों और दुआओं की आदत पड़ चुकी थी। और इस मामले में तो वो कर भी क्या सकता था।

“अच्छा। मुजफ्फर का क्या कहना है? वो भी वापिस जाना चाहता है क्या?”

आशीष के इस सवाल का फरीदा के पास कोई सीधा जवाब नहीं था।

“मुझे नहीं पता सर। मैंने उसके साथ निकाह कबूल किया। अपना सब कुछ छोड़कर यहां पर आई। अब मैं वापिस जाना चाहती हूं तो उसे भी मेरा साथ देना चाहिए। लेकिन वो ऐसा करेगा या नहीं, ये तो वक्त ही बताएगा। अभी तो उससे इस बारे में बात नहीं हुई।”

थोड़ी देर बाद फरीदा वापिस चली गई थी। आशीष भी उसके जाने के बाद अपना बाकी काम सिमटाने में लग गया था। फरीदा की मदद करने में उसे कुछ खास फायदा नजर नहीं आ रहा था। लेकिन उसे इस बात का जरूर अंदाजा था कि अगर फरीदा वापिस चली जाएगी तो कम से कम वहां पाकिस्तान में उसके पास एक ऐसा शख्स तैयार हो जाएगा जो वक्त-बेवक्त काम आ सकता है।

वक्त बीतता जा रहा था। फरीदा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। वो अक्सर आशीष को मदद की गुजारिश करती। आशीष भी कभी-कभार मुज्जफर की कुछ माली मदद करता लेकिन उसके पास उनको वापस भेजने का कोई जरिया नहीं था।

उस रात तकरीबन एक बजे होंगे जब आशीष के सरकारी फोन की घंटी जोर जोर से बजने लगी।

“अबे सो रहा है क्या?” आशीष के फोन उठाते ही दूसरी तरफ से ठहाकों भरी आवाज आई।

“अरे यार। तुझे आधी रात को ही मेरी याद आती है। पक्का दारू पी रहा होगा।” नींद में भी आशीष उस भारी आवाज को पहचान गया था।

मेजर गौतम उसका जिगरी यार था। दोनों ने एक साथ ट्रेनिंग तो की ही थी लेकिन ट्रेनिंग के बाद भी दोनों एक दूजे के साथ खासे जुड़े रहे थे। कुछ महीने पहले ही गौतम की यूनिट कश्मीर में आई थी। वो आजकल बारामूला से थोड़ी दूर बोनियार के इलाके में लाइन ऑफ कंट्रोल पर तैनात था।

“अरे दोस्त, कल श्रीनगर जा रहा हूं। कोई बकवास सी कॉन्फ्रेंस है। रास्ते में तेरे पास रुकूंगा। दोपहर तक पहुंचता हूं।”

“वाह! तुझसे मिले हुए बहुत दिन हो गए यार। सुन तू दोपहर को खाना मेरे साथ ही खाना। कल मिलते हैं। अब सोने दे।” आशीष ने तुरंत ही प्लान बना कर फोन रख दिया था।

अगले दिन दोनों बहुत गर्मजोशी से मिले थे। आशीष को पता था कि ठंडी बीयर और विल्स सिगरेट के बगैर गौतम को खाना हजम नहीं होगा। उसने सारा इंतजाम पहले ही कर लिया था।

“यार बड़ी बोरिंग सी जिंदगी है लाइन ऑफ कंट्रोल पर। हमारे इलाके से तो ज्यादा इंफिल्ट्रेशन भी नहीं होती लेकिन फिर भी पूरी रात पहरा तो देना पड़ता है। साले ये आतंकवादी भी पता नही कहां से घुसपैठ करने की कोशिश करने लगें। और ऊपर से आस-पास के गांव में रहने वाले। वैसे तो उनकी जरूरतें ही खत्म नहीं होती पर चलो इस बहाने उनकी मदद से अमन कायम रहता है हमारे इलाके में।”

गौतम जो कुछ बोल रहा था उस से आशीष बखूबी वाकिफ था पर वो कुछ कह कर गौतम के उत्साह को बीच में भंग नहीं करना चाहता था।

“अच्छा सुन यार। तेरे इलाके में बॉर्डर पर जो तार लगी है उसके आगे भी कुछ घर-बार है क्या? मतलब लोग रहते हैं क्या तार के दूसरी तरफ?” जब से गौतम ने लाइन ऑफ कंट्रोल की बात शुरू की थी तब से आशीष के दिमाग में यही सवाल घूम रहा था।

“हां हां, सात आठ घर हैं मेरी कंपनी के इलाके में। तार के उस तरफ और लाइन ऑफ कंट्रोल के इस तरफ। बड़ी परेशानी है यार उनको।”

“सामने पाकिस्तान की फौज है और पीछे हमारी। जब भी उनको कहीं जाना होता है तो हमारे चेक पोस्ट से निकल कर जाते हैं। कुछ बदमाश भी हैं उनमें। साले वहां से चरस हीरोइन लाकर इस तरफ बेचते हैं। अबे तुझे तो सब पता ही होगा। इतने सालों से यहां रगड़ा जो खा रहा है।”

“क्यों क्या हुआ। कुछ करना है क्या?” गौतम अपने दोस्त को इतना तो पहचानता था कि उसने ऐसे सवाल के पीछे उसकी कुछ गहरी सोच का अंदाजा लगा लिया था।

“हां। एक लड़की को पार भेजना है।” आशीष ने जैसे ही ये कहा तो गौतम ने अपने होठों से सिगरेट निकाल कर जमीन पर पटक दी और तिलमिलाते हुए बोला।

“अबे। पागल है क्या?”

“अरे इसमें इतना घबराने वाली क्या बात है। और तूने ये जो सिगरेट इतनी नौटंकी के साथ फेंकी है ना वो वैसे भी खत्म होने वाली थी।”

आशीष के ये कहते ही दोनों ठहाके मार कर हंसने लगे थे।

गौतम के आने से आशीष को फरीदा के लिए आशा की एक किरण नजर आई थी। उसके दिमाग में जो तरकीब थी उसको सिर्फ गौतम की मदद से पूरा किया जा सकता था। गौतम न सिर्फ एक उम्दा अफसर था बल्कि एक आला दर्जे का इंसान भी था। और आशीष को यह भी भरोसा था कि गौतम उसके कहे अनुसार आंख मूंद कर कुछ भी करने को तैयार हो जाएगा।

हालांकि, वो अब भी इस कश्मकश में था कि फरीदा की वो क्यों इस तरह मदद करे और वो भी ऐसी मदद जिसमें उसके परिवार की जान भी जा सकती थी। उसने ये तय किया कि वो इसका फैसला फरीदा और मुज्जफर पर छोड़ देगा। और तब तक इस विषय में कोई बात नहीं करेगा जब तक वो उस से वापस जाने की जिद न करें।

आशीष को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा था। कुछ हफ्तों बाद ही फरीदा दोबारा उसके पास आकर वापस पाकिस्तान जाने का रोना रोने लगी थी। पर इस बार आशीष तैयार था। अपने बनाए हुए प्लान के साथ।

लेकिन जब फरीदा ने उसे ये बताया कि मुज्जफर ने वापस जाने से मना कर दिया है तो आशीष फिर सोच में पड़ गया था। फरीदा को इस तरह अपने पति की मर्जी के बगैर भेजना न सिर्फ गलत था बल्कि इससे भविष्य में कुछ कानूनी पेचीदगी भी हो सकती थी। और वैसे भी इस बारे में उसने अपने किसी उच्च अधिकारी से कोई रजामंदी नहीं ली थी।

“देखो फरीदा। मुज्जफर को तो मैं पार भिजवा नहीं सकता और बिना मुज्जफर के जाना ठीक नहीं है। रास्ते में भी खतरा है। फिर फैसल भी तो साथ में होगा। तुम दोनों को कुछ हो गया तो खुदा मुझे कभी माफ नहीं करेगा।”

“आप मुतमईन रहो साहिब। मुझे आप बस ये बताओ कि करना क्या है। मुझे मुजफ्फर के बगैर जाना कबूल है।”

फरीदा की बातों में दृढ़ता साफ झलक रही थी।

“ठीक है अगर तुम नहीं मानती तो सुनो। यहां से थोड़ी दूर बोनियार के इलाके में कुछ घर लाइन ऑफ कंट्रोल पर लगी तार से आगे बसे हुए हैं। उस तरफ जाने के लिए चेक पोस्ट के गेट से जाना होता है। तुम्हें और फैसल को मैं वो चेक पोस्ट पार करा दूंगा । लेकिन उसके आगे तुम्हें खुद जाना होगा। मेरा एक दोस्त है जो पक्का कर लेगा कि हमारी फौज की तरफ से कुछ कार्यवाही नहीं हो। लेकिन अगर पाकिस्तान आर्मी की तरफ से कोई हरकत हुई तो मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है।”

“समझ गई सर। अगर आप इजाजत दो तो मैं उस तरफ अपने घर वालों को बुला लूं। वो वहां से मुझे ले लेंगे। मेरे वालिद साहिब सरकारी मुलाजिम हैं तो कोई न कोई जान पहचान निकाल ही लेंगे।

“ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी। और सुनो आज के बाद मुझसे कोई बात नहीं करना। अगले महीने की सताइस तारीख को मुझे नए पुल वाले मोड़ पर मिलना। शाम को ठीक चार बजे। और हां, तुम बुर्का पहन कर रखना उस दिन।”

“ठीक है साहिब। लेकिन अभी तो पूरा एक महीना है। अगर बीच में कुछ जरूरत पड़ी तो आपसे कैसे बात करूंगी?” फरीदा को ये सब कुछ अजीब लग रहा था।

“अगर कुछ बात करनी हो तो मुज्जफर के फोन से ही करना। तुम्हारे जाने के बाद वो परेशान होगा और उसका शक हम पर ही जाएगा। ऐसे में मैं नहीं चाहता कि किसी तरह का कोई सबूत उसके पास हो।” आशीष ने उसे समझाया।

“कमाल है। बहुत दूर की सोचते हो आप। लेकिन आपने अब तक ये नहीं बताया कि मेरे लिए ये सब कुछ क्यों कर रहे हो। इतनी तो समझ मुझ में भी है साहिब।”

फरीदा के इस सवाल पर हमेशा हाजिर जवाब रहने वाले आशीष को कुछ खास नहीं सूझा था।

“ऐसे ही। मुझे लगा कि तुम्हारी और फैसल की मदद करनी चाहिए। जब तुम वहां जाओगी तो क्या पता हमारे कुछ काम आ सको। बस इसलिए।”

“जानती हूं साहिब। आपका एहसान चुकाने का अगर मौका मिला तो जरूर पूरी कोशिश करूंगी।” जाते वक्त फरीदा ने ये कहकर आशीष की दुविधा थोड़ी कम कर दी थी।

फरीदा के लिए अगला एक महीना कई सालों जितना लम्बा था। उसने आशीष के समझाए अनुसार मुज्जाफारबाद में अपने वालिद साहिब को विश्वास दिला दिया था कि वो बॉर्डर तक सकुशल आ सकती है। वो शुरू में तो घबराए थे लेकिन फिर आश्वस्त हो गए थे। इस सबसे बेखबर मुज्जफर अपने काम की तलाश में लगा रहा था। फरीदा ने उससे एक दो बार वापस जाने की कोशिश करने के लिए बोला तो उसने साफ मना कर दिया था। पाकिस्तान उसके लिए जैसे एक खराब सपना था जिसे वो दोबारा नहीं जीना चाहता था।

इधर आशीष ने गौतम को अपना प्लान समझा दिया था। रोज तार के आगे रहने वाले लोग अपना शिनाख्ती कार्ड चेकपोस्ट पर दिखा कर अपने घर जाते थे। बाकी किसी को जाने की इजाजत नहीं थी। गौतम को बस यह करना था कि उस दिन अपने सिपाहियों को फरीदा और फैसल को तार से आगे जाने की इजाजत दिलवानी थी। फरीदा ने चेकपोस्ट पर ये बोलना था कि वो अपने रिश्तेदार से मिलने जा रहे हैं और थोड़ी देर में वापस आ जाएंगे।

सब कुछ तय था लेकिन जाने से एक हफ्ता पहले फरीदा ने आशीष से राब्ता किया था। सॉरी सर। वो मुझे लगता है कि मुज्जफर भी हमारे साथ जाना चाहता है।

“क्या। वो तो पहले तैयार नहीं था। तुमने उसको बता दिया क्या सब कुछ। बस मुझे यही डर था।” आशीष की आवाज में जरा सा गुस्सा शामिल था।

“नहीं नहीं साहिब। मैंने उसे कुछ नहीं बताया। लेकिन वो कह रहा था कि अगर कुछ तरीका मिल जाए तो हम सब वापस लौट सकते हैं। जब मैंने उसे कहा कि बगैर पासपोर्ट कैसे जाएंगे तो कहने लगा कि बॉर्डर क्रॉस करके जा तो सकते हैं लेकिन उसमें बहुत खतरा है। तभी मैंने सोचा कि आपसे पूछूं कि क्या हम उसको भी साथ ले जा सकते हैं?”

“देखो फरीदा। तुम्हें वापिस भेजने के लिए मैंने बहुत जोखिम मोल लिया है। अपने डिपार्टमेंट में भी किसी को कुछ नहीं बताया। ये जो मैं कर रहा हूं वो सरकारी लिहाज से शायद मुनासिब भी नहीं है। अब अगर इसमें मुज्जफर भी जाएगा तो मेरे खुद के लिए ये ठीक नहीं है। तुम्हें पार भेजना अलग बात है लेकिन एक कश्मीरी को बॉर्डर पार कराने के कुछ अलग मायने हैं। चेकपोस्ट से एक लड़की और बच्चा तो किसी बहाने से निकल कर जा सकते हैं लेकिन एक कश्मीरी युवक वो भी एक पुराना आतंकी कैसे चला गया। इसका जवाब देना मेरे और मेरे दोस्त के लिए मुश्किल हो जाएगा।”

फरीदा आशीष की बात चुपचाप सुन रही थी। “देखो मैंने तुमसे पहले ही पूछा था। और तुमने कहा था कि तुम तैयार हो। अगर मुज्जफर को साथ ले जाने की बात है तो मेरी मानो यहीं रहो। मेरे लिए भी तो अच्छा है कि ये सब छुपकर जुगाड़ नहीं करना पड़ेगा।”

“साहिब। कुछ समझ नहीं आ रहा।” फरीदा ने बड़ी मायूसी से फोन काट दिया था। सताइस तारीख को बताए हुए वक्त पर आशीष अपनी सफेद रंग की स्कॉर्पियो गाड़ी लेकर नए पुल वाले मोड़पर पहुंच गया।

उसको लगा था कि फरीदा नहीं आएगी क्योंकि उसे शायद इस तरह सब कुछ छोड़कर वापस जाना कबूल नहीं होगा। पर वो फिर भी तैयार था उसने सोचा कि थोड़ी देर इंतजार करने के बाद वो वापस दफ्तर आ जाएगा। और फिर गौतम को प्लान रद्द करने की इतिल्ला कर देगा।

लेकिन उसके वहां पहुंचने के कुछ मिनटों में ही काला बुर्का पहने फरीदा चुपचाप गाड़ी में आकर बैठ गई थी। साथ ही नन्हा फैसल उछल के आशीष की गोद में कूद पड़ा था। उसने फरीदा और फैसल को चेक पोस्ट के थोड़ा पहले उतार दिया था। जाते वक्त फरीदा ने नम आंखों से आशीष की ओर देखा और फिर किसी तरह खुद को आशीष के गले लगने से रोक लिया। आशीष तब तक वहीं रुका रहा था जब तक वो दोनों आंखों से ओझल नहीं हो गए। फिर उसने मन ही मन में उनकी सलामती की दुआ की और वापस बारामूला आ गया।

कुछ दिनों बाद शमीम आशीष के पास आया था। ये खबर लेकर कि फरीदा कई दिनों से स्कूल नहीं आई और पता नहीं कैसे अपने बेटे को साथ लेकर वापस मुज्जफराबाद पहुंच गई।

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