हिंदी सिनेमा और रंगमंच की दुनिया के इतिहास पुरुष हैं पृथ्वीराज कपूर

साल 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘आसमान महल’ में पृथ्वीराज ने अपने सिने कैरियर की एक और ना भूलने वाली भूमिका निभाई। इसके बाद साल 1968 में प्रदर्शित फिल्म तीन “बहू रानियां” में पृथ्वीराज ने परिवार के मुखिया की भूमिका निभाई जो अपनी बहू रानियों को सच्चाई की राह पर चलने के लिए प्रेरित करता है।

Prithviraj Kapoor

Prithviraj Kapoor Death Anniversary

पृथ्वीराज कपूर (Prithviraj Kapoor) का नाम एक ऐसे अभिनेता के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने अपनी कड़क आवाज, रोबदार भाव भंगिमाओं और दमदार अभिनय के बल पर लगभग 4 दशकों तक सिने दर्शकों के दिलों पर राज किया। पृथ्वीराज कपूर (Prithviraj Kapoor) 1928 में मुंबई में इंपीरियल फिल्म कंपनी से जुड़े थे। साल 1930 में बीपी मिश्रा के फिल्म ‘सिनेमा गर्ल’ में उन्होंने एक्टिंग किया। इसके कुछ समय पश्चात एंडरसन की थिएटर कंपनी के नाटक ‘शेक्सपियर’ में भी उन्होंने एक्टिंग की। लगभग 2 साल तक फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष करने के बाद पृथ्वीराज को साल 1931 में प्रदर्शित फिल्म ‘आलम आरा’ में सहायक अभिनेता के रूप में काम करने का मौका मिला।

पृश्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को पाकिस्तान के  समुन्दरी नामक गांव में हुआ था। पृथ्वीराज के पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर पुलिस विभाग में सब इंस्पेक्टर के रूप में कार्यरत थे। पृथ्वीराज ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लयालपुर और लाहौर में रहकर पूरी की। कुछ दिनों के बाद उनके पिता का तबादला पेशावर हो गया। पृथ्वीराज ने अपनी आगे की पढ़ाई पेशावर के एडवर्ड कॉलेज से की। साथ ही उन्होंने 1 साल तक कानून की पढ़ाई भी की, लेकिन बीच में ही उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी क्योंकि उस समय तक उनका रुझान थिएटर की ओर हो गया था। महज 18 साल की उम्र में ही उनका विवाह हो गया और 1928 की सर्दियों में वह अपने तीन बच्चों को पत्नी के पास छोड़कर अपनी चाची से आर्थिक सहायता लेकर पेशावर से अपने सपनों के शहर मुंबई पहुंचे। 

Prithviraj Kapoor

साल 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ बनी, जिसमें पृथ्वीराज ने किरदार निभाया। साल 1933 में पृथ्वीराज कपूर (Prithviraj Kapoor) कोलकाता के मशहूर ‘न्यू थियेटर’ के साथ जुड़े। साल 1933 में प्रदर्शित फिल्म ‘राज रानी’  और साल 1934 में देवकी बोस की फिल्म ‘सीता’ की कामयाबी के बाद बतौर अभिनेता पृथ्वीराज अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। इसके बाद पृथ्वीराज ने न्यू थियेटर निर्मित कई फिल्मों में अभिनय किया। इन फिल्मों में ‘मंजिल’ (1936) और ‘प्रेसिडेंट’ (1937) जैसी फिल्में शामिल हैं। साल 1937 में प्रदर्शित फिल्म ‘विद्यापति’ में पृथ्वीराज के अभिनय को दर्शकों ने काफी सराहा। साल 1938 में चंदूलाल शाह के ‘रणजीत मूवीटोन’ के लिए पृथ्वीराज अनुबंधित किए गए। ‘रंजीत मूवी’ के बैनर तले साल 1940 में प्रदर्शित फिल्म ‘पागल’ में पृथ्वीराज कपूर (Prithviraj Kapoor) ने अपने सिने करियर में पहली बार एंटी हीरो की भूमिका निभाई। इसके बाद साल 1941 में सोहराब मोदी की फिल्म ‘सिकंदर’ की सफलता के बाद पृथ्वीराज कामयाबी के शिखर पर जा पहुंचे। साल 1944 में पृथ्वीराज कपूर (Prithviraj Kapoor) ने अपनी सारी जमा पूंजी लगाकर खुद की थिएटर कंपनी ‘पृथ्वी थिएटर’ की शुरुआत की। 16 साल में ‘पृथ्वी थिएटर’ के 2662 शो हुए, जिनमें पृथ्वीराज ने लगभग सभी शो में मुख्य किरदार निभाया। पृथ्वीराज थिएटर में उन्होंने आधुनिक और शहरी विचारधारा का इस्तेमाल किया जो उस समय के फारसी और परंपरागत थियेटरों से काफी अलग था। वह शो एक दिन के अंतराल पर नियमित रूप से होता था।

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एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनसे विदेश में जा रहे सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल का प्रतिनिधित्व करने की पेशकश की। लेकिन पृथ्वीराज ने नेहरू जी से यह कहकर उनकी पेशकश नामंजूर कर दी कि थिएटर के काम को छोड़कर वह विदेश नहीं जा सकते। ‘पृथ्वी थिएटर’ के बहुत चर्चित कुछ प्रमुख नाटकों में ‘दीवार’, ‘पठान’, ‘गदर’ और ‘पैसा’ शामिल है ।

पृथ्वीराज ने अपने थिएटर के जरिए कई छुपी हुई प्रतिभा को आगे बढ़ाने का मौका दिया, जिनमें रामानंद सागर और शंकर जयकिशन जैसे बड़े नाम शामिल हैं। धीरे-धीरे दर्शकों का ध्यान थिएटर की ओर से हट गया क्योंकि उन दिनों दर्शकों के ऊपर रुपहले पर्दे का क्रेज कुछ ज्यादा ही हावी हो चला था। ‘पृथ्वी थिएटर’ के प्रति पृथ्वीराज इस कदर समर्पित थे कि तबीयत खराब  होने के बावजूद भी वह हर शो में हिस्सा लिया करते थे। ‘विद्यापति’, ‘सिकंदर’, ‘दहेज’, ‘आवारा’, ‘जिंदगी’, ‘आसमान महल’, ‘तीन बहुरानियां’ आदि फिल्में आज भी पृथ्वीराज के अभिनय की वजह से यादगार मानी जाती हैं।

50 के दशक में पृथ्वीराज कपूर (Prithviraj Kapoor) की जो फिल्में प्रदर्शित हुई उनमें शांताराम की ‘दहेज’ के साथ ही उनके पुत्र राज कपूर निर्मित फिल्म ‘आवारा’ प्रमुख है। फिल्म ‘आवारा’ में पृथ्वीराज ने अपने पुत्र राज कपूर के साथ अपने किया। साठ का दशक आते-आते पृथ्वीराज कपूर (Prithviraj Kapoor) ने फिल्मों में काम करना काफी कम कर दिया। इस दौरान उनकी ‘मुग़ल-ए-आज़म’, ‘हरिश्चंद्र तारामती’, ‘सिकंदर-ए-आजम’, ‘आसमान महल’ जैसी कुछ सफल फिल्में प्रदर्शित हुई। साल 1960 में प्रदर्शित के आशिक की ‘मुग़ल-ए-आज़म’ में उनके सामने अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे, इसके बावजूद पृथ्वीराज कपूर (Prithviraj Kapoor) अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे। “मुग़ल-ए-आज़म” में इस कलाकार ने बेटे के मोह में उलझे शहंशाह जलालुद्दीन अकबर के किरदार को अमर कर दिया।

पृथ्वीराज का अभिनय दिन-पर-दिन निखरता गया और हिंदी सिनेमा शैशवकाल से युवावस्था की ओर अग्रसर हो गया। ‘आवारा’ फिल्म पृथ्वीराज के पुत्र और हिंदी सिने जगत के सबसे बड़े शोमैन राज कपूर ने बनाई थी, जिसे उनकी बेहतरीन फिल्म माना जाता है। पिता पुत्र के रिश्तों का तनाव दर्शाने वाली यह फिल्म पूरे एशिया में सराही गई और पश्चिम एशिया के बॉक्स ऑफिस के रिकॉर्ड को भी तोड़े। रूस में ये फिल्म आज भी बॉलीवुड की पहचान बनी हुई है और लोग आज भी हिंदी गीत के नाम पर ‘आवारा हूं’ गुनगुनाते हैं।

साल 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘आसमान महल’ में पृथ्वीराज ने अपने सिने कैरियर की एक और ना भूलने वाली भूमिका निभाई। इसके बाद साल 1968 में प्रदर्शित फिल्म तीन “बहू रानियां” में पृथ्वीराज ने परिवार के मुखिया की भूमिका निभाई जो अपनी बहू रानियों को सच्चाई की राह पर चलने के लिए प्रेरित करता है। इसके साथ ही अपने पुत्र रणधीर कपूर की फिल्म ‘कल आज और कल’ में भी पृथ्वीराज कपूर (Prithviraj Kapoor) ने यादगार भूमिका निभाई। साल 1969 में पृथ्वीराज कपूर (Prithviraj Kapoor) ने पंजाबी फिल्म ‘नानक नाम जहाज’ है में भी अभिनय किया। फिल्म की सफलता ने लगभग गुमनामी में आ चुकी पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री को एक नया जीवन दिया। फिल्म इंडस्ट्री में उनके महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए पृथ्वीराज साल साल 1969 में भारत सरकार द्वारा पदम विभूषण से सम्मानित किए गए। 3 नवंबर को पंजाब के लालपुर शहर में जन्मे महान अभिनेता पृथ्वीराज कपूर (Prithviraj Kapoor) कैंसर के कारण 29 मई 1972 को इस दुनिया से रुखसत हो गए।

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