कुदरत का करिश्मा हैं वहीदा रहमान, जिनके प्यार में पागल होकर गुरुदत्त ने दे दी थी जान

Waheeda Rehman

किसी भी इंसान के अंतरंग में झांकने के लिए या फिर व्यक्तित्व से परिचित होने के लिए उसके हमसायों, हमराहियों की राय बहुत अहम होती हैं। अमिताभ बच्चन अपने अभिनय कौशल पर प्रभाव डालने वाली दो हस्तियों का जिक्र करते हैं: एक वहीदा रहमान (Waheeda Rehman) और दूसरे दिलीप कुमार। उनका कहना है, ‘मेरी नजर में वो सर्वोत्तम अभिनेत्री हैं। उनके चेहरे पर एक निर्दोष मासूमियत, स्त्री सुलभ लावण्य और भारतीयता है। उनके सौंदर्य को आसानी से परिभाषित नहीं किया जा सकता।’

Waheeda Rehman

ऋतुपर्ण घोष के अनुसार, ‘वह इतनी सुंदर हैं कि उसकी खासयित को अलग से बताना मुश्किल है। पर्दे पर उसकी उपस्थिति बोलती है। उसका चेहरा रहस्य-भरा है, पर मैं उसको हल नहीं करना चाहूंगा, क्योंकि इससे वह खूबसूरती चली जाएगी’।

स्व. वासु भट्टाचार्य की पत्नी रिंकी के पास तीसरी कसम की बहुत प्यारी यादें हैं। उन दिनों वहीदा फिल्म जगत पर राज कर रही थीं, फिर भी मैने उसे हमेशा सुशील और सहज पाया। वह अन्तर्मुखी है। गुरुदत्त के साथ संबंधों में भी वह बहुत संयमित रहीं। अपने आप में मग्न रहते हुए- तीसरी कसम के दौरान बड़ी चतुराई से वह राजकपूर के शैतानी-भरे आमंत्रणों को टालती रहती थीं।’ मिथुन चक्रवर्ती उनके सौंदर्य से अभिभूत होकर उन्हें दिल दे बैठे थे। आज के सितारे संजय दत्त बचपन में उनसे शादी करना चाहते थे। अभिषेक बच्चन वहीदा रहमान (Waheeda Rehman) के साथ ‘समर ऑफ 42’ करना चाहते थे।

ऐसी सबदिल अजीज शख्सियत का जन्म चेन्नई (मद्रास) के पास चेनलपट्टू में 3 फरवरी 1933 को एक शिक्षित मुसलिम परिवार में हुआ था। वहीदा का सारा बचपन में मद्रास में ही गुजरा। चार बहनों के साये में पलकर बड़ी हुईं, भाई कोई था नहीं। इसीलिए घर में वो सबकी बड़ी लाड़ली-दुलारी थीं। वहीदा के पिता म्यूनिसिपल कमिश्नर थे, इस वजह से ट्रेवलिंग बहुत होती थी यानि हर तीन साल बाद तबादला। एकदम खानाबदोश जिंदगी थी उनकी। पिता के तबादलों की वजह से उनकी औपचारिक शिक्षा में बड़ी दिक्कतें आईं। कहीं भाषा का अंतर आता, कहीं समय का। बचपन में वो बहुत बीमार भी रहती थीं इसलिए कक्षाओं में हाजिरी का मौका कम ही मिलता था, लेकिन नृत्य और संगीत का शौक उनके सिर चढ़कर बोलने लगा था। उन्हें जब भी अवसर मिलता, वो शीशे के सामने बैठकर तरह-तरह की शक्लें बनाया करती थीं। सब उन्हें छेड़ते कि एक दिन वो पागल हो जाएगी शीशे में अपनी शक्लें देख-देखकर। तब वहीदा उनसे कहतीं, नहीं जी, ऐसा नहीं होगा। एक दिन ऐसा आएगा कि मैं हंसूंगी तो लोग हंसेंगे और रोउंगी तो मेरे साथ रोएंगे। ये बातें खुद उनको भी नहीं पता थी कि बचपन में कहीं उनकी ये बातें बड़े होकर सच साबित हो जाएंगी।

Waheeda Rehman

नौ-दस साल ही होते-होते वहीदा ने भरतनाट्यम सीखना शुरू कर दिया। एक जगह रहकर विधिवत् प्रशिक्षण तो पिता के तबादलों की वजह से मुमकिन नहीं था, लेकिन कक्षाओं के समय के बंधन का सवाल भी नहीं था। नृत्य-शिक्षक निजी तौर पर सिखाते और अभ्यास कराते। तबादला होता तो वो भी साथ जाते।

सीखते-सीखते पावों की थिरकन लयबद्ध हो गई तो अपनी कला दूसरों की दिखाने की तमन्ना जागी। हर कलाकार के साथ ऐसा होता है। कला साधने लगती है तो कलाकार को तब तक तसल्ली नहीं मिलती जब तक दूसरों के सामने उसकी नुमाइश ने करे। सामने वालों पर अपनी कला का असर देखकर ही उसे अहसास होता है कि उसका हुनर किन बुलंदियों तक परवान चढ़ा है।    

नृत्य से वहीदा को मिली पहली ख्याति

नन्ही वहीदा के अंतस में पनपने वाली इस अभिलाषा की पूर्ति का रास्ता शुरू हुआ मंच पर नृत्य प्रदर्शन के कार्यक्रमों में। कभी दान एकत्र करने के लिए होने वाले किसी कार्यक्रम में नृत्य तो कभी किसी बड़े आदमी के आने पर उसके स्वागत में होने वाले कार्यक्रम में। इनमें सबसे यादगार कार्यक्रम रहा राजाजी के सामने नृत्य। राजाजी यानि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, तत्कालिन भारत के गवर्नर-जनरल। उस वक्त वहीदा के पिताजी विजयवाड़ा (आंध्र प्रदेश) में तैनात थे।

राजादी के दौरे के कार्यक्रम बनाने वालों ने स्वागत समारोह में एम. एस. सुब्बूलक्ष्मी के गायन का समावेश रखा था, लेकिन राजाजी के निजी सहायक का संदेश आया कि गलत बात है। वहां जो स्थानीय कलाकार हों, उन्हीं का कार्यक्रम रखें। लिहाजा स्थानीय कलाकारों की खोजबीन शुरू हुई। तभी किसी ने रहमान साहब से कहा, रहमान साहब, आपकी लड़कियां भी नृत्य करती हैं। रहमान साहब ने कुछ देर तो हीला-हवाला दिया, फिर तैयार हो गए कि समारोह में उनकी बेटियों के नृत्य का कार्यक्रम शामिल कर लिया जाए।

रहमान साहब ने घर आकर खबर दी तो वहीदा खुशी से उछल पड़ी। इतनी बड़ी हस्ती के सामने अपनी कला के प्रदर्शन का मौका। उसने अपनी बहन सईदा के साथ मन लगाकर मेहनत से अभ्यास किया और जोर-शोर से तैयारी की।

नृत्य देखकर राजाजी मुग्ध हो गए। रहमान साहब उनसे साथ ही बैठे थे। राजाजी ने उनसे कहा, इनके नाम मेरी समझ में नहीं आ रहे- वहीदा रहमान (Waheeda Rehman), सईदा रहमान। और कर रही हैं भरतनाट्यम। अभिनय भी बहुत अच्छा कर रही हैं, कैसे? रहमान साहब ने बताया, ये मेरी लड़कियां हैं। नृत्य की बड़ी शौकीन हैं। राजाजी बोले, अगर मुसलमान लड़िकयां हैं तो सचमुच बहुत कमाल की बात है। राजाजी ने उस दिन बहुत मुबारकबाद दी और दिल खोलकर तारीफ की रहमान बहनों की प्रतिभा की और रहमान साहब से बोले, इन्हें आगे बढ़ने से नहीं रोकना। यह मत सोचना कि आप अफसर हैं, इसलिए लड़िकयों को किसी व्यवसाय में डालने की जरूरत नहीं है। यह तो कला है। लड़कियां जितना अभ्यास करना चाहें, करने देना। जितना बढ़ना चाहें, बढ़ने देना।

राजाजी का आशीर्वाद पाकर वहीदा को जैसे मन की मुराद मिल गई थी। वह पूरे मनोयोग से नृत्य के अभ्यास में जुट गईं। दो-चार कार्यक्रमों में और नृत्य पेश किए कि मद्रास से फिल्मों में नृत्य करने का प्रस्ताव आ गया। फिल्म बनाने वालों ने नृत्य मंच पर उसे देखकर ही भांप लिया था कि लड़की में असीमित संभावनाएं मौजूद हैं।

Waheeda Rehman

सन 1951 के उन दिनों में वहीदा कुल बारह-तेरह साल कि किशोरी थी। दुर्भाग्य से उनके पिताजी को बुखार आया और वे इस दुनिया से विदा हो गए। पिता के गुजरने के बाद वहीदा ने नृत्य का अभ्यास छोड़ दिया और उनका पूरा परिवार विजयवाड़ा में ही बस गया। इस तरह रहते हुए मुश्किल से दो साल का अरसा बीत पाया ही था कि एक दिन एक साहब उनके घर आ धमके। कहने लगे, हम चाहते हैं वहीदा हमारी फिल्म में नृत्य करें। उन साहब की वहीदा के पिताजी से कुछ जान-पहचान रही थी लेकिन मां ने मना कर दिया। बोलीं, अभी हिम्मत नहीं। फिल्म में जाना तो बहुत बड़ी बात है। जब वे मौजूद थे तो और बात थी। अब मैं अकेली हूं, डर लगता है। उन साहब ने समझाया, वहीदा मंच पर तो नृत्य करती हैं, फिल्म में करेंगी तो क्या फर्क पड़ता है। वहीदा को सहारा मिला। वह मां के पीछे पड़ गई कि इजाजत दे दें। मां ने कहा, नहीं, अभी तुम्हारी शादी करनी है। वहीदा ने कहा, “अभी कोई सिलसिला तो है नहीं शादी का। वक्त आएगा तो वह भी हो जाएगी। रहा सवाल लोगों के कुछ कहने का, तो वे कुछ दिन बोलते हैं, फिर चुप हो जाते हैं। एक बार काम करने तो दो,’’ और आखिरकार मां ने थक-हारकर इजाजत दे ही दिया।

वहीदा की पहली फिल्म थी तुलुगु में बनी ‘रोजरुमलई’ यानि परिवर्तन का दिन। इस फिल्म में वहीदा का नृत्य दर्शकों को बहुत पसंद आया। इतना कि उन्हें खुश करने के लिए सिनेमा वाले मध्यांतर के पहले आने वाला उसके नृत्य का हिस्सा फिल्म के अंत में दोबारा चलाते। वहीदा को यह खबर मिली तो यकीन नहीं आया। ऐसा कहीं होता है? लेकिन जब फिल्म के सौ दिन पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित प्रदर्शनी में उसने अपनी आंखों से देखा तो यकीन न करने की कोई वजह न रह गई थी।

गुरुदत्त की पारखी नजरों ने वहीदा के कौशल को पहचाना

फिल्म के सौ दिन पूरे होने का समारोह हैदराबाद में चल रहा था कि इसी बीच निर्माता-निर्दशक गुरुदत्त वहां पहुंचे। उन्हें बताया गया कि फिल्म में एक नई लड़की का नृत्य है जो इतना लोकप्रिय हो रहा है कि वैसा बहुत कम ही होता है। गुरुदत्त जी ने पूछताछ की तो पता चला कि वहीदा हिंदुस्तानी बोल लेती हैं। वे अपनी नई फिल्म के लिए लड़की की तलाश में थे। उन्होंने वहीदा से मिलने की पहल की। वहीदा उस समय फिल्म के वितरक की मेहमान थीं। वितरक ने मुलाकात कराई। गुरुदत्त की पारखी नजरों ने वहीदा में छिपी संभावनाएं देख लीं और प्रस्ताव रख दिया, बंबई चली आइए! हम आपसे तीन साल का करार करना चाहते हैं। वहीदा जी हिंदी फिल्मों और बंबई से अनजान थीं, लिहाजा उन्होंने फैसला मां पर छोड़ा। बंबई बहुत दूर थी और वहां पर कोई जान-पहचान का भी नहीं था। इसलिए मां ने कह दिया, सोचकर बनाएंगे। इसके बाद वहीदा का परिवार मद्रास चला गया। लेकिन गुरुदत्त के प्रस्ताव पर परिवार में अकसर विचार होने लगा।

दो महीने बाद ही गुरुदत्त जी का आदमी आ गया संदेश लेकर कि आप लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया। हम दो फिल्में शुरू कर रहे हैं। आप बंबई आएं तो काम आगे बढ़े। गुरुदत्त के इस संदेश ने पूरे परिवार में कई प्रकार की उलझने पैदा कर दी और आखिरकार वहीदा के थिरकते पाँव बंबई के लिए चल पड़े, हिंदी फिल्मों के रुपहले पर्दे पर कला का एक नया चेहरा पेश करने के लिए।

हिंदी फिल्मों में वहीदा का प्रवेश

वहीदा उस समय नाबालिग थीं। फिल्म के अनुबंध पर उनकी मां को हस्ताक्षर करने पड़े। पर उससे पहले वहीदा ने दो शर्तें रखीं। वह कपड़े अपनी मर्जी के पहनेगी। फिल्म में दृश्य और चरित्र के अनुसार कॉस्ट्यूम डिजाइन किए जाते हैं। किसी किशोरी अभिनेत्री की और से पहली फिल्म के लिए ही रखी गई शर्तें-साहस का काम था। इसी के साथ नाम बदलने का सुझाव डायरेक्टर की ओर से था। दोनों मुद्दों पर बहुत बहस हुई। यूनिट के तमाम लोग दबाव डाल रहे थे। उस समय जितने भी मुसलमान कलाकार थे सब के नाम बदले गए थे, जैसे नर्गिस, मानी कुमारी, मधुबाला, दिलीप कुमार। फिर वहीदा रहमान (Waheeda Rehman) बहुत लंबा नाम था। वहीदा ने कहा था, रहमान मेरे पिता का नाम है, सिर्फ वहीदा कहा जा सकता है। फिर हुज्जत हुई, नाम सेक्सी नहीं हैं। वहीदा आज भी हैरान होकर पूछती हैं, नाम भी सेक्सी होते हैं? खैर गुरुदत्त ने अपनी नई नायिका का बराबर का मान रखा और वहीदा शब्द के अर्थ- लासानी, लाजवाब, अल्लाह का करिश्मा आगे आने वाले समय में सार्थक हुए।

और जब सी.आई.डी. रिलीज हुई तो तहलका मच गया। बनाया गया था अपराध चित्र, हत्या का नाटक और उभरकर आया संगीत का जादू। गुरुदत्त के साथ-साथ ओ. पी. नैय्यर भी पहली कतार के कामयाब फनकारों में गिने जाने लगे। महमूद के रूप में एक नया कलाकार सामने आया जिसने आगे चलकर हास्य अभिनेता के रूप में बरसों अपना सिक्का चलाया। और एक नई भाव-प्रवण कुशल अभिनेत्री से हुई हिंदी दर्शकों की पहचान- जो थीं वहिदा रहमान।

सी.आई.डी के बाद वहीदा की दूसरी फिल्म थी प्यासा। प्यासा के निर्माण के समय कोई विशेष बात नहीं हुई, सिवा इसके कि गुरुदत्त और बर्मन दा सहित सभी लोगों का ख्याल था कि फिल्म नहीं चलेगी, क्योंकि ये जरूरत से ज्यादा गंभीर हो गई है। वे असमंजस में थे कि फिल्म प्रदर्शित करनें या ज्यादा गंभीर हिस्से अलग कर दोबारा शूटिंग करें। इसके विपरित वहीदा जी का कहना था कि फिल्म कामयाबी के झंडे गाड़ देगी। पहले तो लोगों ने वहीदा की बातों का मजाक माना, लेकिन वो अपनी बात पर जब अड़ गईं तो गुरुदत्त साहब ने कहा, आप सबसे छोटी हैं, हम आपकी बात मान लेते हैं। बाद में जब प्यासा ने धूम मचाई तो लोगों ने माना कि वहीदा का अनुभव चाहे ज्यादा न हो, पर वह कहती वहीं हैं जो वह दिल से महसूस करती हैं।

प्यासा के बाद वहीदा रहमान (Waheeda Rehman) दूसरे निर्माताओं की फिल्मों में भी काम करने लगीं। उसके बाद गुरुदत्त के साथ उनकी तीन और फिल्में आईं- चौदहवीं का चाँद, कागज के फूल, साहब, बीवी और गुलाम। कागज के फूल अत्यंत उत्कृष्ट रचना होते हुए भी व्यावसायिक दृष्टि से सफल न हो सकी। अन्य दो फिल्में अत्यंत सफल रहीं।

Waheeda Rehman

गुरुदत्त और वहीदा रहमान (Waheeda Rehman) के 5-6 साल के संबंध ने उन्हें एक ऐसे संबंध सूत्र में बांधा जिससे दोनों की कला का विकास अंतिम शिखर तक पहुंचा। प्यासा और कागज के फूल के नायक की भूमिका को गुरुदत्त असल जिंदगी में जीने लगे थे। उन्हें एक निर्दोष पूर्णता की तलाथ थी- फिल्मों में भी और जीवन में भी। शायद उन्हें नहीं मालूम था कि इस दुनिया में मुकम्मल जहान किसी को नहीं मिलता। वे गीतादत्त में प्रेमिका का संपूर्ण समर्पण खोजते रहे। अपने क्षेत्र में गीता का भी लक्ष्य था- चरम को प्राप्त करना। कहां और कैसे वक्त के सितम किया कि न गुरुदत्त ही वह रहे न गीतादत्त। अपने नायकों की ही तरह उन्होंने भी पूर्णता को कहीं और ढूंढा। अंतहीन खोज उन्हें आत्म-विनाश की और धकेलती रही। वे आत्महंता प्रवृति के शिकार हो गए। उनके सहयोगी वहीदा के प्रति गहन आसक्ति से परिचित थे, पर कुछ कर नहीं पा रहे थे।

इतिहास में आज का दिन – 3 फरवरी

वहीदा को दिल दे बैठे थे शादीशुदा गुरुदत्त

गीतादत्त और वहीदा की उदार मित्रता भी चर्चित थी। वहीदा के श्रेष्ठ अभिनय के पीछे गीता की मधुर, भावपूर्ण आवाज का ठोस आधार था। पर यह आवाज वहीदा को कागज के फूल के बाद नहीं मिल सकी। वक्त ने यहां भी अपने रंग दिखा दिए थे। वहीदा किसी भी परिस्थिति में भरे-पूरे परिवार को तितर-बितर कने की दोषी नहीं बनना चाहती थीं। सफलता और प्रसिद्धि के साथ एक चुभन भी जुड़ गई थी। उन्होंने वह रास्ता ही छोड़ दिया। ईमानदार कोशिशों के बावजूद भी वह इस टूटन को रोक न पाईं। गुरुदत्त के संसाद से उन्होंने विदाई ले ली, पर गुरुदत्त का हमेशा के लिए विदा होना उन्हें पश्चाताप और गहन अवसाद दे गया। उस समय श्रद्धांजलि के रूप में कहे गए शब्द इस बात के प्रमाण हैं-

“सिने कलाकार के रूप में मुझे जो ख्याति मिली, उसके लिए सबसे बढ़कर गुरुदत्त जिम्मेवार हैं। इसके लिए मैं हमेशा उनकी ऋणी रहूंगी। पर मैं उन्हें बचा न सकी। मैं दिल से चाहती थी कि बचा सकूं। मैं नहीं तो कोई और…।…. ईश्वर ने उन्हें सब कुछ दिया था, मगर संतोष नहीं दिया। उनका समाधान कभी नहीं होता था शायद इसीलिए जिंदगी से उन्हें जो नहीं मिल सका, उसे मौत में ढूंढना चाहा होगा। वे एक बेदाग पूर्णता चाहते थे। वे मानने को शायद तैयार नहीं थे कि जिंदगी में यह नामुमकिन है। …. उन्होंने आत्मनाश स्वीकार किया। उनकी मौत दुर्घटना होगी, पर मैं जानती हूं कि वे उसे चाहते थे।”

वहीदा ने 1956 से अस्सी के दशक तक लगभग 70 फिल्मों में लगातार काम किया। उनकी चुनौती और विविधतापूर्ण भूमिकाओं से अभिनेत्रियां बहुत प्रभावित हुईं। शबाना आजमी मानती हैं, इनके कारण हिंदुस्तानी अभिनेत्रियों की सोच में अंतर आया है। आज यदि वे नकारात्मक पात्रों की भूमिकाएं कर रही हैं तो केवल वहीदा रहमान (Waheeda Rehman) की प्रेरणा से।

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p style=”text-align: justify;”>1974 में शगुन के अपने हीरो कमल जीत के साथ विवाह करके वहीदा बंग्लौर में उनके फॉर्महाउस में रहने चली गईं। सोहेल और केशवी दो प्यारे बच्चों की मां बनीं। 21 नवंबर 2000 में लंबी बीमारी के बाद पति की मृत्यु ने उन्हें विचलित कर दिया। कुछ समय के लिए वे फिल्मी दुनिया से विरत हो गईं। अब फिर चरित्र-अभिनेत्री के रूप में वे कई फिल्मों में दिखाई दी हैं। रंग दे बसंती मौजूदा दौर की उनकी उल्लेखनीय प्रसिद्ध फिल्म है।

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