अमेरिका ने तालिबान से शांति वार्ता रद्द की, भारत को होगा फायदा

बातचीत रद्द होने के बाद अफगानिस्‍तान के राष्‍ट्रपति अशरफ गनी का कहना है कि इस क्षेत्र में सही मायनों में तभी शांति आएगी, जब तालिबान इस तरह हमलों को अंजाम देना बंद करेगा और अफगानिस्‍तान की सरकार से सीधे बातचीत करेगा।

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अमेरिका, अफगानिस्‍तान और तालिबान के बीच होने वाली बातचीत को अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने रद्द कर दिया है।

काबुल हमले के बाद अमेरिका-तालिबान शांति वार्ता रद्द

अमेरिका, अफगानिस्‍तान और तालिबान के बीच होने वाली बातचीत को अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप (Donald Trump) ने रद्द कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का यह फैसला तालिबान के काबुल हमले की जिम्मेदारी लेने के बाद आया है जिसमें एक अमेरिकी सैनिक समेत 12 लोग मारे गए। यह बातचीत कई दौर की सीक्रेट मीटिंग के बाद अमेरिका के कैंप डेविड में होने वाली थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ट्वीट में लिखा, ‘तालिबान के प्रमुख नेता, अफगानिस्तान के राष्ट्रपति रविवार को कैंप डेविड में मेरे साथ गोपनीय मुलाकात करने वाले थे। वे आज रात यूएस आ रहे थे। दुर्भाग्यपूर्ण है कि डील में अपना पलड़ा भारी करने के लिए उन्होंने काबुल में हुए हमले की जिम्मेदारी ली जिसमें हमारा एक महान सैनिक और 11 अन्य लोग मारे गए। मैंने तत्काल बैठक रद्द कर दी और शांति वार्ता के प्रयासों को रोक दिया। वे (तालिबान) शांति वार्ता समझौते में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए लोगों की जानें ले रहे हैं? उन्होंने अपनी स्थिति मजबूत नहीं की है बल्कि और खराब कर ली है…’

ट्रंप ने ट्विटर पर आगे कहा, ‘अगर तालिबान शांति वार्ता के अहम पलों के दौरान सीजफायर के लिए राजी नहीं है और 12 मासूमों की जानें ले रहे हैं, तो वे किसी भी तरह से वार्ता में शामिल होने के काबिल नहीं हैं।’ इस समझौते के तहत, 16 महीनों में 14,000 अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुलाया जाता जिसमें से 5000 सैनिक 135 दिनों के भीतर ही स्वदेश लौट जाते। बदले में, तालिबान आतंकवाद खत्म करने का वादा करता ताकि अमेरिका आश्वस्त हो जाता कि अफगानी मिट्टी से 9/11 का हमला नहीं दोहराया जाएगा। गौरतलब है कि भारत पहले से ही इस बातचीत के पक्ष में नहीं था। लेकिन यह बातचीत रद्द होने से पाकिस्‍तान और चीन परेशान हैं।

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भारत इसलिए तालिबान के साथ इस बातचीत का पक्षधर नहीं था, क्‍योंकि इस बातचीत में अमेरिका इस बात पर सहमत था कि वह अपने सैनिक अफगानिस्‍तान से हटा लेगा। अगर ऐसा होता तो तालिबान फिर से अफगानिस्‍तान में मजबूत होता। इस समय भारत ने अफगानिस्‍तान में बहुत बड़ा निवेश किया हुआ है। अफगानिस्तान की सड़कों, अस्पतालों और स्कूलों के निर्माण में भारत ने 3 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है। लेकिन अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद वहां तालिबान केंद्र में आ जाएगा और इससे ना केवल क्षेत्र की सुरक्षा को खतरा होगा बल्कि इससे अफगानिस्तान में पाकिस्तान का प्रभाव भी बढ़ जाएगा।

इस्लामाबाद भारत के खिलाफ भी तालिबान का इस्तेमाल कर सकता है। अमेरिका के हटने से संभव है भारत को अपने कदम अफगानिस्‍तान में पीछे खींचने पड़ते। इसके अलावा तालिबान के मजबूत होने से पाकिस्‍तान के आतंकी संगठन भी मजबूत होते और ये सब जम्‍मू-कश्‍मीर में अशांति फैलाने की पूरी कोशिश करते। अब भारत को लगता है कि इस बातचीत के टूटने के बाद क्षेत्र में शांति और स्थायित्व की उम्‍मीदें बढ़ेंगी। तालिबान के साथ बातचीत न करने के पक्ष में भारत के साथ-साथ अफगानिस्‍तान भी रहा है। हालांकि वह अमेरिका के कारण अब तक की बातचीत में शामिल था।

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बातचीत रद्द होने के बाद अफगानिस्‍तान के राष्‍ट्रपति अशरफ गनी का कहना है कि इस क्षेत्र में सही मायनों में तभी शांति आएगी, जब तालिबान इस तरह हमलों को अंजाम देना बंद करेगा और अफगानिस्‍तान की सरकार से सीधे बातचीत करेगा।  हालांकि खुद तालिबान अपने ही देश की सरकार को मान्‍यता नहीं देता। वह सरकार को कठपुतली सरकार कहता है। गौरतलब है कि अमेरिकी चुनाव में डोनाल्‍ड ट्रंप ने अफगानिस्‍तान में अमेरिकी अभियान को खत्‍म करने पर जोर दिया था। राष्‍ट्रपति बनने के बाद वह लगातार अफगानिस्‍तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्‍या कम करने पर जोर देते रहे।

अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी उनकी प्राथमिकता में रहा है। लेकिन अफगानिस्‍तान के साथ-साथ कई अमेरिकी विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अमेरिका अफगानिस्‍तान से बाहर निकला तो ये देश एक गहरे संकट में फंस जाएगा। इस समय तालिबान का अफगानिस्‍तान के कई हिस्‍सों पर कब्‍जा है। विश्लेषकों को यह भी डर है कि अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान से लौटने के बाद वहां अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट अपने पैर जमा सकते हैं। वहीं, तालिबान को लेकर भारत की नीति हमेशा से स्‍पष्‍ट रही है। 2001 से लेकर अब तक भारत की किसी भी सरकार ने तालिबान से बातचीत की पहल नहीं की।

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भारत हमेशा से तालिबान जैसे पक्षों को दक्षिण एशियाई क्षेत्र की शांति के लिए खतरा मानता रहा है। अमेरिका की अफगानिस्‍तान के साथ बातचीत से सबसे ज्‍यादा खुश पाकिस्‍तान था। इस बातचीत से उसके यहां मौजूद आतंकी नेटवर्क और ज्‍यादा मजबूत होने वाला था। पाकिस्तान का मानना है कि काबुल की राजनीति में तालिबान जरूरी है। इस्लामाबाद ने तालिबान के को-फाउंडर मुल्ला बारादर को जेल से रिहा कर दिया था। ट्रंप की बातचीत रद्द करने की घोषणा के बाद पाकिस्तान ने केवल अपने जिहादी मोर्चे पर भी मात खायी है बल्कि वॉशिंगटन से उसे मिल रही तरजीह भी खत्म हो गई है।

अमेरिका के शांति वार्ता रद्द करने के फैसले के बाद पाकिस्तान ने सभी पक्षों से फिर से बातचीत शुरू करने की अपील की है। पाक के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, पाकिस्तान शांति वार्ता के जल्द से जल्द शुरू होने की उम्मीद करता है। पाक के विदेश मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तान शांति प्रक्रिया में अपनी भूमिका अदा कर रहा है और साझा उत्तरदायित्व के तहत वह सभी पक्षों को धैर्यपूर्वक और गंभीरता से बातचीत आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करता है। डोनाल्ड ट्रंप के अफगान तालिबान के साथ वार्ता रद्द करने से भारत को एक बड़ी राहत मिली है। लेकिन यह बातचीत रद्द होने से पाकिस्तान के मंसूबों पर पानी फिर गया है।

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