मदद की आस में दर-दर भटकता उरी हमले के शहीद का परिवार

मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर सपूत का परिवार दर-दर की ठोकरें खा रहा है। अपना अधिकार पाने के लिए यह परिवार व्यवस्था से लड़ रहा है। जिस शख़्स ने इस देश के लिए अपनी जान गंवा दी, आज उसी शहीद के मां-बाप सरकारी सिस्टम की लापरवाही का शिकार हैं।

शहीद

मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर सपूत का परिवार दर-दर की ठोकरें खा रहा है। अपना अधिकार पाने के लिए यह परिवार व्यवस्था से लड़ रहा है। जिस शख़्स ने इस देश के लिए अपनी जान गंवा दी, आज उसी शहीद के मां-बाप सरकारी सिस्टम की लापरवाही का शिकार हैं। ये कहानी इतनी दर्दनाक है कि किसी के भी आंखों में आंसू आ जाएं।

दरअसल, 2016 में हुए उरी आतंकी हमले में जौनपुर के शहीद सरायख्वाजा थाना क्षेत्र के भकुरा गांव निवासी राजेश सिंह शहीद हो गए थे। शहादत के बाद उनके परिजनों को तमाम सुविधाएं देने का वादा किया गया था। पर वो वादा ही रह गया। उस वादे पर व्यवस्था द्वारा कोई पहल नहीं की गई।

घरवालों का आरोप है कि सुविधाएं देने का हमें जो भरोसा दिया गया था, वह आज तक पूरा नहीं हो सका। यही नहीं पेंशन शुरू करने के लिए सरकारी कर्मचारियों द्वारा उनसे रिश्वत की मांग तक की गई।

प्रदेश सरकार द्वारा शहीद की पत्नी व बच्चों को सहायता स्वरूप 20 लाख रुपये की मदद की गई थी और मां-बाप को पांच लाख रुपये देने का वादा किया गया था। सरकार द्वारा बच्चों को मुफ्त शिक्षा के साथ ही शहीद के परिजनों को जमीन देने का भी भरोसा दिलाया गया था।

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वक्त बीतता गया और नेताओं का वादा टूटता गया। परिजनों के सब्र का बांध भी अब टूट चुका है। हद तो तब हो गई जब शहीद के पिता से पेंशन शुरू कराने की एवज में ब्लॉक प्रशासन द्वारा पैसे की मांग की गई। इतना ही नहीं दो वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी आज तक जमीन उपलब्ध नहीं कराई गई।

शहीद राजेश सिंह परिवार के इकलौते कमाने वाले थे। बीवी बच्चों के साथ-साथ अपने मां-बाप के बुढ़ापे का सहारा थे। इनके जाने से परिवार पूरी तरह से टूट गया। आर्थिक स्थिति जर्जर हो गई। ऐसे में सरकार द्वारा मदद का आश्वासन एवं पेंशन ही इनके परिजनों के जीने का एकमात्र सहारा है। पर व्यवस्था की लापरवाही ने वह भी छीन लिया है।

शहीद की मां प्रभावती सिंह को जहां अपने बेटे की शहादत पर गर्व है तो वहीं इस बात का अफसोस है कि उनके बुढ़ापे का सहारा चला गया। बेटा निशान्त, जिसकी शिक्षा की जिम्मेदारी सरकार ने लेने का वादा किया था वह खर्च आज भी परिवार ही उठा रहा है।

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