जमशेदजी के दो बड़े सपनों के प्रेरणास्रोत थे विवेकानंद, शिप पर हुई दोनों की पहली मुलाकात ने बदली भारत की तकदीर

जमशेदजी टाटा (Jamsetji Tata) ने अपनी जिंदगी के चार मिशन बना लिये थे, एक स्टील मैन्युफैक्चरिंग यूनिट खोलना, एक विश्व स्तर की यूनिवर्सिटी शुरू करना, एक बड़ा होटल खड़ा करना और एक हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट बनाना।

Jamsetji Tata

Jamsetji Tata and Swami Vivekanand

दरअसल ये बात 1893 की है, जब विवेकानंदजी वर्ल्ड रिलीजन कॉन्फ्रेंस में भाग लेने के लिए अमेरिका जा रहे थे और उसी शिप एस.एस. इम्प्रेस ऑफ इंडिया’ पर सवार थे, जिसमें कि जमशेदजी टाटा (Jamsetji Tata) भी थे शिप जापान के योकोहामा से कनाडा के बैंकूवर जा रहा था। वहाँ से विवेकानंद को शिकागो के लिए ट्रेन लेनी थी। उस वक्त तीस साल के युवा थे विवेकानंद और 54 साल के थे जमशेदजी टाटा (Jamsetji Tata), उम्र में इतने फर्क के वाबजूद दोनों ने काफी समय साथ गुजारा। इस शिप यात्रा के दौरान कई बार स्वामीजी की चर्चा टाटा से हुई। इसी यात्रा के दौरान कई मुद्दों पर स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) और जमशेदजी टाटा (Jamsetji Tata) में कई बातों को लेकर चर्चा हुई।

टाटा ने बताया कि वे भारत में स्टील इंडस्ट्री लाना चाहते हैं। तब स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) ने उन्हें सुझाव दिया कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करेंगे तो भारत किसी पर निर्भर नहीं रहेगा, युवाओं को रोजगार भी मिलेगा। तब टाटा ने ब्रिटेन के इंडस्ट्रियलिस्ट से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात की, लेकिन उन्होंने ये कहकर मना कर दिया कि फिर तो भारत वाले हमारी इंडस्ट्री को खा जाएँगे। तब टाटा अमेरिका गए और वहाँ के लोगों से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का भी समझौता किया। लोग बताते हैं कि इसी से टाटा स्टील की नींव पड़ी और जमशेदपुर में पहली फैक्टरी लगी।

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इस बात का जिक्र आज भी टाटा बिजनेस घराने से जुड़ी वेबसाइट्स पर मिल जाता है। इस पूरी मुलाकात की जानकारी स्वामीजी ने अपने भाई महेंद्र नाथ दत्त को पत्र लिखकर दी थी। जमशेदजी टाटा (Jamsetji Tata) भगवा वस्त्रधारी उस युवा के चेहरे का तेज और बातें सुनकर काफी हैरान थे, भारत को कैसे सबल बनाना है, इस पर उनकी राय एकदम स्पष्ट थी, न केवल आर्थिक क्षेत्र में बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में भी। विवेकानंद ने एक और काफी अहम प्रेरणा जमशेदजी टाटा (Jamsetji Tata) को इस यात्रा के दौरान दी। वो थी, भारत में एक टॉप लेवल की यूनिवर्सिटी खोलना, जहाँ से वर्ल्ड लेबल के स्टूडेंट्स देश भर में निकलें। जिसमें न केवल साइंस की रिसर्च हो, बल्कि ह्यूमेनिटी की भी पढ़ाई हो। टाटा ने दोनों ही बातों को गंभीरता से लिया भी, उसके बाद टाटा अपने रास्ते पर और स्वामी अपने रास्ते पर। इस मुलाकात में दो बातें टाटा ने स्वामीजी से समझी, एक गरीब भारतीय युवा को भरपेट खाना मिल जाए और दूसरी शिक्षा मिल जाए तो वो देश की तकदीर बदल सकता है, और टाटा ने रोजगार और शिक्षा को अपना मिशन बना लिया।

हालाँकि दोनों की ये पहली मुलाकात थी, लेकिन टाटा उनसे काफी प्रभावित हुए। स्वामीजी का सम्मान टाटा की नजरों में तब और भी बढ़ गया, जब ब्रिटेन के अखबारों ने उनके भाषण के बाद लिखा कि “After listening him we find how foolish it is to send missionaries to his country.” शिकागो भाषण के बाद विवेकानंद के चर्चे पूरे यूरोप और अमेरिका में होने लगे, वहाँ से वे इंग्लैंड चले गए, जहाँ उन्होंने कई लैक्चर वेदांत पर दिए। स्वामीजी 1897 में भारत आए और जब वे लौटे तो लोग उनकी घोडागाड़ी में से घोड़े निकालकर खुद जुत गए, ऐसे स्वागत से अभिभूत हो गए स्वामीजी। स्वामीजी ने भारतवासियों में इतना आत्मविश्वास बढ़ा दिया था कि हर कोई उन्हें सुनने को उतावला था। इधर जमशेदजी टाटा (Jamsetji Tata) ने अपनी जिंदगी के चार मिशन बना लिये थे, एक स्टील मैन्युफैक्चरिंग यूनिट खोलना, एक विश्व स्तर की यूनिवर्सिटी शुरू करना, एक बड़ा होटल खड़ा करना और एक हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट बनाना। हालाँकि होटल ताज उनके सामने ही 1903 में बनकर तैयार हो चुका था, बाकी तीनों सपने उनके बाद पूरे हो पाए।

जब टाटा ने स्वामीजी की इतनी प्रशंसा सुनी तो वे काफी खुश हुए और 23 नवंबर, 1898 को उन्हें एक खत लिखा है, वो खत आप यहाँ पढ़ सकते हैं-

Dear Swami Vivekananda, 1 trust you remember me as a fellow-traveller on your voyage from Japan to Chicago. I very much recall at this moment your views on the growth of the ascetic spirit in India, and the duty, not of destroying, but of diverting it into useful channels. I recall these ideas in connection with my scheme of the Research Institute of Science for India, of which you have doubtless heard or read. It seems to me that no better use can be made of the ascetic spirit than the establishment of monasteries or residential halls for men dominated by this spirit, where they should live with ordinary decency, and devote their lives to the cultivation of sciences – natural and humanistic. I am of opinion that if such a crusade in favour of an asceticism of this kind were undertaken by a competent leader, it would greatly help asceticism, science, and the good name of our common country and I know not who would make a more fitting general of such a campaign than Vivekananda. Do you think you would care to apply yourself to this mission of galvanising into life our ancient traditions in this respect? Perhaps, you had better begin with a fiery pamphlet rousing our people in this matter. I should cheerfully defray all the expenses of publication.

With kind regards, I am, dear Swami

Yours faithfully, Jamsetji N. Tata

इस खत में उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस की चर्चा की, जिसके लिए बाद में वायसराय लॉर्ड कर्जन ने अनुमति नहीं दी। हालांकि टाटा ने इस इंस्टीट्यूट के लिए उस दौर में पूरे तीस लाख रुपए का ऐलान कर दिया, और विवेकानंद जी से मदद माँगी। तो रामकृष्ण मिशन के अंग्रेजी अखबार प्रबुद्ध भारत ने इसके लिए लेखों के जरिए मुहिम चलाई। कुछ अखबारों ने टाटा के खिलाफ खबरें भी छापी कि टाटा इस इंस्टीट्यूट के जरिए पैसा कमाना चाहते हैं, तो स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने द स्टेट्समैन में लेखों की झड़ी लगा दी टाटा के इस सपने की तरफदारी में।

ब्रिटिश सरकार ने सर विलियम रैम्से को इस बारे में फैसला लेने के लिए नियुक्त किया, लेकिन कर्जन की तरह वो भी राजी नहीं था जब 1900 में फिर से स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) सिस्टर निवेदिता के साथ इंग्लैंड गए तो उन्होंने एक अलग तरीके से इस इंस्टीट्यूट के लिए मुहिम चलाई, निवेदिता वहाँ एजुकेशन फील्ड के कई लोगों को जानती थीं वे उनसे मिलीं। एक कार्यक्रम में एजुकेशन डिपार्टमेंट के सर जॉर्ज विरवुड को बुलाया गया, वो भी राजी नहीं हुए, और कोलकाता व मुंबई यूनिवर्सिटी की बदहाली का हवाला देकर प्रोजेक्ट को सपोर्ट करने से मना कर दिया। निवेदिता ने उनसे कहा ये दोनों यूनिवर्सिटी अंग्रेजी सरकार चलाती है, तो बदहाली की जिम्मेदारी भी उनकी है। दूसरे कोलकाता यूनिवर्सिटी से जगदीश चंद्र बोस जैसे साइंटिस्ट भी तो निकले हैं, हम उनको इस नई यूनिवर्सिटी की कमान सौंप सकते हैं। निवेदिता अपने गुरु के भारत में एक साइंस की रिसर्च यूनिवर्सिटी खोलने के सपने को पूरा करने के लिए कुछ भी करने को तैयार थीं। वे लगातार लंदन के प्रभावशाली लोगों से मिलकर उस इंस्टीट्यूट के लिए कैंपेन चलाती रहीं। फिर स्वामीजी की मौत 1902 में हो गई, अगले कुछ साल में टाटा भी गुजर गए। लेकिन निवेदिता का मिशन जारी था, कुछ अंग्रेज स्कॉलर और साइंटिस्ट भी दवाब बनाते रहे। जगदीश चंद्र बोस ने भी समर्थन दिया।

आखिरकार 1905 में ब्रिटिश सरकार ने इस प्रस्ताव को हरी झंडी दिखाई और 1907 में स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) के शिष्य मैसूर के महाराजा ने इस इंस्टीट्यूट के लिए जमीन दान देने का ऐलान किया और इस तरह से अगले कुछ सालों में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बैंगलौर अस्तित्व में आई और आज साइंस के फील्ड में रिसर्च के मामले में वो सबसे आगे है। हाल ही में पहली बार एच.आर.डी. ने यूनिवर्सिटी ग्रेडिंग सिस्टम शुरू किया तो नंबर वन पर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस यानी आई.आई.एस.सी., बैंगलौर ही थी।