लाजवाब अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देने वाली कला के महारथी थे फारूख शेख

बॉलीवुड में फारूख शेख (Farooq Sheikh) को एक ऐसे अभिनेता के तौर पर याद किया जाता है जिन्होंने समानांतर सिनेमा के साथ ही व्यावसायिक सिनेमा में भी अपने लाजवाब अभिनय से दर्शकों के बीच अपनी खास पहचान बनायी। फारुख एक भारतीय अभिनेता, समाज-सेवी और एक टेलीविजन एंकर थे। फारुख के पिता मुंबई के जाने-माने अधिवक्ता थे और उनका इरादा भी पिता की विरासत को आगे ले जाने का था। मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ लॉ से उन्होंने कानून की पढ़ाई की लेकिन वकील बनने के बाद जल्द ही उन्हें महसूस हुआ कि यह पेशा उनके लिए ठीक नहीं है। उनका मानना था कि ज्यादातर मामलों के फैसले अदालत में नहीं बल्कि पुलिस थानों में तय होते हैं। इसके बाद उन्होंने वकालत छोड़ एक्टिंग को तवज्जो देनी शुरू की।

Farooq Sheikh
अभिनेता फारूख शेख- Photo Credit: @shubham_jain999

फारूख शेख (Farooq Sheikh) का जन्म 25 मार्च 1948 को जमींदार घराने में हुआ। उनके पिता मुस्तफा शेख मुंबई में जाने माने वकील थे। फारूख शेख (Farooq Sheikh) ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के सेंट मैरी स्कूल से पूरी की। इसके बाद उन्होंने मुंबई के ही सेंट जेवियर्स कॉलेज से आगे की पढ़ाई पूरी की।

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इस बीच फारूख शेख (Farooq Sheikh) ने सिद्धार्थ कॉलेज से वकालत की और पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में दाखिला ले लिया। इसके बाद वह इप्टा से जुड़ गये और सागर सरहदी के निर्देशन में बनी कई नाटकों में अभिनय किया।

सत्तर के दशक में बतौर अभिनेता फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिये फारूख शेख (Farooq Sheikh) ने मुंबई में कदम रख दिया। वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म ‘गरम हवा’ से उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की।

यूं तो पूरी फिल्म अभिनेता बलराज साहनी पर आधारित थी लेकिन फारूख शेख (Farooq Sheikh) दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाने में सफल रहे। फारूख शेख (Farooq Sheikh) मुंबई में लगभग छह साल तक संघर्ष करते रहे। आश्वासन तो सभी देते लेकिन उन्हें काम करने का अवसर कोई नहीं देता था।

इस बीच उन्हें महान निर्देशक सत्यजीत रे की फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में काम करने का अवसर मिला लेकिन उन्हें कुछ खास फायदा नहीं हुआ।

फारूख शेख (Farooq Sheikh) की किस्मत का सितारा निर्माता–निर्देशक यश चोपड़ा की 1979 में प्रदर्शित फिल्म ‘नूरी’ से चमका। बेहतरीन गीत–संगीत और अभिनय से सजी इस फिल्म की कामयाबी ने न सिर्फ उन्हें बल्कि अभिनेत्री पूनम ढिल्लों को भी स्टार के रूप में स्थापित कर दिया। फिल्म में लता मंगेशकर की आवाज में ‘आजा रे.. आजा रे.. मेरे दिलबर आजा…’ गीत आज भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता हैं।

वर्ष 1981 में फारूख शेख (Farooq Sheikh) के फिल्मी कैरियर की एक और महत्वपूर्ण फिल्म ‘उमराव जान’ प्रदर्शित हुयी। मिर्जा हादी रूसवा के मशहूर उर्दू उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में उन्होंने नवाब सुल्तान का किरदार निभाया जो उमराव जान से प्यार करता है। इस फिल्म में फारूख को फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया।

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