देश की आधुनिक विचारधारा के जनक, पं. दीनदयाल थे जनसंघ के शिल्पकार

Pandit Deendayal Upadhyay Birth Anniversary: कहते हैं कि सोना, आग में तपकर कुन्दन बनता है अर्थात सोना तप कर ही उस आकार में ढलता है जिसे साधारण करने से धारण करने वाले व्यक्तित्व में चार चांद लग जाते हैं। लेकिन सोना को धारण करने योग्य बनाने के लिए पहले खुद को आग में तपाना पड़ता है। उसी प्रकार जितने भी महापुरुष हुए हैं, वे भी सरलता से महान नहीं हुए हैं और न ही ऐसे बने हैं कि लोग उनके आदर्शों को जीवन में उतारें। उन्होंने अपने जीवन को जिन्दगी की भट्ठी में झोंक दिया। तब वे महान व्यक्ति कहलाए और लोगों ने उनके कार्यों, उनके आदर्शों को अपनाया। अर्थात बड़ा त्याग करके ही महान बना जाता है। महानता कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे बाजार से खरीदा जाए और महान बना जाए। इन्हीं महान पुरुषों की कड़ी में एक महापुरुष थे- पं. दीनदयाल उपाध्याय।

Pandit Deendayal Upadhyay

पं. दीनदयाल उपाध्याय जैसे महान व्यक्तित्व के बारे में जितनी भी प्रशंसा की जाए या लिखा जाए वह वास्तव में बहुत कम होगा। कौन है इनके जैसा त्यागी, देश भक्त और संघर्षशील आत्मा, शायद कोई नहीं। जितना इन्होंने देश के लिए सहयोग व समर्पण किया, उसकी गौरव गाथा नहीं गाई जा सकती।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय (Pandit Deendayal Upadhyay) का जन्म 25 सितम्बर, 1916 को हुआ था। इनका जन्म इनके नाना पंडित चुन्नीलाल जी के घर धनकिया, उत्तर प्रदेश  में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री भगवती प्रसाद उपाध्याय था। वे मथुरा जिले के फराह नामक गांव के रहने वाले थे। वे स्टेशन मास्टर के रूप में कार्यरत थे। वे मथुरा में जलेसर मार्ग पर स्थित स्टेशन पर स्टेशन मास्टर थे। इनकी माता का नाम श्रीमती रामप्यारी था। वे धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। दीनदयाल जी के दादा पं. हरिराम अपने समय के प्रकाण्ड ज्योतिषी थे। दीनदयाल जी के जन्म के कुछ दिन बाद पं. चुन्नीलाल शुक्ल के मन में अपने नाती का भविष्य जानने की इच्छा उत्पन्न हुई। उन्होंने एक ज्योतिषाचार्य को बुलवाकर बालक का भविष्य बताने के लिए कहा। बालक दीनदयाल के ग्रह नक्षत्रों का गहन अध्ययन करने के बाद ज्योतिषाचार्य गम्भीर स्वर में बोले-‘‘निश्चय ही यह बालक अद्भुत व्यक्तित्व और तीव्र बुद्धि का स्वामी होगा साथ ही बड़ा प्रतिभाशाली और विद्वान होगा। सेवा, दया और मानवता के गुण इसमें कूट-कूटकर भरे होंगे। अपनी विलक्षण प्रतिभा और विद्वता के आधार पर यह बालक युग पुरुष के रूप में उभरेगा और देश-विदेश में अतुलनीय सम्मान प्राप्त करेगा।

Pandit Deendayal Upadhyay

पं. दीनदयाल उपाध्याय (Pandit Deendayal Upadhyay) का परिवारिक नाम ‘दीना’ था। बचपन में सभी उन्हें प्यार से दीना कहकर ही पुकारते थे। दीना के जन्म के लगभग दो वर्ष बाद इनकी माता रामप्यारी ने एक और पुत्र को जन्म दिया। दीना के भाई का नाम शिवदयाल रखा गया और पुकार का नाम दिया गया-शिव। कहते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है। इसके प्रहारों से शक्तिशाली और तेजस्वी व्यक्ति भी बलहीन, आश्रयहीन और तेजहीन होकर नष्ट हो जाता है। कुछ इसी तरह की विषम परिस्थितिया दीनदयाल जी  के सामने भी उपस्थित हुईं। समय का पहला क्रूर प्रहार उन्हें तब झेलना पड़ा, जब वे केवल ढाई साल के थे। उस समय नवरात्रि पर्व मनाया जा रहा था। चतुर्थी को इनके पिता पं. भगवती प्रसाद उपाध्याय किसी के घर भोजन करने गए। लेकिन वहां काल उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। उन्होंने जैसे ही भोजन आरम्भ किया, वैसे ही मृत्यु ने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया। किसी ने उनके भोजन में जहर मिला दिया था, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी। दीनदयाल और शिवदयाल के सिर से पिता का साय उठ गया और वे पितृ-प्रेम से वंचित हो गये। उनकी माता दोनों बच्चों को साथ लेकर अपने पिता के घर आ गयीं और वहीं रह कर दोनों का लालन-पालन करने लगीं। लेकिन काल की क्रूर दृष्टि इनके परिवार पर पड़ चुकी थी। अतृप्त मृत्यु मुख खोलकर अपना भोजन मांग रही थी। तभी दीनदयाल पर एक और वज्रघात हुआ। 8 अगस्त, 1924 को इनकी माता रामप्यारी दोनों पुत्रों को छोड़कर ब्रह्म में लीन हो गईं। उस समय दीनदयाल केवल आठ साल के और शिवदयाल साढ़े छः साल के थे। काल की क्रीड़ा का अन्तिम पड़ाव अभी शेष था। वह दीनदयाल जी के सभी सांसारिक बंधन तोड़ देना चाहता था। 18 नवम्बर 1934 को छोटे भाई शिवदयाल की निमोनिया जैसी साधारण बीमारी से मृत्यु हो गई। अब दीनदयाल जी संसार में अकेले रह गये थे। लेकिन ननिहाल के लोगों ने उन्हें अकेले नहीं रहने दिया और पूरे वात्सल्यभाव से उनका पालन-पोषण किया।

दीना जी की माता के स्वर्गवास के बाद इनका पालन-पोषण इनके मामा श्री राधारमण शुक्ल ने किया। । दीनदयाल (Pandit Deendayal Upadhyay) जी यहीं उनके साथ गंगापुर में रहे और उन्होंने अपनी छठीं कक्षा तक की शिक्षा यहीं पूरी की। आगे की शिक्षा के लिए राजस्थान के सीकर जाना पड़ा। यहां उन्होंने कल्याण हाई स्कूल में नौवीं कक्षा में प्रवेश लिया। यहां दसवीं कक्षा में वे प्रथम आये। यह परीक्षा उन्होंने साल 1935 में राजस्थान बोर्ड से पास की। स्नातक की पढ़ाई के लिए दीनदयाल जी कानपुर आ गए। यहां उन्होंने सनातन धर्म कॉलेज में बी.ए. में प्रवेश लिया। कानपुर में बी.ए. की परीक्षा में भी वे प्रथम आए। उनकी इस उत्कृष्ट प्रतिभा के फलस्वरूप कालेज से उन्हें तीस रुपए मासिक छात्रवृत्ति मिलने लगी। वे अपनी शिक्षा इसी छात्रवृत्ति से पूरी करने लगे। बी.ए. की शिक्षा पूरी करने के बाद एम.ए. करने के लिए दीनदयाल जी आगरा पहुंचे। यहां उन्होंने अंग्रेजी विषय में अध्ययन के लिए आगरा के ‘सेंट जॉन्स कॉलेज’ में प्रवेश लिया। लेकिन यहां उनकी आगे की शिक्षा में बाधा उत्पन्न हो गई। उनके मामा नारायण की पुत्री यानी उनकी ममेरी बहन रामदेवी को खराब स्वास्थ्य के कारण आगरा अस्पताल में भर्ती कराया गया। यहां दीनदयाल ने अपनी जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाया और बहन की सेवा की। लेकिन फिर भी उनकी बहन बच न सकीं और एक दिन उनकी मृत्यु हो गई। दीनदयाल जी दुखी हो गए और एम.ए. के अंतिम साल की परीक्षा नहीं दे सके।लेकिन उन्हें इस बात की खुशी थी कि उन्होंने अपनी बहन के अंतिम समय में पूरी निष्ठा से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। दीनदयाल को उनके मामा-मामी ने अनेक बार शादी करने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने अपनी चतुराई से मामा-मामी को इस प्रकार संतुष्ट किया कि उन्होंने दीनदयाल जी से फिर कभी शादी के लिए नहीं कहा।

एक देशभक्त महिला, जिसने विदेशी जमीन पर पहली बार फहराया भारतीय झंडा

पं. दीनदयाल उपाध्याय (Pandit Deendayal Upadhyay) ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में एक सेवक की तरह ही प्रवेश किया और वे अपनी  प्रतिभा के बल पर एक दिन संघ के अध्यक्ष पद तक पहुंचे। दीनदयाल जी ने पूरी निष्ठा से अपना जीवन इसमें लगाने का निर्णय लिया। साल 1939 में जब एम.ए. करने के लिए वे आगरा आए तो वहां भी उन्होंने संघ के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी अच्छे से निभायी और आगरा के राजा की मंडी नामक स्थान पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ  की एक शाखा को स्थापित किया। लोगों को संघ के साथ जोड़ा, संघ के कार्यों को आगे बढ़ाया। वे अपनी मेहनत व लगन से संघ के कार्यों में लग गए। उनकी ख्याति संघ में बढ़ती गयी। दीनदयाल जी सहृदयी, मिलनसार व्यक्तित्व के धनी थे। लोग उनके व्यवहार से मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

पं. दीनदयाल उपाध्याय (Pandit Deendayal Upadhyay) एक महान देशभक्त, कुशल संगठनकर्ता, मौलिक विचारक, दूरदर्शी, राजनीतिज्ञ और प्रबुद्ध साहित्यकार थे। सादा जीवन उच्च विचार की जीती जागती प्रतिमा थे। सनातन संस्कृति के प्रतिनिधि और संदेश-वाहक थे। आज प्रत्येक भारतीय इनके त्यागमय जीवन का कर्जदार है।

पं. दीनदयाल (Pandit Deendayal Upadhyay) जी सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। उनकी कथनी और करनी में तनिक भी फर्क नहीं था। उनके व्यक्तित्व को शब्दों में पिरो पाना बड़ा कठिन है। वे एक कुशल संचालक, लेखक, पत्रकार, राज्ञनीतिज्ञ, संगठनकर्ता थे। वे बहुत ही साधारण से दिखने वाले व्यक्ति थे और हमेशा धोती-कुर्ता पहनते थे। लेकिन इस साधारण पुरुष में असाधारण विद्वता, महानता का पूर्ण समावेश था। उन्हें बाहरी दिखावों से कोई लेना-देना नहीं था। समाज का उत्थान उनका सर्वोपरि लक्ष्य था। वे कहते थे कि ‘मनुष्य जन्म से नहीं अपितु कर्म से महान बनता है।’ कम बोलना, अधिक सुनना उनका विशेष गुण था।

Pandit Deendayal Upadhyay

भारत के इस वीर महापुरुष पं. दीनदयाल उपाध्याय (Pandit Deendayal Upadhyay) की मृत्यु भी एक रहस्य बन कर रह गई। 11 फरवरी 1949 की रात को दिल्ली से हावड़ा की रेल यात्रा के दौरान मुगलसराय (दीनदयाल उपाध्याय) रेलवे स्टेशन के पास संदिग्ध अवस्था में इनका मृत शरीर मिला। तत्कालिन उत्तर प्रदेश सरकार ने इनकी मौत के रहस्य से पर्दा उठाने के लिए जांच भी की लेकिन आज तक ये साफ नहीं हो सका कि उनकी हत्या के पीछे किसका हाथ था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ये साफ बताया गया था कि इनकी मौत चोट लगने के कारण हुई है। पंडित जी के पीठ पर, हाथ और सिर पर चोट लगने के प्रमाण भी मिले थे। लेकिन तत्कालिन केंद्र सरकार ने उनकी मौत की जांच में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई थी।

भारत वर्ष के अनेक महापुरुषों की कड़ी में से एक मनके हैं- पं. दीनदयाल उपाध्याय (Pandit Deendayal Upadhyay)। दीनदयाल जी ने स्वयं को मानव-सेवा, समाज-सेवा और देश सेवा के लिए समर्पित कर दिया था। आज देश के सामने अनेक समस्याएं हैं, भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, सामाजिक दायरे सिकुड़ रहे हैं, ऐसे में उचित मार्गदर्शन के लिए पं. दीनदयाल जैसे महापुरुषों की जीवनियां प्रेरणास्रोत हो सकती हैं।

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