जिनकी ईमानदारी पर था दु्श्मनों को भरोसा, उसी विश्वास के खातिर जेल से भागने का दो मौका छोड़ा

Ramprasad Bismil

Ram Prasad Bismil

Remembering Ramprasad Bismil: 18 दिसम्बर 1927 का वह दिन। गोरखपुर सेंट्रल जेल के बड़े फाटक के सामने अधेड़ आयु की एक महिला इंतजार में खड़ी थी। उसके चेहरे पर कुछ उदासी छाई थी। चिंता भी स्पष्ट दिखलाई दे रही थी। वह इसी सोच में थी कि उसे कब जेल के अन्दर जाने की आज्ञा मिलती है।

Ramprasad Bismil

इसी बीच महिला के पति भी वहाँ आ गए। पत्नी को पहले ही वहाँ आया देख, वे चकित से रह गये। वे भी पत्नी के पास ही बैठ गये और अब दोनों भीतर जाने के लिए बुलाये जाने की प्रतिक्षा करने लगे। एक युवक भी वहाँ पहुँच गया। वह इनका रिश्तेदार नहीं था मगर वह जानता था कि इन दोनों को अन्दर प्रवेश करने की अनुमति मिल जायेगी। वह अपने बारे में सोच रहा था कि वह स्वयं कैसे भीतर जा सकेगा ?

जेल के अफसर वहाँ आये। उन्होंने पति-पत्नी दोनों को बुलाया। वहीं खड़ा युवक भी उनके पीछे-पीछे जाने लगा। पहरेदार ने उसे रोक दिया और कड़क कर पूछा- “तुम कौन हो ?” महिला ने अनुरोध के स्वर में कहा- “भैया, उसे भी अन्दर आने दो। वह मेरा भान्जा है।” पहरेदार ने युवक को भी उनके साथ जाने दिया।

तीनों व्यक्ति जेल में एक ऐसे स्वतंत्रता सैनिक से मिलने जा रहे थे, जिसे सुबह फाँसी की सजा दी जाने वाली थी। वीर स्वतंत्रता सेनानी बेड़ियाँ पहने उस स्वतंत्रता सेनानी को वहाँ लाया गया। हथकड़ी-बेड़ियाँ उसके शरीर पर आभूषण जैसी दिखलाई दे रही थीं। वह अन्तिम बार अपनी माँ को देख रहा था। वह सोच रहा था कि अब मैं आखिरी बार उसे ‘माँ’ कहकर पुकार सकूंगा। उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था। एकाएक उसकी आँखों से आँसू निकलकर गालों पर बहने लगे।

उसकी माँ ने दृढ़ता के स्वर में कहा-“मेरे बेटे, यह तुम क्या कर रहे हो ? मैं तो अपने सपूत को एक महान योद्धा मानती हूँ। मैं सोचती थी कि मेरे बेटे का नाम सुनते ही ब्रिटिश सरकार भय से काँप उठती है। मुझे यह मालूम नहीं था कि मेरा बेटा मौत से डरता है। यदि तुम रोते हुए ही मौत का सामना करना चाहते हो तो तुमने आजादी की लड़ाई में हिस्सा ही क्यों लिया ?’

वीर माता की देशभक्ति और दृढ़ता देखकर जेल के अफसर भी चकित रह गये। उस वीर स्वाधीनता सेनानी ने कहा-“माँ, ये आँसू भय के आँसू नहीं हैं। ये हर्ष के आँसू हैं-तुम जैसी वीर माता को पाने की खुशी के हैं ये आँसू।” उस वीर माता के वीर पुत्र का नाम था रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) बिस्मिल। वे प्रसिद्ध काकोरी रेल डकैती प्रकरण के अगुआ थे। इस तरह यह भेंट खत्म हुई।

दूसरी सुबह रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) रोज की तुलना में कुछ जल्दी जागा। स्नान के बाद उसने सुबह की प्रार्थना की। अपनी माँ को उसने अन्तिम पत्र लिखा और फिर वह मौत की प्रतीक्षा में चुपचाप बैठ गया। अफसर वहाँ आये। उन्होंने रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) की बेड़ियाँ काट दीं। वे जेल की कोठरी से उसे फाँसी घर की ओर ले जाने लगे। रास्ते में भी उसके चेहरे पर किसी तरह की चिन्ता दिखलाई नहीं दे रही थी। वह एक वीर की भाँति चल रहा था। यह सब देखकर जेल के कठोर अफसर भी दंग रह गये। जब उसे काल कोठरी की तरफ से ले जाया जाने लगा तो उसने खुशी से ‘वन्देमातरम्’ तथा ‘भारत माता की जय’ का ऊँचे स्वर में उद्घोष किया। ऊंची आवाज में ‘ब्रिटिश सरकार मुर्दाबाद’ का नारा लगाया। बाद में राम प्रसाद ने धीमे स्वर में ‘विश्वानि देव सवितु: दुरितानि परसुव’ और कुछ अन्य प्रार्थनायें कीं और फिर फाँसी के फ़न्दे की ओर बढ़ा।

जब रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) को फाँसी दी जा रही थी तब जेल के आस-पास कड़ा पहरा था। उसकी मृत्यु के बाद अधिकारियों ने उसका शव काल-कोठरी से बाहर निकाला। जेल के बाहर उसके माता—पिता ही नहीं अपितु सैकड़ों नर-नारी सजल नेत्रों के साथ खड़े थे। गोरखपुर के नागरिकों ने भारत माँ के इस वीर सपूत के शव को फूलों से सजाया। एक बड़े जुलूस की तरह उसकी शवयात्रा निकाली गई। रास्ते में असंख्य नर-नारियों ने शव पर पुष्प बरसाये और इस तरह इस वीर सपूत का अंतिम संस्कार किया गया। रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) उन गिने-चुने शहीदों की श्रेणी में जा पहुँचे थे जिन्होंने स्वतंत्र भारत का सपना साकार करने के लिए बलिदान दिया था। उनका परम उद्देश्य था – किसी न किसी तरह यह देश आजाद हो।

फाँसी के लिए जाने से कुछ ही समय पूर्व रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) ने एक कविता लिखी-

“हे ईश्वर! जो तुम चाहते हो वही होता है।

आप महान हो। मुझे वर दो,

कि अपनी अंतिम साँस तक और मेरे रक्त की अंतिम बूंद तक,

मैं तुम्हारा ही ध्यान करूं तथा तुम में ही विलीन हो जाऊँ।”

बचपन

रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर नामक स्थान पर 1897 में हुआ था। उनके पूर्वज ग्वालियर राज्य के तोमरगढ़ नामक स्थान के थे। यह इलाका चम्बल नदी के किनारे बसा था और उसकी गणना ब्रिटिश प्रान्तों के साथ होती थी। चम्बल घाटी में रहने वाले लोग वीर और मेहनती हुआ करते थे। अनेक पीढ़ियों से कई राज्यों ने इन लोगों पर नियंत्रण करने की कोशिश की मगर किसी को भी सफलता नहीं मिली।

रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) के पिता मुरलीधर ने बहुत कम शिक्षा पाई थी। वे शाहजहाँपुर नगरपालिका में कर्मचारी थे। कुछ समय बाद वे नौकरी से ऊब गये और नौकरी छोड़कर उन्होंने स्वतंत्र जीवन-यापन शुरू कर दिया। वे ब्याज पर ऋण देने लगे और उनकी गाड़ियाँ भी किराये पर चलने लगीं। उनका पहला पुत्र काफी कम समय जीवित रहा। रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) उनका दूसरा पुत्र था।

इस बालक में भी पहले बच्चे की तरह रोग के लक्षण दिखाई देने लगे थे। उसकी दादी ने झाड़-फूंक करने वालों से ताबीज लाकर बालक के गले में बाँधी। ममतामयी दादी से बच्चे को स्वस्थ करने के लिए जो कुछ कहा जाता, वह खुशी से करती थी। आखिर वह बच्चा बच गया।

रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) को सम्पूर्ण परिवार का असीम प्यार मिला। जब वह सात वर्ष का था तो पिता मुरलीधर ने उसे हिंदी पढ़ाना शुरू किया। साथ ही उर्दू सीखने के लिए उसे मौलवी के पास भेजा गया। अंत में रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) पाठशाला में जाने लगा। 14 वर्ष की आयु में इस बालक ने उर्दू में चौथी कक्षा की पढ़ाई पूरी कर ली। वह उर्दू की कुछ रोचक कथाएँ और उपन्यास भी पढ़ने लगा था। पुस्तकें खरीदने के लिए अब उसे पैसों की जरूरत पड़ी। लेकिन पिताजी उसके लिए पैसे नहीं देते थे। रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) ने सरल रास्ता चुना, वह पिता के संदूक से पैसे चुराने लगा। कुसंगति के कारण उसे बीड़ी-सिगरेट पीने की लत भी लग गई। कभी-कभी वह भाँग और चरस भी पी लेता। इसी कारण रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) पाँचवीं कक्षा में दो बार फेल हो गया। किसी न किसी तरह पिता को लड़के की इन आदतों की जानकारी मिल गई। उन्होंने संदूक का ताला बदल दिया। रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) ने अंग्रेजी शाला में जाने की इच्छा प्रकट की। पिताजी इसके लिए राजी नहीं हुए। किन्तु जब रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) की माँ ने बेटे का पक्ष लिया, तब पिता ने उसे अंग्रेजी पाठशाला में भर्ती करा दिया।

काकोरी रेल डकैती

काकोरी लखनऊ के निकट ही बसा एक गाँव है। उस गाँव में रेलगाड़ी पर हमले के कारण ही काकोरी स्टेशन प्रसिद्ध हो गया।

वह 9 अगस्त 1925 की शाम थी। 8 – डाऊन रेलगाड़ी काकोरी के निकट से गुजर रही थी। रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) और उनके नौ क्रांतिकारी साथियों ने जंजीर खींचकर गाड़ी रोक दी। उन्होंने सरकारी धन लूट लिया जो कि गार्ड के डिब्बे में रखा था। अचानक एक गोली चली जिससे एक यात्री की मृत्यु हो गई। इसके अलावा कहीं खून-खराबा नहीं हुआ।

इस सुनियोजित डकैती से सरकार भौंचक्की रह गई। एक माह तक प्रारंभिक छानबीन के बाद सरकार ने क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए जाल फैलाने की पूरी तैयारी कर ली। डाका डालने वाले दस क्रांतिकारियों को ही नहीं अपितु हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के अन्य नेताओं के नाम भी वारंट जारी कर दिये गये। चंद्रशेखर आजाद को छोड़कर शेष सभी क्रांतिकारी पकड़ लिए गये जिन्होंने रेल लूटी थी। डेढ़ वर्ष तक मुकदमा चला। रामप्रसाद (Ramprasad Bismil), अशफाकउल्ला, रोशन सिंह और राजेन्द्र लाहिड़ी चारों क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा सुनाई गई। देशभर में इन लोगों के प्राण बचाने के लिए व्यापक अभियान चलाया गया। सभी नेताओं ने ब्रिटिश सरकार से अपील की कि इन युवकों के साथ उदारतापूर्ण व्यवहार किया जाये; मगर सरकार अपने फैसले पर अडिग रही।

18 दिसम्बर 1927 को राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी दे दी गई। रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) व अशफाक उल्ला 19 दिसम्बर को और रोशन सिंह 20 दिसम्बर को फाँसी पर चढ़ा दिये गये। सभी ने स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में शौर्य और अदम्य साहस का नया अध्याय लिखा।

हीरे की तरह कठोर-फूल की भांति कोमल

रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) ने अपने स्वभाव तथा गुणों के कारण सभी का सम्मान प्राप्त किया था। वे सोचते थे कि विदेशियों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हमारा देश आजाद होना ही चाहिये। उसे आजाद कराने का सही तरीका सशस्त्र क्रांति ही है। उनके रास्ते में कितनी ही बाधायें आई, कितनी समस्याओं ने उन्हें परेशान किया, राह के काँटों को पार करते हुए वे सदैव सिर ऊँचा उठाकर ही चले। उसी रास्ते पर मौत भी उनके इंतजार में खड़ी थी, मगर रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) जरा भी विचलित नहीं हुए।

ईमानदारी की मिसाल थे रामप्रसाद

रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) कभी किसी को धोखा नहीं दिया। बेईमानी व धोखेबाजी से उन्हें बड़ी घृणा थी। जब भी उन्हें दगाबाजी की गन्ध मिलती, जिम्मेदार व्यक्ति की हैसियत की चिन्ता किये बिना ही वे उसकी भर्त्सना करते। यह भी कहा जा सकता है कि वे बेईमान बनने को तैयार नहीं थे, इसलिए उनकी मौत का सामना करना पड़ा।

अपनी जीवनी में रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) ने लिखा है कि कैसे काकोरी केस में उन्हें गिरफ्तार करके थाने ले जाया गया। वे लिखते हैं—“इस मामले से सम्बद्ध गिरफ्तारियों में पुलिस अधिकारी रातभर व्यस्त रहे। वे जरा भी नहीं सो पाये थे। आखिर वे सब चले गये। एक सिपाही जो पहरे पर था। वह भी गहरी नींद में था। एक बाबू थाने में बैठा-बैठा लिख रहा था। वह रोशन सिंह का चचेरा भाई था। यदि मैं चाहता तो मैं बड़े आराम से निकल कर भाग सकता था मगर मेरे ऐसा करने से वह बाबू बड़ी मुसीबत में पड़ जाता। मैंने उसे बुलाया और उससे कहा कि अगर तुम परिणाम भुगतने को तैयार हो तो मैं भाग सकता हूँ। वह मुझे भलीभाँति जानता था। वह मेरे पैरों पर गिर पड़ा तथा मुझसे कहने लगा कि अगर मैं भाग गया तो उसे पकड़ लिया जायेगा। उसके बाल-बच्चे भूखे मर जायेंगे। मैंने पीठ थपथपाकर उसे जाने दिया। मुझे उस पर बड़ी दया आ रही थी।”

कुछ ही दिन बाद रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) को भागने का एक मौका और मिला। उन्हें बाहर ले जाया जा रहा था। एक सिपाही भी साथ में था। दूसरे सिपाही ने कहा- “उसे जंजीर से बाँध दो।” मगर सिपाही ने बड़े विश्वास से उत्तर दिया- “मुझे इन पर पूरा भरोसा है। ये भागेंगे नहीं।” हम एक सुनसान जगह गये। मैंने अपना हाथ दीवार पर रखा और पीछे देखने लगा। सिपाही कुश्ती देखने में व्यस्त था। वह पूरी तरह कुश्ती देखने में खो गया था। मैं थोड़ी-सी कोशिश करके दीवार फाँद सकता था मगर, मैंने ऐसा नहीं किया। मेरी अन्तरात्मा कह रही थी- “क्या ऐसे भागकर, उस गरीब सिपाही ने तुम पर जो भरोसा किया है तथा तुम्हें आजादी दी है, उसको ठेस नहीं लगेगी ? क्या यह सही होगा ? उसकी बीबी-बच्चे तुम्हारे बारे में क्या सोचेंगे ?’ मेरे मन में यह विचार आया और मैंने दीर्घ श्वास छोड़ा। मैंने सिपाही को बुलाया तथा हम वापस थाने लौट आये।

जिस किसी ने भी आप पर भरोसा किया उसे धोखा कदापि न दिया जाये, यही रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) की मान्यता थी। फिर वह बाबू हो या सिपाही। जेल में भी सिपाहियों को उन पर विश्वास था। उनका चरित्र ही ऐसा था। उनकी फाँसी की सजा दिये जाने के बाद भी वे अपने इस सिद्धान्त पर कायम रहे। जिन्होंने भरोसा किया, उनको संकट में डालकर भाग जाना वे पूर्णतया अनुचित व अनैतिक समझते थे।

भारत के क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास में काकोरी रेल डकैती का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। वीर रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) ‘बिस्मिल’ ने इसकी योजना बनाई तथा बड़ी चतुराई से उस को कार्यान्वित किया। एक क्रांतिकारी लेखक, एक आदर्श मानव व वीर पुरुष के रूप में रामप्रसाद (Ramprasad Bismil) सदैव हमारे हृदय में बसे रहेंगे।

“यदि मातृभूमि के लिए मुझे हजार बार मौत को गले लगाना पड़ा तो भी मुझे दु:ख नहीं होगा। हे प्रभु! मुझे भारत में सौ बार जन्म दो ! परन्तु मुझे यह वरदान भी दो कि हर बार मेरा जीवन मातृभूमि की सेवा में

ही लगे।” यह प्रार्थना स्वतंत्र भारत के हर नागरिक के हृदय में बसी रहे और उसकी ध्वनि हमारे कानों में गुंजित होती रहे।

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