जमशेदजी टाटा: देश के पहले उद्योगपति, जिनके विचारों-कार्यों ने रखी नए हिंदुस्तान की नींव

Jamsetji Tata 14 वर्ष की आयु में बंबई आए, जहाँ उन्होंने 17 वर्ष की आयु में एलफिंस्टन कॉलेज में दाखिला लिया। यहाँ से उन्होंने कुछ वर्षों बाद ग्रीन स्कॉलर (उस समय स्नातक के समकक्ष) की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1868 में सुदूर पूर्व और यूरोप में व्यापारिक गतिविधियों में व्यस्त रहने के बाद उन्होंने 21,000 रुपए की पूँजी से एक निजी ट्रेडिंग फर्म प्रारंभ की।

Jamsetji Tata

Jamsetji Tata death anniversary: Remembering the legend and his legacy

जमशेदजी टाटा (Jamsetji Tata) का जन्म 3 मार्च 1839 में गुजरात के एक पारसी धर्म के एक पादरी नुसेरवंजी एवं जीवेरबाई कोवासजी टाटा के घर में हुआ था। वह चार बहनों के एकमात्र भाई थे। जब जमशेदजी टाटा 13 वर्ष के थे, तब उनके पिता ने बॉम्बे में व्यापार आरम्भ किया। सन 1855 में 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह 10 वर्षीय हीराबाई से हो गया। उनके दो पुत्र सर दोराबजी जमशेदजी एवं रतन जमशेदजी थे। एक पुत्री भी थी, जिसकी अल्पायु में ही मृत्यु हो गई थी।

सन् 1858 में जमशेदजी टाटा (Jamsetji Tata) अपने पिता के व्यवसाय से जुड़ गए। उसके बाद उन्होंने भारतीय औद्योगिक विकास को शिखर तक पहुंचाने में अत्यधिक योगदान दिया। उन्होंने नागपुर और बॉम्बे में कपड़ों की मिल खोली। वह ‘टाटा लौह एवं इस्पात संस्था’ (टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी) के भी संस्थापक हैं। आज यह कम्पनी विश्व में इस्पात की सबसे बड़ी कम्पनी है।

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जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा (Jamsetji Tata) ने सन् 1887 में टाटा ऐंड संस की स्थापना की थी और अपने सबसे बड़े बेटे दोराब तथा छोटे चचेरे भाई रतनजी दादाभाई टाटा को अपने कारोबार में भागीदार बनाया। टाटा घराने की कहानी जमशेदजी नुशेरवनजी टाटा के साथ शुरू होती है। यह दृष्टिकोण अपने आप में प्रासंगिक एवं जिज्ञासापूर्ण होगा कि भारत के इस सबसे पुराने और सर्वाधिक सम्मानित औद्योगिक घराने के इस प्रख्यात संस्थापक की जिंदगी का निकट से अवलोकन किया जाए।

जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा नवसारी (Jamsetji Tata) 14 वर्ष की आयु में बंबई आए, जहाँ उन्होंने 17 वर्ष की आयु में एलफिंस्टन कॉलेज में दाखिला लिया। यहाँ से उन्होंने कुछ वर्षों बाद ग्रीन स्कॉलर (उस समय स्नातक के समकक्ष) की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1868 में सुदूर पूर्व और यूरोप में व्यापारिक गतिविधियों में व्यस्त रहने के बाद उन्होंने 21,000 रुपए की पूँजी से एक निजी ट्रेडिंग फर्म प्रारंभ की।

उस समय अबीसीनिया में जनरल नेपियर को युद्धरत सेना को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने संबंधी आकर्षक करार होने पर उन्होंने इतना धन कमाया कि उनके लिए टेक्सटाइल के क्षेत्र में पदार्पण करना आसान हो गया। सन् 1874 में उन्होंने 15 लाख रुपए की लागत से सेंट्रल इंडिया स्पिनिंग वेविंग ऐंड मैन्युफैक्चरिंग कंपनी की बुनियाद डाली। यह रकम उन्होंने और उनके दोस्तों ने मिलकर एकत्रित की थी।

1 जनवरी, 1877 को जब महारानी विक्टोरिया औपचारिक रूप से भारत की साम्राज्ञी घोषित की गई. उसी दिन नागपुर में एंप्रेस मिल का उद्घाटन किया गया। अपने जमाने से काफी आगे बढ़कर जमशेदजी (Jamsetji Tata) ने सन् 1886 में अपने मिल कामगारों के लिए एक पेंशन निधि कायम की और सन् 1895 में उन्होंने दुर्घटना मुआवजा व्यवस्था को बुनियाद रखी। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि भारत की अधिकतर निर्धनता सुअवसर प्राप्त न होने के कारण है।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सन् 1892 में प्रतिभावान् भारतीय युवकों के लिए उच्चतर शिक्षा हेतु जे. एन. टाटा एंडॉमेंट की स्थापना की। भारत में कुछ श्रेष्ठतम व्यावसायिक टाटा स्कॉलर ही हैं। जमशेदजी (Jamsetji Tata) को विश्वास था कि औद्योगिक प्रगति के लिए अनुसंधान संयोजित तीन आधारभूत संगठन जैसे- स्टील, हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर और तकनीकी शिक्षा सर्वाधिक आवश्यक है। सन् 1896 में उन्होंने विज्ञान विश्वविद्यालय स्थापित करने के प्रयोजनार्थ ब्रिटिश सरकार को अपनी आधी दौलत दे दी थी, जिसमें उनकी चौदह इमारतें और चार जमीनों के प्लॉट शामिल थे जिनकी कीमत 30 लाख रुपए थी। अपने जीवन के पिछले आठ वर्षों से वे ब्रिटिश सरकार को समझाने की नाकाम कोशिश करते रहे थे कि सरकार उनके द्वारा प्रदत्त उपहार के बराबर योगदान देते हुए विश्वविद्यालय खोलने संबंधी अधिनियम पारित करे। लॉर्ड कर्जन, जो सन 1899 में भारत आए थे, को यह गलतफहमी थी कि इसके माध्यम से जमशेदजी का उद्देश्य अपनी नवाबी शान-शौकत को प्रदर्शित करना है। अतएव उन्होंने इस योजना को अनुमोदित करने में विलंब किया।

19 मई 1904 को जर्मनी के शहर बैडनहिम में जमशेदजी (Jamsetji Tata) निधन हो गया। उनकी मृत्यु के समय दोराब और आर.डी. उनके पास ही बैठे हुए थे। यद्यपि उन दोनों के रिश्ते में कुछ तनाव व्याप्त था, तथापि जमशेदजी के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने मिलकर काम करने का निर्णय लिया। उनके सुयोग्य नेतृत्व में अगले आठ वर्षों के भीतर जमशेदजी के तीन सपने साकार हुए।

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