एक अंग्रेज, जिसने आजीवन भारत की आजादी के लिए अंग्रेजों की मुखालफत की

Annie Besant Birth Anniversary : बात ऐसी अंग्रेज महिला की, जिसने भारत की आजादी के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। एनी बेसेंट, एक नाम जो ब्रिटिश होते हुए भी भारतीय लगता है। एनी बेसेंट, एक ऐसी महान और साहसी महिला थी जिन्हें भारतीय स्वतंत्रता सेनानी का नाम दिया गया, क्योंकि उन्होंने लोगों को वास्तविक स्वतंत्रता दिलाने के लिये बहुत सी लड़ाईयां लड़ी। वो गहराई के साथ भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़ी हुई थी और भारत को स्वतंत्र देश बनाने के लिये अपने ही देश के खिलाफ कई आभियानों को जारी रखा। वो भारतीय लोगों, संस्कृति और परंपराओं से प्रेम करती थी।

Annie Besant

एनी बेसेंट(Annie Besant) अदम्य साहस से भरपूर महिला थीं, जिन्होंने इंग्लैंड ही नहीं, भारत में भी अपनी छाप छोड़ी। उनका जीवन सदैव स्वतंत्र विचारधारा से प्रेरित रहा। 1 अक्तूबर, 1847 को क्लैफम, लंदन में जन्मी ऐनी बेसेंट का असली नाम ऐनी वुड था। वे लंदन में बस गए आयरिश मूल के मध्यवर्गीय परिवार से थीं। उनके पिता विलियम वुड डॉक्टर थे। उनकी मां का नाम ऐमिली मॉरिस था। ऐनी बेसेंट जब पांच साल की थीं, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। उनके परिवार की आमदनी का कोई स्रोत नहीं बचा। उनकी मां ने स्थिति संभाली और हैरो स्कूल में बोर्डिंग हाउस में काम करना शुरू कर दिया। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर ही बनी रही तो ऐमिली ने ऐनी के पालन-पोषण की जिम्मेदारी अपनी सहेली ऐलन मैरियट को सौंप दी। ऐलन ने ऐनी को अच्छी शिक्षा और अच्छे संस्कार दिए। ऐमिली ने ही उनके अंदर स्वतंत्र चेतना और सामाजिक दायित्व की भावना पैदा की। इन्हीं दोनों भावनाओं पर ऐनी बेसेंट के जीवन की नींव पड़ी। उन्होंने यूरोप का दौरा भी किया और रोमन कैथोलिक धर्म के प्रति झुकाव महसूस किया।

वर्ष 1867 में 20 साल की उम्र में एनी बेसेंट (Annie Besant) का विवाह एक 26 साल के पादरी रेवरेंड फ्रैंक से हुआ। ऐनी अपनी इस शादी से बहुत खुश थीं, उन्हें इस बात की ज्यादा खुशी थी कि उनका विवाह एक धर्म गुरु से हुआ है। ऐनी को इस विवाद से 1869 में एक बेटा हुआ जिसका नाम उन्होंने आर्थर रखा और 1870 में उनके घर मालेल नाम की बेटी ने जन्म लिया। ऐनी को अपने बच्चों से खासा लगाव था, लेकिन ऐनी की जिंदगी में समय चक्र का पहिया हमेशा दुखों के सागर ही लेकर आया। कुछ ही सालों बाद ऐनी के दोनों बच्चें बेसमय ही उपर वाले को प्यारे हो गए। इस बीच ऐनी और उनके पति रेवरेंड फ्रैक के बीच काफी वैचारिक मतभेद आ चुके थे। लिहाजा ऐनी ने साल 1874 में अपने पति से अलग होने का फैसला लिया।

साल 1893 को एनी बेसेंट (Annie Besant) भारत आईं। भारत आने के बाद वो सीधे धर्म नगरी वाराणसी पहुंची और यहां करीब 1906 तक रहीं। इस दौरान 1907 में उन्हें थियोसोफिकल सोसाइटी की अध्यक्ष के रूप में चुना गया। इस दौरान उन्होंने भारत में धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रीय पुनर्जागरण का कार्य प्रारंभ किया। भारत के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता आवश्यक है, इसके लिए उन्होंने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के साथ ‘होमरूल आंदोलन’ भी चलाया।
Annie Besant

एनी बेसेंट (Annie Besant) में राजनीतिक दूरदर्शिता भी थी। सन् 1920-21 में महात्मा गांधी के चलाए गए असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन का जमकर विरोध किया। उन्होंने इन दोनों मुद्दों पर गांधीजी से वैचारिक मतभेद होने पर कांग्रेस का त्याग कर दिया। आज हम सभी महसूस करते हैं कि एनी बीसेंट की दृष्टि ज्यादा व्यावहारिक और दूरगामी थी।

एनी बेसेंट (Annie Besant) ने गांधी जी के असहयोग आंदोलन के बारे मेे सटीक कहा था, “हम देश को आजाद तो करा ही लेंगें, लेकिन उस पर सुशासन नहीं कर पाएंगे, क्योंकि अनुशासनहीनता की शक्तियां हमारे युवावर्ग पर पूर्णतिया हावी हो जाएंगी।” भारत में व्याप्त अनुशासनहीनता आज एनी बेसेंट की दूरदर्शिता को स्वतः ही स्पष्ट कर रही है। मुसलमान भी भारत को राष्ट्र मान कर इसी कारण नहीं जुड़ पाए हैं। कांग्रेस में उस सयम जो हिंदू कट्टरवादी लोग थे, उन्होंने मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्यधारा के साथ जोड़ने का प्रयास नहीं किया। आज जो स्थिति है, वह किसी से छुपी नहीं हैै। हिंदू मुसलमानों का वास्तविक हित सोचने के बजाय इन्हें वोट बैंक ही माना जा रहा है। राष्ट्र की उन्नति, स्नेह व भाईचारा गौण हो गया है और सत्ता की चाबी प्रमुख हो गई है। राष्ट्र की स्वाभिमानी शक्तियों के साथ चरित्र बल का उदय नहीं करना भयानक भूल ही थी। इसके अलावा एनी बेसेंट ने भारतीय संस्कृति के पुनरूद्धार को भी आवश्यक बताया था।

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एनी बेसेंट (Annie Besant) ने थियोसोफी पर करीब 220 पुस्तकें और कई लेख भी लिखे। साल 1895 में उन्होंने सोलह पुस्तकें और अनेक पैंफलेट प्रकाशित किए, जो 100 पृष्ठों से भी अधिक के थे। एनी बेसेंट ने ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का अंग्रेजी में अनुवाद किया। समय-समय पर ‘लूसिफेर’, ‘द कॉमनवील’ व ‘न्यू इंडिया’ के संपादन भी एनी बेसेंट ने किए। कांग्रेस का त्याग भी इन्होंने इसी कारण किया था। लेकिन अयरलैंड की महिला द्वारा भारतीय आजादी के संघर्ष में किसी भी भारतीय से कम योगदान नहीं दिया गया था। 20 सितंबर, 1933 को 86 वर्ष की उम्र पा लेने के पश्चात इस महान आत्मा का निधन हो गया। अपने जीवनकाल मेें ही एनी बेसेंट ने देश के तत्कालीन महान नेताओं व समाज सुधारकों के मध्य अपना सम्माननीय नाम बना लिया था। ब्रिटिश हुकूमत भी एनी बेसेंट की माननीय मांगों के समक्ष नतमस्तक हो जाया करती थी। बेशक देश के सपूतों की कुर्बानियां वक्त की दीमक के कारण नष्ट हो जाएं, लेकिन एक विदेशी नारी ने महान उदेश्यों के लिए यह जीवनपर्यत समर्पित रहीं। शिक्षा, धर्म, दर्शन राजनीति और सेवा के क्षेत्र में उनका योगदान निस्वार्थ ही था

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